पिंक सिटी प्रेस क्लब - By: रोहित जैन "पारस"

जयपुर के पिंक सिटी प्रेस क्लब में भारी उथल-पुथल मचने के आसार हैं। प्रेस क्लब ने अपने वैसे 170 सदस्यों की सदस्यता खत्म करने का फैसला किया है जिनका संबंध मीडिया से नहीं रह गया है। प्रेस क्लब के इस फरमान से शहर के पत्रकारों में खासा रोष है।

खबर है कि प्रेस क्लब के संदेश बोर्ड पर गुरुवार को एक नोटिस चिपकाया गया है जिसमें इन सभी के निकाले जाने की घोषणा की गई है। खास बात यह है कि लिस्ट में शामिल कई सदस्य तो आजीवन सदस्य हैं जिन्हें विशेष परिस्थितयों में ही निकाला जा सकता है। एक निकाले गए सदस्य ने बताया कि कार्यकारिणी का यह कदम आंतरिक राजनीति का नतीजा है और वे जल्दी ही एस आदेश को अदालत में चुनौती देंगे।

लल्लू लाल शर्मा

हालांकि जब मीडिया दरबार ने इस बारे में पिंक सिटी प्रेस क्लब के अध्यक्ष लल्लू लाल शर्मा से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि अभी तक कोई नोटिस चस्पा नहीं किया गया है। शर्मा का कहना है कि कार्यकारिणी में कुछ सदस्यों को निकालने का फैसला तो किया गया है लेकिन अभी इस पर विचार किया जा रहा है।

गौरतलब है कि पिंक सिटी प्रेस क्लब में राजनीति अपने चरम पर है और अध्यक्ष के रवैये से नाराज हो कर कुछ सदस्य प्रेस क्लब आना ही बंद कर चुके हैं। इस क्लब से बाहर गए कुछ पत्रकार इसी साल जुलाई में मानसरोवर के नाम से एक नया प्रेस क्लब बना चुके हैं।

By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 thoughts on “पिंक सिटी प्रेस क्लब में सदस्य लाल पीले, अध्यक्ष लल्लू लाल ने निकाला 170 को”
  1. मुझे आश्चर्य नहीं हुआ यह सब पढ़ कर, अपितु तरस आता है कि लोग अपने पूर्ववर्तियों के अंजाम से कोई सबक नहीं लेते, बल्कि उन्हीं कृत्यों को दोहराने लगते हैं, सिर्फ यह सोच कर कि उनका जो हाल हुआ, वह मेरा भला कैसे हो सकता है ! किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि जिन कुकृत्यों के कारण रावण जैसा महाबलशाली स्वयं को तबाही से नहीं बचा सका, वैसे कुकृत्य पत्रकारिता का छद्म आवरण ओढ़े इन दलालों को कैसे बख्श देंगे! लेकिन इन्हें दलाल कहना भी उस पेशे का अपमान है, दरअसल ये ‘भिंडी बाज़ार’ में रेंगने वाले कीड़े हैं, जो कुछ नेताओं के तलवों तक पहुंच कर स्वयं के बारे में कई गलतफहमियां पाले हुए हैं, लेकिन वक्त बहुत बलवान है, वह सब समझा देता है और वह भी सिर्फ एक पल में !

  2. इन प्रेस क्ल्बन के चक्कर में नचकैये चमकन जात!

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