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सत्ता की बढ़ती हठधर्मिता…

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-डॉ. आशीष वशिष्ठ||

अन्ना और रामदेव के आंदोलन से निपटने के लिए सरकार ने जो हथकंडे अपनाएं वो सत्ता की हठधर्मिता का परिचायक है. प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सत्तासीन दल और सरकार आंदोलनकारियों, विपक्षी दलों और आम आदमी की आवाज दबाने का जो कुकृत्य कर रही हैं वो किसी भी दृष्टिकोण से स्वस्थ प्रजातंत्र का लक्षण नहीं कहा जा सकता है. विश्व की सबसे सुंदर और विशाल प्रजातांत्रिक व्यवस्था का सत्ता के ठेकेदारों ने मजाक बनाकर रख दिया है. व्यवस्था व सिस्टम का सत्यानाश करने के बाद अब सत्ता हठधर्मिता पर उतारू है. सत्ता सुनने की क्षमता खोच चुकी है और सही बात को सुनने और समझने की बजाए दाम और दण्ड के बल पर खरीदने, दबाने और कुचलने पर उतारू है. बीते एक दशक में इस दमनकारी प्रवृत्ति में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जो प्रजातांत्रिक प्रणाली के घातक है.

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद केंद्र की यूपीए सरकार बौखलाहट में ऐसे कदम उठाती जा रही है जिनके पीछे विचार-विमर्श कम और तानाशाही प्रवृत्ति और हठधर्मिता अधिक दिख रही है. रोजाना एसएमएस भेजने की संख्या की निश्चित सीमा, सोशल नेटवर्किंग साइट पर नकेल की कोशिश, खुदरा कारोबार क्षेत्र में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश, मंत्रियों के विवादित बयानों पर चुनाव आयोग के नोटिस के बाद आयोग को सुधारने संबंधी मंत्रिमंडल के निर्णय की उड़ती खबरें, सीएजी के कामकाज पर निशाना और पर कतरनें की कोशिशें ये सारी बातें सरकार की इसी बौखलाहट को इंगित करती हैं. कुल मिला कर यह सब सत्ता के वास्तविक चरित्र को हमारे सामने रखता है. सरकार किसी भी तरह की हो- उदारवादी, अनुदारवादी, दक्षिणपंथी, वामपंथी, लोकतांत्रिक, तानाशाही, राजतंत्रीय- सबकी पहली प्राथमिकता सत्ता के तंत्र पर अपनी मजबूत पकड़ की होती है, वहां “जन” का सवाल बहुत पीछे रह जाता है.

सरकारों के अनेक कदम जो देशहित और जनहित के नाम पर उठाए जाते हैं उनके पीछे अपना हित होने की आशंका अक्सर जाहिर की जाती है. सत्ता के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता, इसके दांव-पेच कहीं अधिक प्रमुख हो जाते हैं. राजनीति की कुटिल नीतियों ने देश का बहुत नुकसान किया है. आतंकवाद, नक्सलवाद, भाषावाद, क्षेत्रीयतावाद, अलगाववाद, दंगे- देश को इन आतंरिक और बाहरी खतरों से बचाने के लिए जिस आम सहमति की, ईमानदारी की जरूरत है वह वर्तमान परिदृय में दिखाई नहीं देती. स्वतंत्रता से पूर्व ब्रिटिश हुकूमत हठधर्मिता की सभी सीमाओं को लांघकर क्रांतिकारियों से निपटने के लिए सरकारी मशीनरी का जमकर दुरूपयोग करती थी. आजादी के बाद भी परिस्थितियों में कमोबेश मामूली परिवर्तन ही आया है. राजनीतिक विरोधियों का मुंह बंद कराने के लिए हथकंडे प्रयोग करते रहते हैं लेकिन जिस तरह सरकार सामाजिक आंदोलनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से निपटने लगी है वो खतरनाक संकेत है. सत्ता की हठधर्मिता इमरजेंसी के दिनों की याद दिलाती है. सत्ता का कल्याणकारी स्वरूप धूमिल हो रहा है. वर्तमान में सत्ता वोट बैंक की राजनीति, कॉरपोरेट हितों और विदेशी कंपनियों के हितों की पोषक और संरक्षक की भूमिका निभा रही है.

असलियत यह है कि स्वतंत्रता के 65 वर्षों में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के चरित्र में गिरावट आई है. राजनीति ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार के कीचड़ में सनी है. भ्रष्टाचार ने देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति, सामाजिक ढांचें व व्यवस्था को बुरी तरह हिलाया है. भ्रष्टाचार के भूत ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा है. भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए अन्ना ने जन लोकपाल बिल के आंदोलन किया. भ्रष्टाचार से पीड़ित और दुखी जनता ने अन्ना के आहवान पर आंदोलन में बढ़-चढ़ का हिस्सा लिया. जन आंदोलन से घबराई सत्ता ने अपनी कमियों और गलतियों पर चिंतन, मनन करने की बजाय हठधर्मी रवैया अपनाया और दमनकारी कार्रवाइयों पर उतारू हो गई. एक स्वस्थ प्रजातांत्रिक प्रणाली व व्यवस्था की कमियों को उजागर करने और व्यवस्था की दशा-दिशा को दुरूस्त रखने में सामाजिक आंदोलन अहम् भूमिका निभाते हैं. रामदेव के कालेधन के विरोध में चलाए जा रहे आंदोलन, जन लोकपाल के लिए अन्ना की मुहिम पर जिस तरह सत्ता ने व्यवहार किया वो सामन्तवादी युग और राजशाही का नजारा कराने के लिए काफी था.

बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार हमें हमारा संविधान प्रदान करता है. प्रजातांत्रिक प्रणाली में संविधान और कानून के दायरे में रहकर नागरिक अपनी बात सत्ता तक पहुंचा सकते हैं. सामाजिक आंदोलनों पर डंडा चलाने के साथ सत्ता सोशल नेटवर्किंग साइट पर भी चाबुक चलाने से बाज नहीं आ रही है. कार्टूनिस्ट असीम को एक कार्टून बनाने पर राजद्रोही करार देना या फेसबुक पर टिप्पणी करना भी कानून के उल्लंघन की श्रेणी में शामिल है. सत्ता समस्या की जड़ का इलाज करने की बजाय पत्तों का झाड़कर काम चलाना चाहती है. ये प्रवृत्ति घातक और अकलमंदी का लक्षण नहीं है. सत्ता ये समझ नहीं पा रही है कि कमी कहां है और उसे सुधारना कैसा है. केजरीवाल कानून मंत्री सलमान खुर्शीद पर भ्रष्टाचार के आरोप मढ़ते हैं और सरकार कोई जांच कराने की बजाय उन्हें विदेश मंत्री का पद तोहफे में देकर आखिरकर क्या साबित करना चाहती है.

राबर्ट वाड्रा पर भी भ्रष्टाचार के इल्जाम लगते हैं, सत्ता आनन-फानन में जांच का ड्रामा करके क्लीन चिट दे दी. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजीत पवार सत्ता की हठधर्मिता के ही तो उदाहरण हैं. विधायिका, कार्यपालिक, न्यायापालिका और मीडिया का गठजोड़ देश के साधनों-संसाधनों को तो लूट ही रहा है, वहीं आम आदमी और विकास के हिस्से का रूपया भी हड़प रहा है. लेकिन बरसों-बरस सत्ता का आनंद लूट रहे राजनीतिक दलों और नेताओं को यही कतई बर्दाश्त नहीं है कि भीड़ से निकलकर कोई आम आदमी उनके खिलाफ कुछ बोले और उनसे सवाल-जबाव करे. इस मामले में तमाम राजनीतिक दलों का चरित्र एक समान है और ऐसे मामलों में वो एक दूसरे की भरपूर मदद भी करते हैं.

जनता अंदर ही अंदर सत्ता की कार्यप्रणाली, हठधर्मिता, नकारेपन, भ्रष्टाचार, लाल फीताशाही, मंहगाई और तमाम दूसरी समस्याओं से ऊबी हुई है. जनता गुस्से में है और बैचेनी बढऋती जा रही है. सरकार स्थितियों से अनजान नहीं है लेकिन इसके बावजूद वो हर मसले पर हठधर्मी व्यवहार अपनाकर आम आदमी के गुस्से, नाराजगी और बैचेनी को दबाना चाहती है. सरकार की नीति और नीयत से जनता भी बेखबर नहीं है. मीडिया भी सत्ता के सुर में सुर मिला रहा है जिसके चलते सोषल मीडिया लोकप्रिय हो रहा है और इस माध्यम का जमकर प्रयोग भी हो रहा है. सरकार को जन समस्याओं पर ध्यान देना होगा और सरकारी मषीनरी और मदद को पंक्ति में लगे आखिरी व्यक्ति तक पहुंचना होगा तभी प्रजातान्त्रिक राष्ट्र में सत्ता के कल्याणकारी स्वरूप की कल्पना साकार हो पाएगी. लेकिन जिस तरह सत्ता कानों में तेल डाले बैठी है उससे किसी भी समय असामान्य स्थितियां उत्पन्न हो सकती है जो प्रजा और तंत्र दोनों के हित में नहीं होगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “सत्ता की बढ़ती हठधर्मिता…

  1. जब हमाम में सब नंगें हों ,तो कौन किसको नंगा कहेगा.यही हालत इन राजनितिक दलों के नेताओं की है,अब जरूरत इस बात की है की जनता ही समय आने पर बिना भूले इन को सबक सिखाये.

  2. जब हमाम में सब नंगें हों ,तो कौन किसको नंगा कहेगा.यही हालत इन राजनितिक दलों के नेताओं की है,अब जरूरत इस बात की है की जनता ही समय आने पर बिना भूले इन को सबक सिखाये.

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