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मयखाना बना सूचना निदेशालय

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देहरादून से नारायण परगाई||

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देहरादून  उत्तराखण्ड सूचना निदेशालय आजकल नशेड़ियों का अड्डा बना हुआ है, शाम को पांच बजे के बाद यहां महफिलें सजने का दौर शुरू हो जाता है और देर रात तक शराब और कबाब का यह दौर तब तक चलता रहता है, जब तक कर्मचारियों के पैर लड़खड़ाने न लग जाएं।
उत्तराखण्ड का सूचना निदेशालय आज कल सुर्खियों में है, हो भी क्यों नहीं जब सूचना निदेशालय का महानिदेशक और राज्य का आबकारी आयुक्त एक ही व्यक्ति हो। इतना ही नहीं यह विभाग मुख्यमंत्री के अधीन कार्य करता है, ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि जब मुख्यमंत्री के विभाग की यह हालत है तो और विभागों की क्या हालत होगी। शाम ढलते ही यह विभाग जहां मयखाने में तब्दील हो जाता है, वहीं यहां आने-जाने वालों में अपरिचित लोगों का जमावड़ा लगना भी शुरू हो जाता है। सूत्रों ने तो यहां तक जानकारी दी है कि निदेशालय के भीतर बनी कैन्टीन में मुर्गे और खान-पाने के सामग्री की व्यवस्था देर शाम से ही शुरू होकर महफिल के रंगत में आने तक जारी रहती है। इस दौरान निदेशालय के सारे द्वार भीतर से बंद कर दिए जाते हैं, जिससे कोई बाहरी व्यक्ति भीतर प्रवेश न कर सके। यह पार्टी भी विभाग के कुछ खास लोगों के बीच ही होती है, इसमें विरोधी गुट का एक भी व्यक्ति शामिल नहीं किया जाता या यूं कहा जाए कि उन्हें कानों कान खबर नहीं होती की आज निदेशालय में पार्टी का आयोजन किया गया है। राज्य से प्रकाशित होने वाले चार समाचार पत्रों पर महरबान यह विभाग दिल्ली और अन्य प्रदेशों की राजधानी से प्रकाशित होने वाले अखबारों को अपने से दूर रखता है। वहीं कुछ समय पूर्व स्थानीय छोटे समाचार पत्रों का विरोध भी खुलकर सामने आया था, लेकिन इसके बाद भी उनकी विज्ञापन के साथ-साथ अन्य समस्याओं को दूर नहीं किया जा सका। इसके साथ ही सूचना विभाग में ऐसे लोगों की भीड़ ज्यादा जमा रहती है, जो विज्ञापन के कारोबार में शामिल रहते हैं, उनकी लगातार उपस्थिति वहां के कई दफ्तरों में देखी जा सकती है। हालांकि विभाग का काम मुख्यमंत्री की विकास योजनाओं को मीड़िया के माध्यम से आम जन तक पहुंचाने का है, लेकिन देखने में आ रहा है कि मुख्यमंत्री की सूचनाओं को आम जन तक कम पहुंचाने के बजाए विज्ञापनदाताओं पर ज्यादा कृपा की जा रही है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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