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फैशन बनता बलात्कार, सो गई है आत्मा..

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-रवि जैन||

आज सर्वाधिक प्रचलित शब्द है, मॉर्डन होना या आधुनिक जीवन जीना. . बच्चे, बूढ़े, युवा, स्त्री -पुरुष सब एक ही दिशा में दौड़ लगते नज़र आते हैं, ऐसा लगता है कि उनको एक ही भय है, कि कहीं हम इस रेस में पिछड न जाएँ. यही कारण है, हमारा रहन-सहन, वेशभूषा, वार्तालाप का ढंग सब बदल रहा है. ग्रामीण जीवन व्यतीत करने वाले भी किसी भी शहरी के समक्ष स्वयं को अपना पुरातन चोला उतारते नज़र आते हैं. ऐसा लगता है कि अपने पुराने परिवेश में रहना कोई अपराध है.abused-girl-getty-590

समय के साथ परिवर्तन स्वाभाविक है, बदलते परिवेश में समय के साथ चलना अनिवार्यता है. भूमंडलीकरण के इस युग में जब “कर लो दुनिया मुट्ठी में “का उद्घोष सुनायी देता है, तो हम स्वयं को किसी शिखर पर खड़ा पाते हैं. आज मध्यमवर्गीय भारतवासी भी फोन, इन्टरनेट, आधुनिक वस्त्र-विन्यास, खान-पान, जीवन शैली को अपना रहा है. वह नयी पीढ़ी के क़दमों के साथ कदम मिलाना चाहता है. आज बच्चों को भूख लगने पर रोटी का समोसा बनाकर, या माखन पराठा नहीं दिया जाता, डबलरोटी, पिज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक दिया जाता है, गन्ने का रस, दही की लस्सी का नाम यदा कदा ही लिया जाता है. आधुनिकतम सुख-सुविधा, विलासिता के साधन अपनी अपनी जेब के अनुसार सबके घरों में हैं. बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में मोटा डोनेशन देकर पढाये जा रहे हैं. परन्तु इतना सब कुछ होने पर भी हमारे विचार वहीँ के वहीँ हैं. फिल्मों से यदि कुछ सीखा है तो किसी लड़की को सड़क पर देखते ही फ़िल्मी स्टाईल में उसपर कोई फब्ती कसना, अवसर मिलते ही उसको अपनी दरिंदगी का शिकार बनाना, , अपराध के आधुनिकतम तौर तरीके सीखना, शराब सिगरेट में धुत्त रहना आदि आदि ……. और हमारे विचार आज भी वही . पीडिता को ही अपराधिनी मान लेना (यहाँ तक कि उसके परिजनों द्वारा भी), अंधविश्वासों से मुक्त न हो पाना, लड़की के जन्म को अभिशाप मानते हुए कन्या भ्रूण हत्या जैसे पाप में लिप्त होना, दहेज के लिए भिखारी बन एक सामजिक समस्या उत्पन्न करना आदि आदि . ये कलंक सुशिक्षित शहरी समाज के माथे के घिनौने दाग हैं.

आज समाचार पत्र में पढ़ा कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने देश में घटित बच्चों के सामूहिक हत्याकांड से व्यथित हैं, और कड़े से कड़े कदम उठाने के लिए योजना बना रहे हैं. और निश्चित रूप से वहाँ इस घटना की पुनरावृत्ति बहुत शीघ्र नहीं होगी, दूसरी ओर हमारे देश में बलात्कार, किसी भी बहिन, बेटी की इज्जत सरेआम नीलाम होने जैसी घटनाएँ आम होती जा रही हैं. जिनमें से अधिकांश पर तो पर्दा डाल दिया जाता है, जो राजधानी, कोई भी गाँव, क़स्बा, महानगर, छोटे शहर की सीमाओं में बंधी हुई नहीं हैं, सुर्ख़ियों में तब आती है, जब मीडिया की सुर्खी बन जाती है, या फिर किसी वी आई पी परिवार से सम्बन्धित घटना होती है.

इस प्रकार, एक रूटीन के रूप में ऐसे समाचार प्राय सुनने और पढ़ने को मिलते हैं. कुछ दिन विशेष कवरेज मिलती है, कुछ घोषणाएँ की जाती हैं, महिला संगठन आवाज बुलंद करते हैं, और फिर वही. . एक प्रश्न उठता है कि इस असाध्य रोग का निदान क्या है?

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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