शिक्षा और दवा के कोष को डकार गए बिहार के सरकारी कुत्ते…

admin

भारत और भारत में पत्रकारिता – एक “खुला बाज़ार” जहाँ “शब्दों को वाक्यों में ढालने की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अपने-अपने कनेक्शन से कौन कितना धन एकत्रित करने की क्षमता रखता है जो लालाओं को खुश रख सके?

भारत की संसद से सौ कदम दुरी पर रफ़ी-मार्ग पर स्थित आई एन एस बिल्डिंग के नीचे ईंट-पत्थर से बनी संजय (महाभारत काल में भी संजय थे जो भविष्य में होने वाली घटनाओं को देखते थे) की चाय की दुकान एक-मात्र चश्मदीद गवाह है.. भारत, विशेषकर देश की राजधानी में पत्रकारों और पत्रकारिता के ढलते, लुढ़कते, गिरते, स्तर का…

 

-शिवनाथ झा||

नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में जब टाइम्स ऑफ़ इंडिया के तत्कालीन संपादक गिरिलाल जैन और इन्दर मलहोत्रा साहेब को “अकस्मात” बहादुर शाह ज़फर मार्ग पर पैदल निकलते देखा, समझ लिया भारत में पत्रकारिता ने, चाहे हिंदी हो या अंग्रेजी, अपनी दिशा बदल ली है. क्योकि पत्रकारिता जगत में एक ओर जहाँ “सोशलिस्टस” का प्रवेश हो चुका था, वहीँ दूसरी ओर समाचार-पत्र और टीवी के नामी-गरामी (तथाकथित) पत्रकार बंधू “मालिक बनने” का सपना देखना शुरू कर दिए थे. अपने सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने पाठकों-दर्शकों को तलवार के ‘हाशिये’ पर रखा और बेचारे पाठक और दर्शक वही पढने लगे, देखने लगे जो वे पत्रकार बंधू पढ़ाना, दिखाना चाहते थे.

पिछले दो दशक में एक ओर जहाँ पत्रकारों की लम्बी ‘सेना’ खड़ी हुई, वही दूसरी, ओर भारत की गलियों से दिल्ली की रायसीना हिल तक समाचार-पत्र, पत्रिकाओं और टीवी चैनलों का भरमार भी हुआ और इसका गवाह विभिन्न राज्य सरकारों और भारत सरकार के पत्र-सुचना कार्यालय में ‘निबंधित’ पत्रकारों की सूची है.

हम समाचार-पत्र, पत्रिकाओं या टीवी चैनलों की बढती कतार के विरुद्ध नहीं हैं, लेकिन इस बात को संभवतः भारत का प्रत्येक पाठक और दर्शक मानेंगे कि भारत की पत्रकारिता में जबरदस्त गिरावट आई है. लेकिन, वही दूसरी ओर, पाठक भी उतने ही दोषी हैं, विशेषकर समाचार पत्रों के चुनाव में – किस अखबार को खरीदें, पढ़ें और किसे नहीं.

नब्बे के दशक में ही पटना के मोइनुल हक़ स्टेडियम में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. यह स्टेडियम मूलतः फुटबॉल और क्रिकेट के लिए बना था. पटना से प्रकाशित सभी समाचार पत्रों ने अपने-अपने तरीके से इस खबर को छापा, क्योकि उन्हें डर था की कहीं राज्य सरकार से मिलने वाले विज्ञापन पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े.

दिल्ली से प्रकाशित “जनसत्ता” के संवाददाता श्री सुरेन्द्र किशोर ने निर्भीक रूप से लिखा: “फुटबाल के मैदान में थिरकेंगे अभिनेत्रियों की घुंघरू” – यह राज्य सरकार पर सीधा प्रहार था. उसी समाचार पत्र के संपादक श्री प्रभाष जोशी ने कुछ दिन बाद बिहार सरकार द्वारा शिक्षा और दवाई के लिए निमित्त राशि को सरकारी अधिकारीयों द्वारा “गबन” की कहानी को कुछ इस कदर के शीर्षक में लिखा: “शिक्षा और दवा के कोष को डकार गए बिहार के सरकारी कुत्ते”.

हम यह नहीं कहेंगे की आज पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसे “दबंग लेखकों” की कमी है, चाहे हिंदी पत्रकारिता हो या अंग्रेजी, लेकिन क्या आज के “संपादकों के पिछवारे में इतनी ताकत है कि वे लालाओं (मालिकों) के आर्थिक हितों को नजर-अंदाज कर अपने समाचार-पत्र, पत्रिका या टीवी चैनलों में छाप सकें या दिखा सकें? यदि पिछले दो दशकों के भारतीय पत्रकारिता को देखा जाये तो शायद नकारात्मक उत्तर ही मिलेगा नहीं तो समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठ पर अर्ध-नग्न महिला की उभरती स्तन या फिर … नहीं छापा जाता.

“संपादक” किसी भी समाचार-पत्र, पत्रिका या टीवी चैनल का मुखिया होता है, आईना होता है. लेकिन आज की पत्रकारिता में कितने संपादक है जो यह कह सकें की वे ‘सरकारी-संपर्कों’ – मंत्री से संत्री तक – का लाभ नहीं लेते? कितने संपादक है जो किसी संवाददाता के लेख या उसके विचार के पीछे “लालाओं के सामने” अडिग खड़े रहने का हिम्मत रखते हैं? शायद नहीं के बराबर और जो “दावा” करते हैं “वे झूठ बोलते हैं” क्योकि “हँसना और गाल फुलाना” दोनों एक साथ नहीं हो सकता है.

एक सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात: नब्बे के दशक में जितने वरिष्ठ संवाददाता थे, या संपादक की श्रेणी में थे, उनमें से ज्यादातर आज प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से “लालाओं” की श्रेणी में आ गए हैं. यानि समाचार पत्र, पत्रिका या टीवी चैनलों के मालिक बन गए हैं. और “मालिक कभी पत्रकार हो ही नहीं सकता” क्योंकि उसे अपना संस्थान  चलाना होता है, कर्मचारियों को तनखाह देना होता है – जहाँ आज ने नए-नवेले पत्रकार, कुछ अनुभवी भी, अपने-अपने 42-दाँतों को फाड़-कर मुंह बाये पैसे मांगते हैं, चाहे वे पत्रकारों की तरह सोच रखते हों या नहीं, लिखने की अदा छोड़ दें – मुनाफा कमाना होता है. इतना ही नहीं, आज पत्रकारों का भी एक “ग्रुप’ है जो अपने ग्रुप के साथ एक संस्थान से दुसरे संस्थान की ओर कूच करते हैं जहाँ उन्हें अधिक से अधिक लक्ष्मी का आगमन दीखता है.

इसे भारतीय पत्रकारिता का दुर्भाग्य ही कहेंगे की आज अनेकों ऐसे “पत्रकार” हैं जो महा-महिम राष्ट्रपति से अधिक तनखाह पाते हैं.

पिछले दिनों भारत के एक बड़े समाचार पत्र समूह के मालिक ने स्पष्ट तौर पर कहा की वे समाचार पत्र नहीं निकालते, उन्हें मुनाफा चाहिए, इसलिए अधिक से अधिक विज्ञापन, चाहे उसकी श्रेणी कुछ भी हो, छापते  हैं. अब अगर “लालाजी” यानि समूह का मालिक सार्वजानिक तौर पर यह कहता है, तो उस संस्थान में कार्य करने वाले, विशेषकर सम्पादकीय विभाग, कर्मचारियों को “पत्रकारों की श्रेणी में माना जायेगा?” इसका निर्णय तो पाठक करेंगे – लेकिन पाठक इतनी पीड़ा क्यों उठाएंगे?

एक और बात, पिछले दो दशकों में इन संस्थानों में संवाददाता या सम्पादकीय विभाग में कार्य करने वाले लोगों और संपादकों के बीच की दूरियाँ कम होने से भी पत्रकारिता का हनन हुआ है.

बड़े-बुजुर्ग कहते थे कि घर में “माता-पिता या सगे भाई के अतिरिक्त घर की किसी भी महिला को, यहाँ तक की छोटे भाई की पत्नी को भी, पति के बड़े भाई या किसी भी अन्य पर-पुरुष के सामने नहीं आना चाहिए. उनका सोच बहुत ही उम्दा था और ‘वजह पूर्ण भी’.

इसी बात को यदि समाचार-पत्र, पत्रिकाओं या टीवी चैनलों के साथ लागू किया जाये (वह भी एक परिवार है), तो ‘ऐसी परम्परा का उल्लंघन (यानि शीर्षस्थ और कनिष्ठ कार्यकर्ताओं के बीच सिमटती दूरियां) के कारण ही आज इन संस्थानों में ‘कार्य-स्थल पर होने वाली सेक्सुअल असाल्ट की घटनाएँ सामने आ रही हैं. भारतीय पत्रकारिता जगत में पिछले दिनों अनेकों ऐसी घटनाएँ हुयी है जिसके कारण या तो पुरुष संस्थान से बाहर निकाले गए हैं, या फिर महिला को दरवाजा दिखाया गया है. सभी तरह के चारित्रिक पतन, चाहे मानसिक हो, लेखनी के हो या व्यावहारिक हो, खुलकर सामने आ रहे है.

अभी पिछले दिनों हिंदी पत्रकारिता के एक मूर्धन्य संपादक ने कहा की पत्रकार भी समाज के ही अंग हैं इसलिए समाज में होने वाले बदलाव के प्रभाव से वे वंचित नहीं रह सकते! बिलकुल सत्य कहा उन्होंने.

लेकिन “पत्रकार तो समाज को बदलता है. समाज को नयी दिशा दिखाने का मार्ग प्रशस्त करता है. समाज का आईना होता है. सम्पूर्ण समाज की निगाहें उनपर टिकी होती है. फिर समाज में होने वाले परिवर्तन का प्रभाव उसपर कैसे? महात्मा गाँधी भी एक पत्रकार थे – समाज और सामाजिक गतिविधियों का असर तो उनपर नहीं पड़ा. उन्होंने समाज को बदला, लोगों को बदला. खैर जो भी हो, समय आ गया है की समाज के लोग इसपर चिंतन करें.

सन 1991 में जब दिल्ली आया था तब आई एन एस बिल्डिंग (जहाँ भारत वर्ष के लगभग सभी समाचार-पत्रों का दफ्तर है) में आनंद बाज़ार पत्रिका का भी दफ्तर था. मैं इसी समूह से प्रकाशित “सन्डे पत्रिका” का एक अदना सा संवाददाता था. मुखर्जी नगर से 185 नंबर की बस से पटेल चौक पर उतरना और फिर 11-अप (पैदल) से दफ्तर आना जब झाड़ू मारनेवाला कर्मचारी सफाई करते रहता था, नित्य की आदत सी हो गयी थी. अक्सर वह कहता भी था कि “इतनी जल्दी क्यों आते हो? सफाई कर्मचारी की उम्र करीब 60 की थी और वह उत्तर प्रदेश का था इसलिए मेरे “बिहारीपन” को अपनी नजर से “आंकने” में कभी कोई गलती नहीं की. अलबत्ता, हमेशा “पीठ थप-थपाता” रहा.

इसी भवन के नीचे हमारे आने से बहुत पहले से, या यूँ कहें, दशकों पूर्व से संजय की दुकान पर चाय का पानी खदकता रह रहा था. उस ज़माने में “गुटखा माफिया” का अभ्युदय भारत-भूमि पर नहीं हुआ था इसलिए “पनामा”, “विल्स”, “कैप्टन”,  “सीजर्स” जैसे सिगरेट को अपने दाहिने हाथ की अँगुलियों के बीच दबाकर, संजय और उसके पिताजी की हाथों से बनी चाय की चुस्की लेते और फिर भारत की राजनीति तथा देश की कानून-व्यवस्था पर चर्चा करते पत्रकारों का संजय की दुकान और मालिक दोनों चश्मदीद गवाह रहे है.

मोह्तरमायें भी “बेहिचक” और “बिना किसी भय के” उस “गुफ्तगू” में शरीक होती थीं. अंग्रेजी समाचार-पत्र, पत्रिकाओं के संवाददाताओं के लिए सड़क के किनारे चाय की चुस्की लेना एक “फैशन” में भी गिना जाता था. शेक्सपियर वाली अंग्रेजी से ऊपर-नीचे होते “होठों” को मैं महज “दर्शन” ही करता था क्योकि मुझे “फर्राटेदार” अंग्रेजी से “परहेज” तो नहीं था, लेकिन बोलने से “घबराता” था, कहीं “व्याकरण” गलत न हो जाये!

नब्बे के दशक के पूर्वार्ध से भारत के पत्रकारिता में “मानसिक जंग” लगना शुरू हो गया था (यह मेरा मानना है) क्योकि अब तक अंग्रेजी पत्रकार बंधू अपनी “अंग्रेजियत” का “व्यवसायीकरण” करने का मार्ग ढूंढ़ चुके थे और उसमे हिन्दी के कुछ पत्रकार बंधू भी अपना “हाथ सेंकने” के लिए किस्मत कन्नेक्शन जोड़ने पर आमादा थे. अब तक निजी पत्रकारों और पत्रकारिता की पढाई शुरू हो चुकी थी.

क्या पत्रकार होने के लिए “पत्रकारिता की पढाई करना आवश्यक है?” या भारत में उभरते (अब तो जम  गए हैं) पत्रकारों, संपादकों की नयी सोच समाज को, नयी पीढ़ी को मजबूर कर रहा है – जैसे समाचार पत्र और टीवी चैनलों को पढने/देखने के लिए मजबूर है) – इस क्षेत्र में प्रवेश के लिए इस ‘नहर’ को पर करना. इससे बच्चों को फायदा हो या नहीं, लेकिन संस्थान चलने वाले “लालाओं” को जबरदस्त आर्थिक लाभ होता है. और फिर यही “लाला लोग” टीवी चैनलों पर बैठ कर समाज की दिशा निर्धारित करने पर बहस करते हैं.

जी-टीवी प्रकरण तो महज एक कड़ी है जिसका कोई अस्तित्व नहीं है पत्रकारिता के बाज़ार में होने वाली निरंतर घटनाओं से. कहते हैं, जो पकड़ा गया वह “चोर है”, जो “कम्बल ओढ़ कर घी पि रहा है वह महादेव का भक्त!” भारत में पत्रकारिता तो अब एक “खुला बाज़ार” बाज़ार बन गया है जहाँ “शब्दों को वाक्यों में ढालने के प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अपने-अपने कन्नेक्शन से (शारीरिक भी सम्मिलित हो गया है) कौन कितना धन एकत्रित करने की क्षमता रखता है जो लालाओं को खुश रख सके? और जो “इस दौर में जो जीता वही सिकंदर” – बाकि सब बकवास.

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

बुन्देलखण्ड के प्रति सरकार-प्रशासन की बेरुखी

बुन्देलखण्ड क्षेत्र के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार की उदासीनता समय-समय पर परिलक्षित होती रहती है. यहाँ की समस्याओं को लेकर किसी भी सरकार के द्वारा कोई सकारात्मक कार्य नहीं किया गया. इस क्षेत्र की समस्याओं के निदान के नाम पर सिर्फ और सिर्फ खिलवाड़ ही किया गया. चुनावों […]
Facebook
%d bloggers like this: