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ऐसे तो नहीं बनेगी बात…

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-राघवेंद्र प्रसाद मिश्र||

केवल कानून बनाने से हालत नहीं बदलते, हालत बदलने के लिए उस पर अमल होना चाहिए. जब तक इसके पालन करने वालों को जवाबदेह नहीं बनाया जाता जब तक सुधार की उम्मीद करना मात्र कोरी कल्पना ही होगी. दिल्ली की घटना पर जिस तरह से पुलिस के खिलाफ लोगों का गुस्सा देखने को मिल रहा है इसके लिए खुद पुलिसवाले ही जिम्मेदार हैं. क्योंकि अधिकतर छोटी घटनाएं पुलिस की लापरवाही के चलते गंभीर रूप धारण कर लेती हैं.563606_183601551782215_1638760100_n

दिल्ली में घटी हैवानियत की घटना का आक्रोश पूरे देश में देखा जा रहा है. देश में यह पहली बार हुआ है कि लोग बलात्कार की घटना के खिलाफ इस तरह एक जुट होकर पीडि़ता को न्याय दिलाने वा इसके खिलाफ बने कानून में संशोधन कर फांसी की सजा का प्रावधान किये जाने की मांग कर रहे हैं. जिस तरह से देश में लगातार बलात्कार की घटनाओं में बृद्धि हो रही है लोगों का गुस्सा होना स्वाभाविक है. सवाल यह है कि क्या ऐसे मामले में फांसी की सजा बना देने से इस पर अंकुश लग पाएगा. अगर इस पर अंकुश लगाना है तो कानून व्यवस्था बनाये रखने वाले पुलिस वालों को जिम्मेदार बनाना होगा. क्योंकि आपराधिक घटनाओं के पीछे कहीं न कहीं से पुलिस ही जिम्मेदार होती है. पुलिस की लापरवाही की वजह से मामूली सी घटना भी जघन्य अपराध का रूप ले लेती है. चैनलों पर दिखाये जा रहे लाइव शो में दिल्ली के इंडिया गेट पर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस वालों ने लाठियां भांजी और कुछ बिना वर्दी के पुलिसवालों ने जिस तरह से कुछ लड़कियों को वहां से जबरन उठाकर गाडिय़ों में बैठाया आखिर यह किस कानून में शामिल है.

सरकार को कार्रवाई ही करनी है तो ऐसे पुलिसवालों को कानून के अंतर्गत लाना चाहिये. कानून जबकि यह है कि महिलाओं की गिरफ्तारी के लिए महिला पुलिस का होना आवश्यक है, जबकि यहां इसका पालन नहीं किया गया. कानून के रखवाले हमेशा से ही कानून को तोड़ते रहे हैं और इन पर कठोर कार्रवाई न हो पाने की वजह से मौजूदा कानून का कोई औचित्य नहीं रह जा रहा है. ऐसे में कानून बनाये जाने से ज्यादा जरूरत है इसके अनुपालन की. कानून की ही खांमियों का फायदा अक्सर कानून के रखवाले उठाते रहे हैं, और शायद यही वजह है कि घटानाओं का निष्पक्ष आकलन किया जाये तो अपराधियों से ज्यादा पुलिसवाले ही दोषी मिलेंगे. देश में बलात्कार की यह पहली घटना नहीं है, इससे भी कहीं जघन्य घटनाएं हुई हैं पर पुलिसवालों की मिली भगत की चलते वे घटनाएं जमीनदोज हो गई. ऐसी ही घटना 2007 में उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार में बस्ती जनपद के गौर थानाक्षेत्र में हुई थी. इसमें यहां तैनात तत्कालीन थानाप्रभारी अपने हमराहियों के साथ गौर बाजार चौराहे से एक लडक़ी को पूछताछ के मामले में जबरन गाड़ी में बैठा लाये थे. थाने में एसओं ने अपने साथियों के साथ लडक़ी से बलात्कार करने के बाद उसको इतना भयग्रस्त कर दिया कि वह घर पहुंचने के बाद फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. लडक़ी के माता-पिता पुलिस अधीक्षक से लेकर शासन तक न्याय की गुहार लगाते रह गये पर दोषियों पर कार्रवाई नहीं हो सकी. अंतत: मौजूदा सपा जिलाध्यक्ष के नेतृत्व में जिलाधिकारी कार्यालय के समक्ष धरना शुरू हुआ, जिसे यह कहते हुए प्रशासन ने नकार दिया कि मामले को कोर्ट में नहीं घसीटा जा सकता क्योंकि इसका समयावधि खत्म हो गई है.

ठीक इसी तरह से प्रदेश के लखीमपुर जिले की घटना भी सामने आयी, जिसमें निघासन खीरी थाने में पुलिस वालों ने मासूम सोनम को दुष्कर्म के बाद पेड़ पर फांसी लगाकर मौत के घाट उतार दिया था. जानकारी होने पर पुलिसवालों ने मामले को दबाने का प्रयास किया. लोगों के आक्रोश को बढ़ता देख बाद में थानाध्यक्ष समेत 11 पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया. रसूखवालों के सामने कानून किस कदर बौना नजर आता है वह भी यहां देखने को मिला. लडक़ी का जब शवविच्छेदन कराया गया तो डाक्टरों ने आत्महत्या की पुष्टि की, पर लोगों की मांग पर दोबारा जब शवविच्छेदन हुआ तो हत्या की पुष्टि हुई और इसमें तीन डाक्टरों को भी निलंबित किया गया.

ऐसे में बड़ा मुद्दा यह है कि कानून के रखवालों को पहले कानून के दायरे में लाने की पहल होनी चाहिये. दिल्ली की घटना की आग अभी जल ही रही है कि इसी बीच फैजाबाद जनपद में अकबरपुर की बलात्कार पीडि़ता का बयान दर्ज कराने लाये पुलिस वालों ने एक होटल में उसके साथ दुष्कर्म किया, जिसमें एसएसआई मानसिंह के अलावा अकबरपुर के तत्कालीन प्रभारी एके उपाध्याय भी शामिल थे. रही बात इस पर कानून बनाने की तो आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक अरविंद केजरीवाल के मुताबिक देश में 671 जनप्रतिनिधियों पर बलात्कार और छेड़छाड़ के मामले दर्ज हैं. ऐसी स्थिति में इसके खिलाफ कड़ा कानून कौन बनाएगा. दिल्ली में आंदोलन के बढ़ते दबाव को देखते हुए मौजूदा कानून को सख्त बनाये जाने के लिए भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है.

सरकार को यह सोचना होगा कि जिस तरह से आंदोलन में महिलाएं बढ़-चढ़ हिस्सा ले रहीं हैं उसके पीछे केवल पीडि़ता को न्याय दिलाना ही नहीं वे अपनी भी सुरक्षा को लेकर काफी गंभीर हैं. फिलहाल जरूरत है कि पुलिस को अपने दायित्वों के प्रति जवाबदेह बनाया जाए नहीं तो स्थिति सुधर जाने की कल्पना करना बेकार ही साबित होगा. आजादी के इतने दिनों बाद पुलिस का चेहरा जरूर बदला है पर कार्यप्रणाली में अभी अपेक्षित सुधार होना बाकी है. आज भी हालात ऐसे हंै कि अधिकतर मामलों में फरियादियों को थाने से निराशा ही हाथ लगती है. और कई मामले ऐसे होते हैं जिन्हें न्यायालय के हस्तक्षेप पर दर्ज किया जाता है. दोषी अगर साक्ष्य के आभाव में करी हो रहे हैं तो इसके पीछे पुलिस ही जिम्मेदार है. कानून व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी आगर पुलिस पर है तो कटुसत्य यह भी संगीन अपराधों के लिए पुलिस ही जिम्मेदार है.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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