कहानी मोमबत्ती की: कहीं दीप जले कहीं दिल…

admin

मोहतरम और मोह्तरमायें मोमबत्ती तो जलाते है इंडिया गेट और गेटवे ऑफ़ इंडिया पर, लेकिन समाज के शिक्षित लोग शहीद-स्थलों के दीवारों पर “पेशाब करने” में भी पीछे नहीं रहते

-शिवनाथ झा||

यह वही स्थान है जहाँ 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली सचिवालय में दो बम एक्सप्लोड करने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को जेल में कैद रखा गया था. दिल्ली के बहादुर शाह ज़फर मार्ग पर स्थित थी यह जेल, जो पिछले दोनों “खुनी दरवाजा” के रूप में कुख्यात हुयी. वैसे यह नाम पहले भी था लेकिन दिल्ली के लोगों के मानसिक पटल पर धीरे-धीरे धूमिल होता गया. इसी स्थान पर तत्कालीन मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फर के दो बेटों का सर-क़त्ल कर उन्हें अंग्रेजों ने एक थाल में प्रस्तुत किया था.

जब देश स्वतंत्र हुआ तब क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त आजीवन कारावास काट कर दिल्ली वापस आये और जेल की उस पुरानी जमीन को चूमने पहुंचे जहाँ कभी शहीद भगत सिंह के साथ दोनों क्रांतिकारियों के पैर पड़े थे. तब तक जेल ‘मृत-प्राय’ हो गया था और एक अस्पताल के भवन का शिलान्यास भी हो चूका था. दत्त वहां ‘निःशब्द’ खड़े थे. कुछ बच्चे आस-पास बैडमिन्टन खेल रहे थे. बच्चों ने दत्त से पूछा क्या वे भी ‘बैडमिन्टन के शौक़ीन’ हैं? दत्त ने कहा: “नहीं.” बच्चों ने फिर पूछा कि वे क्या देख रहे हैं? दत्त ने कहा: “मैं उस जगह को देख रहा हूँ जहाँ भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त जेल में बंद थे, एक साथ.”

बच्चों ने पूछा : “कौन भगत सिंह? कौन बटुकेश्वर दत्त?” अपनी आखों से लुढ़कती आंसुओं को अपने कंधे पर रखे गमछी से पोछते बटुकेश्वर दत्त वहां से चल पड़े, शायद यह सोचते हुए कि आने वाले दिनों में क्रांतिकारियों और शहीदों का क्या हश्र होने वाला है जिन्होंने मातृभूमि के लिए न केवल अपना जीवन न्योछावर किया बल्कि अपना परिवार सहित सर्वस्व समर्पित कर दिया.

जीवन और मौत से जूझते, आर्थिक तंगीपन को गले लगाते दत्त साहेब ने 20 जुलाई 1965 को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में अपनी अंतिम सांस ली और चल पड़े अपने क्रन्तिकारी मित्रों के पास. इनका अंतिम संस्कार पंजाब के फिरोजपुर के समीप हुस्सैनीवाला में संपन्न हुआ जहाँ भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को चिर-निद्रा में सुलाया गया था.

आज दिल्ली की उस पुरानी जेल के परिसर में दिल्ली कर एक अस्पताल है. इस परिसर में एक स्थान था जहाँ 11 क्रांतिकारियों को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी पर लटकाया था. कुछ दिन पूर्व तक यहाँ वे सभी “निशान” (मसलन, लोहे की रॉड जिसके सहारे क्रांतिकारियों को फांसी पर लटकाया जाता था, दस से अधिक फीट का गड्ढा, और बहुत सारी चीजें) मौजूद थी, लेकिन आज “नामो-निशान” तक मिट गया. शहीदी-स्थल का भी कारपोरेटीकरण हो गया. करोड़ों रूपये खर्च हुए. दीवारें बनी, पत्थर लगे, नाम गुदवाये गए, लोहे का विशाल गेट बना – लेकिन एक चीज नहीं हो पाया और वह यह कि बस यहाँ “इवेंट मनेजमेंट” वाले नहीं पहुँच पाए, और नहीं पहुँच पाई दिल्ली की इठलाती और बल खाती जनता जिनकी तस्वीरें दिल्ली के समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर आये दिन दिखती हैं, दिखायी जाते हैं. यहाँ तो इन दीवारों पर शहर के पढ़े-लिखे संभ्रांत लोग अपनी गाड़ियों से उतर कर, काले चश्मे को उतारकर ‘पेशाब’ करते हैं. ठीक ही सोचा था क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त साहेब ने आज से पचास साल पहले.

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के समाधी-स्थल (राजघाट, दिल्ली) को अगर छोड़ दिया जाये तो सम्पूर्ण भारत में 18 ऐसे समाधी-स्थल हैं जहाँ भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान देश के नौजवानों को, क्रांतिकारियों को मातृभूमि के लिए फांसी के फंदों पर लटकाया गया था और वे हँसते-हँसते अपने जीवन को मातृभूमि के लिए समर्पित कर दिया. दुर्भाग्य यह है की जिस शहीद-स्थलों की देख-रेख का जिम्मा भारतीय सेना को है या परा-मिलिट्री फ़ोर्स को, उनकी स्थिति तो स्वच्छ और पवित्र दोनों हैं, लेकिन जो “समाज को सुपुर्द है, वह सभी शहीदी स्थल खाके-सुपुर्द हो गए, या हो रहे हैं. धन्य हैं भारत के लोग.

आश्चर्य तो यह है की जितनी तत्परता से लोग मोमबत्ती जलाने (चाहे समाज के कोई भी लोग हों, किसी भी वर्ग के हों, समुदाय के हों) इंडिया गेट और गेट वे ऑफ़ इंडिया पर पहुँचते हैं, शहीदी स्थलों पर पहुँचने में उनकी तत्परता में “मानसिक बांझपन” क्यों दीखता है?

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, विशेषकर 90 के दशक के उत्तरार्ध, जबसे समाचार-पत्रों में पेज-थ्री ने अपना स्थान बनाया और टीवी चैनलों में ‘मनोरंजन’ की विशेष व्यवस्था की गयी, तब से भारत में, खासकर महा-नगरों में ‘अकाल-मृत्यु’ और उसके पश्चात श्रद्धांजलि अर्पित करने की एक ‘अलग परंपरा’ चली – मोमबत्ती जलाकर. यह मोमबत्ती इन महा-नगरों में उन्ही स्थानों पर जलायी जाती हैं जहाँ पत्रकारों और टीवी चैनलों के संवाददाताओं की पहुँच ‘आसानी’ से हो सके.

 

पिछले कुछ वर्षों में, जबसे निजी टीवी चैनलों पर कार्पोरेट जगत, फिल्म इंडस्ट्री या देश के धनाढ्यों और प्रवासी-भारतीयों का ‘वर्चस्व’ स्थापित होने लगा, तब से इस परंपरा का ‘व्यवसायीकरण’ भी हुआ – मसलन, इवेंट मैनेजमेंट वालों का प्रवेश. दिल्ली जैसे महा-नगर में पेज-थ्री के लिए कार्य करने वाली ‘मोहतरमाओं’ से बात करने पर कुछ ऐसी बातें भी पता चलीं जिनका अंदाजा लगाना भारत के गाँवों में रहने वाले लोगों की समझ से परे हो सकता है जो किसी की मृत्यु होने पर या उसके बरसी में शरीक होने पर ‘कलेजा फाड़ कर अपनी संवेदना व्यक्त करते हैं.”

दुर्भाग्य यह है कि भारत के गाँवों से विस्थापित या प्रवासित लोग जब शहरों और महा-नगरों में अपनी स्थिति मजबूत कर लेते हैं, तब वे अपने बच्चों से इस बात की अपेक्षा तो रखते हैं कि उनमे ‘भारतीय संस्कृति, पुरुखों का मानवीय-पन’ का भरमार हो, परन्तु वे स्वयं उन परम्पराओं से कोसों दूर होते हैं नहीं तो दिल्ली की “रूह-कांपती और ठिठुरती ठंड” में अपनी आँखों पर “काला-चश्मा”, सफ़ेद वस्त्र, चेहरों पर ब्रांडेड कोस्मेटिक कंपनियों की क्रीमों का लीपा-पोती’ कर 625 डाया मीटर क्षेत्र में फैले इंडिया गेट परिसर में भारत के किसी कोने में अकाल-मृत्यु का शिकार हुए लोगों के लिए मोमबत्ती नहीं जलाते, भले ही उन एकत्रित महानुभावों के बूढ़े माता-पिता अनाथालय में इश्वर की आराधना कर ‘मृत्यु की राह’ देख रहे हों.

 

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

असमंजस की स्थिति में उत्तर प्रदेश भाजपा..

-अनुराग मिश्र|| पिछले कुछ दिनों से देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा में लगातार आन्तरिक कलह देखने को मिल रही है. जिससे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पार्टी के अंदर कुछ गड़बड़ है जिसे पार्टी संभल नहीं पा रही है. पहले भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को लेकर उठा विवाद और […]
Facebook
escort eskişehir - lidyabet - macbook servis - kabak koyu
%d bloggers like this: