बिहार में मनरेगा के तहत हो रहे कामों में गड़बड़झाला…

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-संजय कुमार ||

बिहारशरीफ,  केन्द्र सरकार द्वारा प्रायोजित ‘‘ महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना‘‘ को बिहार सरकार की गलत नीति के कारण कराये जा रहे कार्यो की गुणवत्ता पर सवालिया निशान खड़ा हो रहा हैं. राज्य सरकार की मंशा इस योजना की राशि, जो बैकों में पड़ी है, उसे जैसे-तैसे खर्च करा दिया जाय.ropni

प्राप्त जानकारी के अनुसार केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना को परिवर्तित कर ‘‘ महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना‘‘ किया गया. इस योजना के अन्र्तगत काम के अधिकार को सरकार द्वारा कानूनी दर्जा दिया गया तथा 18 वर्ष के ऊपर के इच्छुक व्यक्ति के एक परिवार को न्यूनतम 100 दिन कार्य का अधिकार मिला. कार्य नहीं दिए जाने की स्थिति में बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान है।
बताया जाता है कि इस योजना की रुपरेखा तैयार करते समय ही बिहार में सरकारी राषि के दुरुपयोग का सुनिश्चत संरचना तैयार किया गया. बिहार मे गैर तकनीकी योग्यताधारी व्यक्ति को तकनीकी पदधारी नाम‘‘पंचायत तकनीकी सहायक दिया गया. इनको एक लाख रुपये तक के प्राक्कलन बनाने एंव मापी पुस्तिका संधारण का अधिकार दिया गया, बाद में अपर-सचिव- सह-आयुक्त मनरेगा के पंत्राक 6599 दिनांक 03/06/2011 द्वारा सभी प्रकार के योजनाओं की मापी पुस्तिका संधारण का अधिकार दे दिया गया, यह अधिकार उसी प्रकार का है,  जिस प्रकार एक कला विषय के मर्मज्ञ प्रोफेसर से शल्य चिकित्सा का कार्य संपादन सुनिश्चित कराया जाए।
सरकार द्वारा उक्त जारी आदेश के आलोक में अवर अभियंता संध,  बिहार के महामंत्री ई0 ऋर्षिकेष पाठक ने अपने पत्रांकः-386,दिनांक 06/08/2011 के द्वारा मुख्यमंत्री, बिहार को लिखे पत्र में कहा था कि राज्यहित एंव कार्यहित में मनरेगा के तहत होने वाले कार्यो की प्रकिया में सुधार के वास्ते बड़े मर्माहत होकर कहा था कि करोड़ो- अरबों का वारा- न्यारा पंचायत तकनीकी सहायक द्वारा न कराया जाए, अन्यथा इंजिनियरिन्ग की पढ़ाई बंद कर दी जाए।
बताया जाता है कि ‘‘ मनरेगा ‘‘ द्वारा 60 प्रतिषत मिट्टी कार्य और 40 प्रतिशत पक्का कार्य कराया जाता है. पंचायत तकनीकी सहायक द्वारा सड़क एंव पुलिया आदि निर्माण से संबंधित आवश्यक कार्यों हेतु मिट्टी की भार संधारण,  मिट्टी की संपीड़न क्षमता, सड़क की ढाल, कंक्रीट की कार्य क्षमता, सीमेन्ट – पानी अनुपात,  प्रथम क्षेणी ईट की पहचान,  प्रबलन के बीच की दूरी आदि तकनीकी ज्ञान का अभाव है उनके द्वारा तैयार किए गए प्राक्कलन कार्य संपादन क्षमता एंव मापी पुस्तिका दर्ज करने के लिए उपलब्ध नहीं है, जिससे सरकारी राशि के दुरुपयोग एंव मजदूरों की शोषण की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
एक कनीय अभिंयता ने बताया कि तकनीकी शिक्षा पर सरकार द्वारा जनता की गाढ़ी कमाई का बड़ा अंष खर्च किया जाता है,  परन्तु गैर तकनीकी षिक्षा प्राप्त कर्मी ‘‘पंचायत तकनीकी सहायक ‘‘ द्वारा उपयुक्त कार्य संपादित कराने से खर्च की गई राशि का सदुपयोग नही हो पाएगा. फलतः अभियत्रण संस्थान के माध्यम से एक कनीय अभिंयता को प्रशिक्षित करने मे खर्च किए गए लाखों रुपये के बदले प्राप्त तकनीकी ज्ञान से राज्य लाभान्वित नहीं हो पा रहा है.
सागर यादव (सुपौल) द्वारा 20277/11 द्वारा जनहित याचिका के रुप में माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष इस षड़यंत्र को लाया गया, जिस पर माननीय विद्वान न्यायधीश टी मीना कुमारी एंव विकास जैन द्वारा दिनांक 22/11/2011 को फैसला सुनाया गया,  परन्तु आजतक सरकार द्वारा कानुन संगत आदेश निर्गत नहीं किया गया। बाध्य होकर वादी सागर यादव द्वारा कोर्ट अवमानना वाद संख्या -2884/2012, दिनांक:- 22/06/2012 को दायर किया गया, परन्तु सरकार कुंभकरणी निंद्रा में सोई हुई है गैर तकनीकी व्यक्ति द्वारा तकनीकी कार्य कराया जाना यह दर्शाता है कि राज्य सरकार की नियत कार्य के गुणवत्ता पर साफ नही है। क्या राज्य सरकार केन्द्र प्रायोजित योजना को असफल बनाने के लिए सुनियोजित साजिश तो नहीं कर रही है. क्या जनता की गाढ़ी कमाई का वारा- न्यारा करने का बुद्धिमतापुर्ण प्रयास तो नहीं है ?
बताया जाता है कि ‘‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी, बिहार प्रशासनिक एंव तकनीकी मार्गदर्षिका प्रकाषन बिहार सरकार ग्रामीण विकास विभाग पटना ‘‘ के अध्याय 11 में वर्जित है कि राज्य के निर्माण कार्यों के कार्यन्वयन में संलग्न पदाधिकारियों के मार्ग निर्देषन हेतु बिहार लोक निर्माण विभागीय संहिता, बिहार लोक निर्माण लेखा संहिता, बिहार वित्त नियमावली,बिहार कोषागार नियमावली आदि का प्रतिपादन बिहार सरकार द्वारा किया गया है. बिहार लोक निर्माण संहिता के अध्यय 2 खंड 7 के खंडिका 07/05/2011 में स्पष्ट उल्लेख है कि मापी पुस्तिका संधारण हेतु कार्य प्रभारी कनीय अभियंता प्राधिकृत किया गया है.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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