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‘स्त्री देह के लिए उन्मादी’ इस भीड़ का यह चरित्र हम सबने मिलकर तैयार किया है।..

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-चंद्रकांता||
स्त्री का ‘स्त्री होना’ हमारे समाज की संकीर्ण सोच को ‘बर्दाश्त नहीं होता’. दामिनी केस में पुलिस और प्रशासन की चूक बहस का विषय है और निसंदेह धिक्कार का भी। जाति या वर्ग का समीकरण जो भी रहा हो समाज और युवाओं की संगठित और सक्रिय प्रतिक्रिया बेहद प्रशंसनीय है। लेकिन इन तमाम प्रायोजित या स्वतः प्रेरित गतिविधियों के बीच एक प्रश्न हम सभी से है – gangrape

क्या हमारे समाज के पुरुष वर्ग को पुलिस और प्रशासन या संसद सामजिक और व्यक्तिगत संस्कार दे रही हैं? हमारी स्त्रियाँ क्या केवल इसलिए असुरक्षित है कि कानून और प्रशासन का चरित्र और स्वभाव उनके अनुकूल नहीं है ??

सच तो यह है की ‘स्त्री देह के लिए उन्मांदी’ इस भीड़ का यह चरित्र हम सबनें मिलकर तैयार किया है।तब, जब-जब हमनें अपनें भाइयों,अपनें पतियों,पुरुष मित्रों और अपनें लड़कों को अपने आचार-विचार-व्यवहार और रीति-संस्कारों से यह सीख दी की स्त्री और उसकी आकर्षक देह पर उनका एकाधिकार है; और बहिन, पत्नी, मित्र, सहकर्मी और पुत्री किसी भी रूप में उसका अस्तित्व स्वतंत्र नहीं है। क्यूंकि हमारे समाज नें इस बात के लिए कोई स्पेस नहीं रखा कि बहनें अपनी रक्षा खुद कर सकें तो उनकी ‘सुरक्षा की जिम्मेदारी’ भाइयों पर छोड़ दी गयी। चूंकि स्त्री को ‘पराया धन’ कहा गया इसलिए जिस घर-परिवार में उसनें जनम लिया उनकी भूमिका केवल उसके ब्याह तलक सीमित रह गयी; वर की योग्यता-अयोग्यता और उसके चुनाव का अधिकार भी स्त्री को नहीं दिया गया। फिर मंगलसूत्र-सिन्दूर जैसे उपबंधों का अधिभार डालकर स्त्री की सीमा-भूमिका तय कर दी। समाज-परिवार में स्त्री की भूमिका को लेकर आधुनिक होने को लेकर हम आज भी भयभीत हैं।
हममें से अधिकाँश का रवैया स्त्री को लेकर यही है। और हमारी यही अपाहिज मानसिकता स्त्री के सन्दर्भ में हमारा व्यवहार तय करती है। इसलिए ऐसी किसी भी दुर्घटना की पहली जिम्मेदारी हमारी है।

और हाँ, बलात्कार या स्त्री गरिमा हनन का कोई केस केवल इसलिए सहनीय नहीं हो जाता की पीड़िता आदिवासी या तथाकथित निम्न-उच्च कही जाने वाली किसी जाति /वर्ग से है या फिर अपराधी नें अधिक हिंसा और अधिक अमानवीय व्यवहार का इस्तेमाल नहीं किया। कम से कम इस बेहूदा मानसिकता से बाहर आइये तब स्त्री पक्ष की बात कीजिये।

जो भी पाठक इस लेख की संवेदना को साझा कर पा रहे हैं उनसे लेखिका का निवेदन है कि, समाज और घर-परिवार में स्त्री को अपनी भूमिका खुद तय करने दीजिये।। हम सभी जब तलक अपनी और अपने समाज की जिम्मेदारियों को आँख-भींचकर अनदेखा करते रहेंगे ‘दामिनी’ असुरक्षित रहेगी बस में, कार में, पब में, स्कूल-कालेज में, सड़क पर और घर की चारदीवारी में भी ..

(‘दामिनी प्रकरण’ से बेहद आहत लेकिन बुलंद हौंसलों के साथ – चंद्रकांता)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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