/* */

दिल्ली पर मोदी का दावा मज़बूत, चिदम्बरम हो सकते हैं कांग्रेस के पीएम

admin
Page Visited: 38
0 0
Read Time:14 Minute, 12 Second

वामपंथी जो राष्ट्रपति चुनाव के वक्त से काग्रेस के साथ फिर गठबंधन के लिए मरे जा रहे हैं, उन्हें साम्प्रदायिक शक्तियों के मुकाबले कांग्रेस का साथ देने का बहाना मिल जायेगा, जिसके लिए बंगाल माकपा का जोर ममता के साथ कांग्रेस के अलगाव के बाद बहुत बढ गया है. इसके साथ ही अंबेडकरवादियों और समाजवादियों को कांग्रेस के साथ बने रहने की मजबूरी बताने में सहूलियत हो जायेगी. दूसरी जो बड़ी संभावना है कि सत्ता के लिए कारपोरेट और बाजार को खुश करने की गरज से एफडीआई पर युद्धविराम के बाद अब संघी खेमा सुधार समर्थक रवैय्या अपनायेगा तो दूसरी ओर, भाजपा को रोकने के लिए वामपंथी सहमति भी कांग्रेस के साथ नत्थी हो जायेगी. 

इससे संसद के चालू सत्र में वित्तीय विधेयकों को पास कराने में चिदंबरम को भारी सुविधा होगी, जो अब मनमोहन के बदले बाजार और कारपोरेट के प्रधानमंत्रित्व के सबसे प्रबल उम्मीदवार हैं क्योंकि समीकरणों के मुताबिक भाजपा अभी सत्ता से बहुत दूर है. लब्बोलुआब कुल मिलाकर यह है कि जनसंहार की नीतियां जारी रहेंगी और जारी रहेगा अश्वमेध अभियान भी. इस परिदृश्य में धार्मिक राष्ट्रवाद ही इस देश की नियति है.

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास||

भाजपा के पास कांग्रेस के उग्रतम हिंदुत्व के मुकाबले के लिए  और इससे बढ़कर भाजपा और संघ

परिवार में मचे घमासान से निपटने के लिए धर्मनिरपेक्षता और तथाकथित वैविध्य और समरसता का मुलम्मा उतार फेंककर नरेद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व की दावेदारी पर मुहर लगाने के अलावा कोई दूसरा चारा ही नहीं बचा था.पिछले लोकसभा चुनाव में हिंदुत्ववादी शक्तियों के कांग्रेस के पक्ष में ध्रुवीकरण के अनुभव को देखते हुए संघियों की अपनी पुरानी आक्रामक धार्मिक राष्ट्रवाद की राह पकड़ना बहुत स्वाभाविक है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के उस बयान का समर्थन किया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री पद के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी योग्य हैं. पार्टी ने मोदी को सबसे लोकप्रिय और सफल मुख्यमंत्री बताया है.

राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, ‘गुजरात के मुख्यमंत्री बहुत सफल और लोकप्रिय हैं. हम निश्चित तौर पर उनकी प्रशंसा करेंगे.’ जेटली ने लगे हाथ कांग्रेस को भी आड़े हाथों लिया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस को मोदी फोबिया हो गया है इसलिए वह उन पर हमले करती रहती है. जेटली ने हालांकि सुषमा की तरह सीधे तौर पर मोदी को पीएम पद का उम्‍मीदवार तो नहीं बताया लेकिन एक सवाल के जवाब में उन्‍होंने इतना जरूर कहा, ‘मोदी बेहद सफल लोकप्रिय मुख्‍यमंत्री हैं. बीजेपी में उनका आकर्षण है और पार्टी को उनको आगे रखने में फायदा होता है. चूंकि मोदी हमारे पार्टी के नेता है, तो हम उनकी तारीफ नहीं करेंगे तो कौन करेगा?’

बीजेपी में पीएम पद की उम्‍मीदवारी को लेकर जारी बयानबाजी के बीच कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने चुटकी ली है. उन्‍होंने सवालिया लहजे में कहा, ‘क्‍या आडवाणी ने पीएम बनने की उम्‍मीद छोड़ दी है.’

सुषमा ने शनिवार को वड़ोदरा में कहा था कि मोदी निश्चित तौर पर इसके (प्रधानमंत्री) लिए योग्य हैं और इसमें कोई संदेह नहीं है. इस बारे में विस्तार से बताने के लिए पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘मोदी काबिल और योग्य दोनों हैं. उनकी प्रशंसा करने में कुछ भी गलत नहीं है.’जहां कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में पीएम पद के दावेदारों के नाम उछल रहे हैं तो उधर बीजेपी में भी पीएम पद के उम्मीदवार को लेकर धुंआ काफी दिनों से उठ रहा है. बीजेपी नेताओं की पूरी पलटन चुनाव प्रचार में कूद पड़ी है. कांग्रेस पर कारपेट बाम्बिंग हो रही है. इन सबके बीच दिल्ली पर मोदी के दावे को सुषमा ने समर्थन की हवा दे दी है. वडोदरा में सुषमा ने कहा- मोदी प्रधानमंत्री बनने के काबिल हैं. सुषमा स्वराज साफगोई से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद की काबलियत का सर्टिफिकेट दे रही हैं. सवाल ये है कि सुषमा के इस बयान का क्या मतलब निकाला जाए. क्या सुषमा स्वराज मोदी को पीएम बनाने पर वाकई सहमत हैं? क्या बीजेपी में मोदी के नाम पर ध्रुवीकरण होने लगा है? या महज एक रस्मी और औपचारिक बयान है?जाहिर है कि यह न सुषमा और  न जेटली के निजी विचार है, इसके पीछे संघ मुख्यालय की सोची समझी रणनीति है. जिसकी अवमानना न सुषमा कर सकती हैं और न जेटली कोई जोखिम उठा सकते हैं.जब लौह पुरुष लालकृष्म आडवानी तक ने प्रधानमंत्रित्व के सपने को तिलांजलि दे दी , तब सुषमा और जेटली की क्या बिसात मालूम हो कि मृत्यु से पहले बालासाहेब देवरस ने सुषमा में बेहतरीन प्रधानमंत्री बनने की संबावना बतायी थी. जाहिर कि संघ परिवार में इस मसले पर विचार तक नहीं हुआ. सुषमा के पास आत्मसमर्पण के अलावा कोई उपाय बचता है क्या?

इसके साथ ही सत्ता समीकरण में घनघोर बदलाव के आसार नजर आते हैं.वामपंथी जो राष्ट्रपति चुनाव के वक्त से काग्रेस के साथ फिर गठबंधन के लिए मरे जारहे हैं, उन्हें साम्प्रदायिक शक्तियों के मुकाबले कांग्रेस का साथ देने का बहाना मिल जायेगा, जिसके लिए बंगाल माकपा का जोर ममता के साथ कांग्रेस के अलगाव के बाद बहुत बढ़ गया है. इसके साथ ही अंबेडकरवादियों और समाजवादियों के कांग्रेस के साथ रहने की मजबूरी बताने में सहूलियत हो जायेगी.दूसरी जो बड़ी संभावना है कि  सत्ता के लिए कारपोरेट और बाजार को खुश करने की गरज से एफडीआई पर युद्धविराम के बाद अब संघी खेमा सुधार समर्थक रवैय्या अपनायेगा तो दूसरी ओर, भाजपा को रोकने के लिए वामपंथी सहमति भी कांग्रेस के साथ नत्थी हो जायेगी. इससे संसद के चालू सत्र में वित्तीय विधेयकों को पास कराने में चिदंबरम को भारी सुविधा होगी, जो अब मनमोहन के बदले बाजार और कारपोरेट के प्रधानमंत्रित्व के सबसे प्रबल उम्मीदवार हैं क्योंकि समीकरणों के मुताबिक भाजपा अभी सत्ता से बहुत दूर है. लब्बोलुआब कुल मिलाकर यह है कि जनसंहार की नीतियां जारी रहेंगी और जारी रहेगा अश्वमेध अभियान भी. इस परिदृश्य में धार्मिक राष्ट्रवाद ही इस देश की नियति है.डेढ़ साल पहले भोपाल गैस त्रासदी मामले में अदालत का फैसला आने के बाद केन्द्र और मध्य प्रदेश की सरकार ने वादा किया कि किडनी और कैंसर के गंभीर मरीजों को दो-दो लाख रुपये मिलेंगे. मगर त्रासदी के 28 साल बाद भी हजारों मरीज मुआवजे से महरूम हैं. आपको बता दें कि 3 दिसंबर 1984 को भोपाल यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से जहरीली गैस निकलने से 15 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, जबकि हजारों लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ गए.देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर में लगातार आ रही गिरावट के बीच कारोबारी जगत को अभी हालात और बिगडने की चिंता सताने लगी है.

गुजरात विधानसभा चुनावों में बीजेपी के तीन दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली और नितिन गडकरी आज मोदी के पक्ष में प्रचार करने राज्य में पहुंचे हैं. लेकिन कांग्रेस के लिए एक बुरी खबर है. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से टिकट न मिलने से नाराज नरहरि अमीन पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम सकते हैं. इस मामले में केंद्र सरकार में मंत्री राजीव शुक्ला दखल दे रहे हैं. इस बीच, खबर है कि कांग्रेस 18, 19 और 20 जनवरी को जयपुर में मंथन करेगी.

दुनिया की मशहूर पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने देश के मौजूदा वित्त मंत्री पी चिदंबरम को 2014 में कांग्रेस का प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार बताया है. पत्रिका के मुताबिक पिछले दिनों सरकार को तमाम मुसीबतों से निकालने में चिदंबरम की बड़ी भूमिका रही है. पत्रिका के मुताबिक जब से चिदंबरम पिछले साल अगस्त में वित्त मंत्रालय में लौटे हैं तब से उनकी किस्मत चमक गई है.पत्रिका ने दो बड़े राजनैतिक घटनाक्रम का हवाला दिया है. पहला जब ममता बनर्जी ने एफडीआई के मुद्दे पर समर्थन वापस लिया तब चिदंबरम ने एफडीआई के फायदों को बाकी पार्टियों को बताया और डीएमके जैसे नाराज सहयोगी को मनाने में कामयाब रहे. दूसरा पिछले महीने 27 नवंबर को वित्त मंत्री ने कैश सब्सिडी योजना का ऐलान किया.जानकारों का मानना है कि कैश सब्सिडी योजना 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए तुरूप का पत्ता साबित हो सकती है. हालंकि ये योजना बीजेपी सरकार की सोच थी लेकिन चिदंबरम ने इसे लागू किया. पत्रिका का ये भी मानना है कि पिछले दिनों चिदंबरम ने जिस तरह आधार कार्ड का समर्थन किया और वो भी उनके हक में जाता है.

चिदंबरम आधार कार्ड का विरोध करते थे. और तो और पिछले दिनों उन्होंने कैश सब्सिडी योजना के ऐलान के वक्त हिंदी में भी भाषण दिया. पत्रिका का ये कहना है कि चिदंबरम हिंदी में जिस तरह संबोधित कर रहे हैं उसका मकसद उत्तर भारतियों के दिल में जगह बनानी है. पत्रिका का मानना है कि इस वक्त चिदंबरम कांग्रेस के सबसे ताकतवर मंत्री हैं. क्योंकि उनको टक्कर देने वाले प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति भवन पहुंच चुके हैं. और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी फिलहाल कोई बड़ी जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं. ऐसे में चिदंबरम ही पीएम पद के प्रबल दावेदार नजर आ रहे हैं.वहीं कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कहा कि वो इस मामले में टिप्पणी नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि वो बस इतना ही कहेंगे कि प्रधानमंत्री कांग्रेस पार्टी ही तय करेगी, कोई दूसरी पार्टी तय नहीं करेगी. कांग्रेस पार्टी 2014 के चुनाव के लिए पूरी तरह से तैयार है. 2014 में भी हमारी सरकार बनेगी और जो नए सांसद चुन के आएंगे उनके फैसले से देश का प्रधानमंत्री पार्टी हाईकमान तय करेंगी. जबकि कांग्रेस नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने इन खबरों का खंडन किया है.

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

मुलायम का मंदिर बनेगा..

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का शासन आने के बाद अब सपा भी अपनी सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी बसपा की राह […]
Visit Us On TwitterVisit Us On FacebookVisit Us On YoutubeVisit Us On LinkedinCheck Our FeedVisit Us On Instagram