कसाब के बाद औरों का हिसाब कब?

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-एटा से बशु जैन||

26/11/2008 को देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में सरेआम अपने दस साथियों के साथ तीन दिन तक हिंसा का तांडव मचाने वाले पाकिस्तानी आतंकी आमिर अजमल कसाब को पुणे की यरवदा जेल में गुपचुप तरीके से फांसी दे दी गई। गौरतलब है कि इस हमले में 166 बेकसूर लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। भारतीय पुलिस बल ने सैन्य कार्रवाई के दौरान हमले शेष नौ आतंकवादियों को मौत के घाट उतार दिया था और सिर्फ ऐसा आतंकवादी जवान आमिर अजमल कसाब था, जिसे जिंदा पकड़ा जा सका था। क साब को फांसी दिए जाने पर देश भर में दीवाली भले ही मन गई हो, लेकिन गुपचुप तरीके से दी गई फांसी सवाल खड़े करती है। 000014सवाल है कि सरकार ने फांसी के लिए कसाब को ही क्यों चुना? क्या कसाब को सरकार ने चुनावी टारगेट बना लिया? यदि नहीं तो आपके मन में जरुर यह सवाल उठता होगा कि अन्य आतंकी और हत्यारे ऐसे हैं, जिनकी दया याचिका आज तक राष्ट्रपति कार्यालय में विचाराधीन है। आखिर उन पर फैसला कब होगा?
13 दिसंबर 2001 में संसद पर हुए हमले में अफजल गुरु को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। अफजल को चार अगस्त 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी। पिछले साल केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उनकी दया याचिका खारिज करते हुए अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को भेज दी थी। सोनीपत का धर्मपाल 19 वर्ष से हत्या के मामले में अंबाला जेल में बंद है। पांच मई 1997 को उसे सेशन कोर्ट,29 सितंबर 1998 को हाईकोर्ट ने और 18 मार्च 1999 को सुप्रीम कोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई। 13 वर्ष पहले सुनाई गई फांसी की सजा को माफ कराने के लिए धर्मपाल द्वारा दायर दया याचिका 2 नवंबर 1999 से राष्ट्रपति के पास विचाराधीन है। 1993 में एक कार बम विस्फोट में नौ लोगों को मारने और कई लोगों को घायल करने के दोषी दविंदर पाल सिंह भूल्लर को सुप्रीम कोर्ट ने 2002 ने फाँसी की सजा सुनाई और पिछले साल राष्ट्रपति ने इनकी क्षमा याचिका को स्वीकार नहीं किया।
भले ही राजीव गांधी के हत्यारे टी. सुथेतिराजा उर्फ़ सांतन, श्रीहरण उर्फ़ मुरुगन और जी पेरारिवलन उर्फ अरिवू की क्षमा याचना पर मद्रास हाईकार्ट ने स्टे लगा दिया और तमिलनाडु विधानसभा ने इन हत्यारों की माफी के लिए एक प्रस्ताव भी पारित कर दिया हो, लेकिन राष्ट्रपति ने इनकी दया याचिका ठुकरा दी है। आश्चर्य की बात तो यह है कि जिन आरोपियों की क्षमा याचिकाओं को ठुकराया जा चुका है उनको भी  अभी तक फांसी नहीं दी जा सकी है। आखिर राष्ट्रपति कार्यालय में लंबित पड़ी याचिकाओं की ओर कब निहारा जाएगा?
आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रपति के पास वर्ष 2010 में 32 दया याचिका विचाराधीन थीं। इसमें से 14 फांसी की सजा को पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया था। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के समक्ष कम से कम 11 दया याचिकाएं लंबित हैं। इनमें अफजल गुरु, बलवंत सिंह राजोआना की भी याचिकाएं शामिल हैं।
गृह मंत्रालय ने अपने सलाह की समीक्षा के लिए राष्ट्रपति भवन से 2009-12 के दौरान 26 दया याचिकाएं वापस मंगाईं।
ऐसा क्या कारण है कि कसाब को लेकर सरकार ने इतनी जल्दबाजी दिखाई, जबकि वह इन सजाओं की फेहरिस्त में अंतिम पायदान पर था। इससे तो प्रतीत होता है कि सरकार ने कसाब को अपना चुनावी टारगेट कहें या विपक्ष को जबाव देने का बढ़िया तरीका समझा लिया। कसाब की फांसी कुछ राजनीतिक मजबूरियों को प्रदर्शित करती नजर आ रही है।

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15 thoughts on “कसाब के बाद औरों का हिसाब कब?

  1. एक भारतीय अब दूसरों का भांडा मीडिया दरबार के सर पर क्यों फोड़ रहे हो. हम तो कांग्रेस हो या कोई अन्य पार्टी, जरूरत पड़ने पर हाथों हाथ मुंह काला कर देते हैं. कोई बकाया काम नहीं छोड़ते… 🙂

  2. ज्यादा तर मीडिया हिन्दू विरोधी बाते को ज्यादा महत्व देती आई है, और जब बहेस हो रही हो तब हिन्दु बात का पलड़ा भारी हो गा तब वे उन की बात को किसीभी तरह काट देते है ,और कहते है की एक छोटा सा ब्रेक ले लेते है!!!!!

  3. Chavda Harsh क्या राष्ट्र हित की बात करते ही भाजपा का ठप्पा लग जाता है? मीडिया दरबार किसी पार्टी विशेष का टट्टू नहीं है. मीडिया दरबार शुरू से देश विरोधी ताकतों का मुंह काला करता रहा है.

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