भारत-पाकिस्तान के बीच एक सेतु का अवसान..

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-प्रणय विक्रम सिंह||

भारत की विदेश नीति को एक नई शैली से परिचय कराने वाले पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की जिंदगी का सफर बीते शुक्रवार को पूरा हो गया। भारत के अन्य प्रधानमंत्रियों से अलग शारीरिक विन्यास ,अलग अभिव्यक्ति शैली ने उन्हे विश्व समाज के उदारवादी तबके के बीच खासा लोकप्रिय बनाया। विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आए गुजराल का जन्म 4 दिसंबर, 1919 में झेलम में हुआ था। गुजराल के पिता का नाम अवतार नारायण गुजराल तथा मां का नाम श्रीमती पुष्पा गुजराल था। उनका विवाह 26 मई, 1946 को शीला देवी के साथ हुआ।

पिता आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाते रहे तो गुजराल भी कम उम्र में ही आजादी की जंग में कूद गए। 1931 में पहली बार इन्हें ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। आरोप लगाया गया कि गुजराल देश के युवाओं को भडका रहे हैं। खूब मारा गये। 23 साल की उम्र में 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के समय फिर जेल भी जाना पड़ा। आजादी के आंदोलन में सक्रिय रहने के बावजूद उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने बीकॉम, एमए, पीएचडी के साथ डी.लिट की भी उपाधियां प्राप्त की हैं। कई भाषाओं के जानकार गुजराल उर्दू भी धारा प्रवाह बोलते हैं। उर्दू काव्य में उनका काफी योगदान रहा है। इंदर कुमार गुजराल के निधन के साथ ही देश ने भारत और पाकिस्तान के बीच एक सेतु खो दिया है। गुजराल ने दोनों देशों के लोगों के बीच सम्पर्क बढ़ाने के लिए काम किया। उनका पाकिस्तान के नेताओं, वहां के जानेमाने विद्वानों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से घनिष्ठ सम्पर्क था।

पड़ोसी मुल्क से साथ उनकी इन भावनाओं की जड़ें बहुत गहरी हैं। उनके पिता अवतार नारायण गुजराल पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य थे और वे अपने पिता के सहायक के तौर पर काम करते थे। अविभाजित पंजाब के तमाम विधायकों ने उन्हें संविधान सभा के लिए नामित किया था। गुजराल के निधन का शोक बांग्लादेश में भी महसूस किया जाएगा क्योंकि वे बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में वहां के लोगों के साथ पहले दिन से जुड़े हुए थे। वैसे तो पाकिस्तान और बांग्लादेश एक दूसरे के विरोधी रहे हैं लेकिन फिर भी दोनों ही मुल्क महसूस करते हैं कि गुजराल उनके करीबी मित्र थे। विदेश मंत्री के तौर पर उनकी गुजराल डॉक्ट्रिन को हमेशा याद किया जाएगा। उन्होंने भारत के खर्चे पर पड़ोसी मुल्कों को रियायतें दीं ताकि उनसे संबंधों में निकटता बढ़ाई जा सके। इसके साथ ही उन्होंने ये साबित भी कर दिया कि भारत समय आने पर अपने पड़ोसियों की जरूरतें भी पूरा कर सकता है।

मौजूदा पाकिस्तान के लाहौर स्थित डीएवी कॉलेज से स्नातक गुजराल छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे थे। विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आए गुजराल भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे।1950 के दशक में वे एनडीएमसी के अध्यक्ष बने और उसके बाद अप्रैल 1964 में वे राज्य सभा के सदस्य बने थे। गुजराल के बारे में कहा जाता है कि वे उस गुट में शामिल थे जिसने इंदिरा गांधी को वर्ष 1966 में प्रधानमंत्री बनने में मदद की थी। अच्छे पड़ोसी संबंध को बनाए रखने के लिए गुजराल सिद्धांत का प्रवर्तन करने वाले गुजराल कांग्रेस छोडकर 1980 के दशक में जनता दल में शामिल हो गए। वह 1989 में वीपी सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा सरकार में विदेशमंत्री बने। विदेश मंत्री के तौर पर इराकी आक्रमण के बाद वह कुवैत संकट के दुष्परिणामों से निपटे, जिसमें हजारों भारतीय विस्थापित हो गए थे।  प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से पहले गुजराल ने केंद्र में राज्यमंत्री के तौर पर कई मंत्रालयों को संभाला। साथ में ही वह कई देशों में राजदूत भी रह चुके हैं। इन्होंने संचार एवं संसदीय कार्य मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, सडक एवं भवन मंत्रालय तथा योजना एवं विदेश मंत्रालय का जिम्मा संभाला है।

गुजराल भारत के बारहवें प्रधानमंत्री थे। देश में सबसे कम शासन करने वाले प्रधानमंत्रियों में शुमार गुजराल किस्मत से प्रधानमंत्री बन गए थे। 1997 में जब कांग्रेस की समर्थन वापसी के डर के कारण संयुक्त मोर्चा सरकार ने नेतृत्व परिवर्तन की उसकी मांग स्वीकार कर ली और गुजराल को प्रधानमंत्री बना दिया।  लेकिन एक साल के अंदर ही उनकी किस्मत ने उनका साथ छोड़ दिया। देश की राजनीति ने फिर करवट ली और  19 मार्च, 1998 को कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के बाद उन्हें भी पद छोडना पड़ा। अल्प अवधि के लिए प्रधानमंत्री रहने वाले गुजराल को न केवल विदेश मामलों पर अपनी समझ बल्कि घरेलू समस्याओं का समाधान के प्रति नजरिए के लिए भी हमेशा याद किया जाएगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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