नष्ट हो रही नैतिकता!

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सुमित सारस्वत||

सरकार और सामाजिक संस्थाओं द्वारा बेटियों को बचाने के लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं.  इसके बावजूद तेजी से बदलते सामाजिक मूल्यों के कारण लड़कियों और महिलाओं पर नृशंस और जघन्य अत्याचार सतह से ऊपर दिखाई पडऩे लगे हैं.  खाकी वर्दी का खौफ और कानून का शिकंजा कमजोर होने के कारण बेटियां इंसानी भेडिय़ों का शिकार बन रही है.  01यही कारण है कि देश में कन्या भ्रूण हत्या, दहेज हत्या और बलात्कार जैसी घिनौनी वारदातों का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है.  दिल्ली में हुई गैंगरेप की घिनौनी वारदात के बाद महिला वर्ग में इतना आक्रोश है कि वे अपने-अपने तरीके से अपराधियों को सजा देने की मांग कर रही है.  कोई दुष्कर्मियों को नपुंसक व नेत्रहीन करने की मांग कर रही है, तो कोई इन्हें सरेआम फांसी पर चढ़ाना चाहती है.  साथ ही महिलाओं ने आवाज बुलंद की है कि देश में ऐसा कानून बने जो मौत जैसा लगे.  जिससे घिनौनी वारदातों को अंजाम देने वाले दरिंदों की रुह कांप उठे.  किसी भी वारदात को अंजाम देने से पहले अपराधी उसकी सजा की कल्पना मात्र से सिहर उठे.

दिल्ली में गैंगरेप के बाद अलवर में हुई एक नाबालिग से दुष्कर्म की वारदात से एक बात साफ जाहिर होती है कि आज भी समाज में बेटी को हीन दृष्टि से देखा जा रहा है.  महिलाओं को समाज की इज्जत मानने वाले राजस्थान में भी अब नैतिकता का राम नाम सत्य होता दिख रहा है.  महिलाएं कहती है, जिस देश में नारी को पूजा जाता है, वहां नारियों पर अत्याचार करने वाले इंसानी भेडिय़ों को गोली मार देनी चाहिए.  ‘बस अब नहीं सहेंगे.., महिलाओं की इज्जत करो.., महिलाओं पर अत्याचार बंद करो.., स्त्री का अपमान यानि देश का विनाश.., कानून हो ऐसा, जो लगे मौत जैसा…’ कुछ ऐसे ही नारे लिखी तख्तियां हाथों में थामे बेटियां देशभर में सडक़ों पर उतर आई है.  महिला अत्याचार के खिलाफ आक्रोश की ज्वाला भडक़ उठी है.  महिलाएं नारे लगा रही है, ‘हम भारत की नारी है, फूल नहीं चिंगारी है…’.  वहशी दरिंदे शायद इस बात को भूल गए कि वक्त पडऩे पर कोमल दिखने वाली नारी भी चण्डी का रूप धारण कर लेती है.

अगर हवस की प्यास बुझाने के लिए ये दरिंदे बेटियों को यूं ही शिकार बनाते रहे, अगर बेटियों का कोख में कत्ल जारी रहा, या दहेज का दानव उन्हें निगलता रहा तो आने वाले दिनों में मानव का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा.  जिस दिन समाज बेटी के महत्व को समझने लगेगा उस दिन के बाद शायद वे महफूज रहेगी.  आक्रोश का उबाल थम जाएगा.  बेटियां भी स्वतंत्र और निश्चिंत होकर घूम सकेगी.  हर इंसान के घर में मां, बहन, पत्नी और बेटी है.  इसके बावजूद महिलाएं शिकार बन रही है.  आखिर क्यों ? यह एक ऐसा बड़ा सवाल है जिसका जवाब सभ्य समाज आज भी टटोल रहा है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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