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मौलिकता बनाये रखें, नकलची न बनें

By   /  November 30, 2012  /  1 Comment

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– डॉ. दीपक आचार्य||

आजकल सर्वाधिक संकट मौलिकता पर पड़ा है. चाहे वह व्यक्तित्व की बात हो या कर्मों की, जीवनशैली से लेकर कार्य व्यवहार और परिवेशीय हलचलों की. सभी जगह मौलिकता गौण हो गई है और उपयोगिता पर जोर दिया जाने लगा है. चाहे वह उपयोगिता कैसी भी हो.

संसार के दूसरे कामों की ही तरह सर्वत्र येन-केन-प्रकारेण उपयोग और उपभोग दो ही लक्ष्य आज की पीढ़ी के सामने हैं. फिर भले ही इनकी प्राप्ति के लिए किसी भी प्रकार के रास्तों को क्यों न अपनाना पड़े.

कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो दुनिया के ज्यादातर लोगों की भीड़ इसी दिशा में निरन्तर भागने लगी है.  हर कोई सब कुछ पा जाना चाहता है और इसके लिए वह किसी भी लंबी रेस के लिए तैयार है. दूसरों की छाती पर मूंग दलने से लेकर औरों के कंधों पर चढ़कर भी आदमी वह सब कुछ हथिया लेना चाहता है जिसे वह औरों के पास देखता है.

एक ओर फैशनपरस्ती और दिखावे का दौर चरम यौवन पर है और दूसरी तरफ हर काम में नकल करने का भूत. कोई भी आदमी अब कुछ नया नहीं करना चाहता है, वह दूसरों की थाली से छीनने का आदी होता जा रहा है और इसी प्रवृत्ति की वजह से आदमी का चिंतन समाप्त हो गया है. वह चिंतन जिसका आश्रय पाकर आदमी नवीन सोच और मौलिक कल्पनाओं को आकार देने में पूरे मनोयोग से परिश्रम करता था और दुनिया को कुछ न कुछ नया देने के लिए उद्यत रहता था.

उसके इस कर्म के हर पहलू में मौलिकता की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी और उसके इस शुचिता भरे कर्म की गंध अपने आप दूर-दूर तक फैल जाती थी. इसके लिए उसे किसी भी प्रकार के अतिरिक्त परिश्रम या आत्म प्रशस्ति की आवश्यकता नहीं हुआ करती थी.

आज मामूली और सस्ती लोकप्रियता पाने भर के लिए लोग अपनी मौलिकता को तिलांजलि दे रहे है और अपनाने लगे हैं वे सारे रास्ते जहां पग-पग पर है नकल की भरमार, कुटिलताओं और षड़यंत्रों का अंबार, बदलाव ऎसा कि कहीं मौलिकता के दूर-दूर तक दर्शन ही न हों.

बात शिक्षा-दीक्षा, लेखन, काव्य, साहित्य, तमाम जात के मीडिया की हो या सोशल नेटवर्किंग साईट्स की. लोग लोकप्रियता के लिए अपनी खुद की मौलिकता को छोड़-छुड़ा कर जबर्दस्त नकलची होते जा रहे हैं.

दूसरों की सामग्री को अपने नाम से परोसने का जो शगल इन दिनों हर कहीं देखने को मिल रहा है उतना पिछले दशकों में कभी नहीं. खूब सारे लोग ऎसे हैं जो खानसामाओं की तरह दूसरे लोगों की सामग्री को फ्राई कर पेश करने के आदी हो गए हैं.

इन लोगों के जीवन में नकल के सिवा कुछ नहीं है. जो लोग इस प्रकार नकलची हो गए हैं उनकी आत्मा मरी हुई होती है तभी तो ये लोग मौलिकता का परित्याग कर हर मामले में नकल करने में भिड़े हुए छद्म रास्तों से लोकप्रियता पाने के जतनों में रमे हुए हैं.

यों तो नकलचियों की बहुत सारी जनसंख्या संसार में अपने विभिन्न करतबों के जरिये कमा  खा रही है लेकिन आजकल साईबर मीडिया के युग में नई किस्म के नकलचियों की भरमार होती जा रही है.

इंटरनेट पर नकलचियों का साम्राज्य सबसे ज्यादा पसरा हुआ है. खासकर ब्लॉग्स और सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर नकलचियों की इतनी संख्या बढ़ गई है कि इन्होंने बंदरों को भी पीछे छोड़ दिया है.

किसी भी साईट पर किसी भी प्रकार की सामग्री डालते ही कुछ मिनट बाद इसका अपहरण हो जाता है और दूसरे-तीसरे नामों से यह सामग्री साल भर तक इधर-उधर चलती रहती है. अपने क्षेत्र को ही देखें तो कई सारे चेहरे सामने आ जाते हैं जो ऎसी नकल में बेशर्मी के साथ माहिर हैं. खुद को कुछ करना है नहीं, जो सामग्री कहीं से तैयार मिल जाती है उस पर डाका मार देते हैं और अपने नाम से चिपका देते हैं.

नकलचियों की एक किस्म तो दिन-रात यही काम करती रहती है. दूसरों के लेखों,छायाचित्रों और उपयोगी जानकारी को देखते हुए ये इसे चुरा कर अपने नाम से ऎसे चस्पा कर देते हैं जैसे इन्होंने बरसों से चिंतन कर कोई नया आविष्कार ही कर लिया हो.

नकल कर पायी गई सामग्री का इस्तेमाल आजकर प्रचार के सभी माध्यमों में धड़ल्ले से हो रहा है. सामग्री चुराने वालों में दो किस्मे हैं. पहली किस्म उन लोगों की है जो थोड़ी-बहुत बुद्धि रखते हैं वे चालाकी के साथ थोड़ा फेरबदल कर लेते हैं.

दूसरी किस्म में वे लोग हैं जिनके लिए मुद्रा और प्रचार ही साध्य है जो जीवन भर उनके लिए सर्वोपरि रहता है और ये लोग किसी और की किसी भी प्रकार की सामग्री को बिना किसी बदलाव के अपने नाम से कहीं भी चस्पा कर देते हैं. इसे इन लोगों का दुस्साहस कहें या कुछ और, ये पूरी बेशर्मी के साथ अपने इन कामों को अंजाम देते रहते हैं.

दोनों ही किस्मों के लोग हमारे अपने क्षेत्र में भी मौजूद हैं और दूसरे इलाकों में भी. इन बेशर्म और नकलचियों की भूमिका किसी डकैत से कम नहीं हुआ करती है.  विभिन्न माध्यमों और फेसबुक तथा इस जैसी विभिन्न साईट्स पर ऎसे नकलचियों का पूरा संसार पसरा हुआ है जो इसी काम में लगा रहता है.

खासकर फेसबुक पर ऎसे नकलची डकैतों की भरमार है. किसी ने कोई अच्छी सामग्री डाली नहीं कि थोड़ी देर बाद यह किसी दूसरे के नाम से सामने आ जाती है. किसी भी प्रकार की सामग्री को लाईक या शेयर करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन सामग्री को अपने नाम से परोस देने की बेशर्मी अब सारी हदें पार करती जा रही है. जो लोग सोशल साईट्स के कद्रदान या उपयोगकर्ता हैं उनको अच्छी तरह पता है इन बेशर्म नकलचियों के बारे में.

जीवन में सुकून पाने के लिए नकल की बजाय जरूरी है मौलिकता. जब तक मौलिकता न आए, तब तक हमें न आनंद मिल सकता है न संतोष, चाहे हम कितनी ही सामग्री को चुरा-चुरा कर अपने नाम से चस्पा करते रहें.

नकल करना जब परंपरा बन जाता है तब नकलची व्यक्ति का बचा-खुचा चिंतन सामथ्र्य भी जवाब दे जाता है और ऎसे लोग अपनी जिन्दगी मेंं हमेशा पराश्रित ही रहने को विवश होते हैं. इसलिए वास्तविक आनंद की प्राप्ति करना चाहें तो प्रत्येक कर्म में शुचिता और मौलिकता को अपनाएं अन्यथा परायी सामग्री और परायों के भरोसे आपकी भैंस कभी भी वैतरणी पार नहीं कर पाएगी.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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