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हिमाचल पर्यटन उपेक्षा का शिकार…

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हिमाचल में पर्यटन की और किसी भी सरकार ने नहीं दिया ध्यान, कश्मीर के हालत सुधरते ही हिमाचल से हटने लगा पर्यटक..

धर्मशाला से अरविन्द शर्मा||

जम्मू-कश्मीर में सुधारते हालात हिमाचल के पर्यटन उद्योग को  छीन कर ले जाते दिखाई दे रहे है. प्रदेश के प्रमुख पर्यटक स्थल सर्दी में धूप सेंकते दिखाई देने लगे हैं,  जबकि कश्मीर के सामान्य हालात से वहां पर्यटकों की चहल पहल से दो चार होने लग पड़े हैं. यह पर्यटन को मज़बूत न कर पाने की हिमाचली कमजोरी है. कायदे से हिमाचल में पर्यटन की क्षमता, स्थायित्व, संभावना और अधोसंरचना को समझा ही नहीं गया. केवल कंक्रीट होटल उद्योग की मनाली, शिमला, मकलोडगंज, डलहौज़ी इत्यादि नगरियाँ मज़बूत की गयीं है परन्तु इन सीमेंट के खर्चीले कमरों में ठहरने वाला भारतीय एवं विदेशी पर्यटक आएगा किस लिए. पर्यटक को परोसने के लिए सरकार ने इतने सालों में (जब से कश्मीर में हालत बिगड़ने से पर्यटन हिमाचल की ओर सरका है) क्या  नया उभारा है जो पर्यटक को बार बार इस प्रदेश की और खींच सके.  हिमाचल के तीनो हवाई अड्डे बिना जहाज के महीनों से सुमसान पड़े हैं, सडको की हालत बुरी तरह से बिगड़ी हुई है. दो छोटी रेल लाइनों को भी पर्यटकों के लिए प्रदेश आकर्षण का केंदर न बना सकी है.  पर्यटक स्थलों पर पार्किंग तक की सुविधा नहीं है प्रदेश के प्रमुख आधा दर्जन पर्यटक स्थलों का ही मुआयना करें, तो ट्रैफिक जाम,पार्किंग अभाव और लूट के प्रभाव से पर्यटक न तो खुद दूसरी बार यहाँ आना चाहता है न ही दूसरों को यहाँ आने देता है.

सवाल तो यह है की आखिर हिमाचल में पर्यटक आएं ही क्यों? यहाँ उसके लिए क्या है पहाडो का आकर्षण होता है रज्जु मार्ग, और हिमाचल ने गत बीस वर्षों में ऐसे कई रज्जु मार्गों की स्कीमे बनायीं और सरकारी अलमारियों में दबा दीं. पूरे प्रदेश में एक भी मनोरंजन पार्क नहीं है, कोई फारेस्ट कैम्पिंग या पेड़ों पर रात गुजरने वाली टरी हाऊसिंग नहीं बड़े बड़े जलाशयों के बावजूद हाऊसिंग बोट जैसी सुविधा,जो केरल ने तो बना ली हिमाचल न बना पाया है. हिमाचल यदि खुद पर दृष्टिपात करके सोचे कि यह दशा क्या कहती है. पर्यटकों की नाखुशी के कारणों को नजरअंदाज करके जो ख्याति हमने अर्जित की, उसका खोखलापन सामने है. पर्यटन,  जो हिमाचल के लिए सोने की चिड़िया का काम कर सकता था उसके लिए आज तक कोई ठोस योजना  तैयार नहीं की गयी  और न ही पर्यटक सुविधाओं के मुताबिक प्रदेश का नजरिया तैयार हुआ. ब्रिटिश हुकूमत द्वारा सजाये गए  शिमला को हिमाचल की सरकारे  वर्ल्ड क्लास टूरिस्ट डेस्टीनेशन नहीं बना पाए और न ही महामहिम दलाईलामा की मौजूदगी से धर्मशाला-मकलोडगंज के भाग्य संवार पायीं हैं. लाहुल-स्पीति और किन्नौर की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि तथा बौद्ध मठों के इतिहास में पर्यटन की मंजिल तय न हुई. महाराणा परताप सरोवर में आने वाले लाखो विदेशी परिंदों से भी प्रदेश पर्यटन का नजरिया न बना सका  विडंबना यह है कि कश्मीर की सामान्य स्थितियां, हिमाचली पर्यटन को कंगाल बना देंगीं और  इस के लिए हिमाचल की सरकारें ही  ज़िम्मेदार मानी जायेंगीं.

हिमाचल के देश भर के सबसे शांत वातावरण,  कुद्रात की अथाह खूबसूरती और हर तरह की पर्यटक के लिए हर तरह के मौसम को भुनाने के लिए आज भी हिमाचल को कोई रोक नहीं रहा है. येहाँ के फादो पर स्कींग, परा ग्लाइडिंग तथा ट्रेकिंग को भोनाया जा सकता है,जिसके लिए रज्जू मार्गों का हर पहाड़ी पर्यटन स्थल पर होना अत्यन्त आवश्याक है शांत कृत्रिम एवं कुदरती झीलों में पर्यटकों के किये तैरते घरों की तथा जंगलों में पेड़ों पर लटके घरों की सुविधा एडी हम दें तो पर्यटक कश्मीर में क्यों जायेगा. राजनेता अपन विकास करने की निति त्याग कर जब पर्यटन के विकास की और ध्यान देंगे तो हिमाचल के कुदरती जखीरे पैसा उगलने लगेंगे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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