बुन्देलखण्ड के प्रति सरकार-प्रशासन की बेरुखी

बुन्देलखण्ड क्षेत्र के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार की उदासीनता समय-समय पर परिलक्षित होती रहती है. यहाँ की समस्याओं को लेकर किसी भी सरकार के द्वारा कोई सकारात्मक कार्य नहीं किया गया. इस क्षेत्र की समस्याओं के निदान के नाम पर सिर्फ और सिर्फ खिलवाड़ ही किया गया. चुनावों की आहट होते ही यहाँ राजनैतिक दल अपनी-अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने का प्रयास करने लगते हैं और उनमें से कई दल पृथक बुन्देलखण्ड  राज्य निर्माण की माँग का नाटक करने लगते हैं. इसी तरह के राजनैतिक नाटक का मंचन केंद्र सरकार द्वारा भी ‘बुन्देलखण्ड पैकेज’ के द्वारा किया गया. केंद्र सरकार के इस राजनैतिक नाटक में प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अमले ने भी उसका बखूबी साथ दिया. केंद्र सरकार का उद्देश्य बुन्देलखण्ड क्षेत्र की समस्याओं का निराकरण करना तो था नहीं, उसने पैकेज के नाम पर यहाँ के निवासियों को वोट-बैंक में बदलने की चाल चली. उसके इस पैकेज को लेकर बंदरबाँट करने के लिए प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अमला पहले से ही तैयारी किये बैठा था.
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बुन्देलखण्ड की समस्याओं के हल के लिए घोषित बुन्देलखण्ड पैकेज इस क्षेत्र के लिए एक तरह से मृग मरीचिका ही सिद्ध हुआ है, दिखावे के इस पैकेज से किसी तरह का कोई सकारात्मक काम होता हुआ नहीं दिखा है. यहाँ के निवासियों को ध्यान में रखकर बनाई गई योजनायें सिर्फ कागजों पर ही सुशोभित होती दिखीं. इस पैकेज के आधार पर न ही खेतों में और न ही यहाँ की पेयजल सम्बन्धी समस्या के निराकरण के लिए तालाबों, नहरों आदि पर ध्यान दिया गया. कई परियोजनायें अपनी अव्यवहारिकता के कारण रद्द तक करनी पड़ीं. विद्रूपता तो ये रही कि यहाँ की लघु सिंचाई की एक रीचार्ज योजना को दिखावटी काम की वजह से बीच में ही रोक देना पड़ा था.
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देखा जाये तो इस बुन्देलखण्ड पैकेज में सबसे ज्यादा बजट भूमि विकास एवं जल संसाधन विभाग के लिए दिया गया था लेकिन इसी पर सबसे कम खर्च किया गया है. जनपद जालौन के लिए 1 अरब 88 करोड़ रुपए से अधिक के निर्धारित  बजट में से विभाग को लगभग 74 करोड़ रुपए अवमुक्त किये जा  चुके हैं और इस अवमुक्त धनराशि में से लगभग 29 करोड़ रुपयों का खर्च भी दिखाया जा चुका है. इसके तहत वर्षा जल सिंचित करने के लिए संरचनाओं का निर्माण होना था लेकिन अभी तक ऐसे  कार्य कराये गये हैं जिनका पैकेज से कोई संबंध नहीं है. इसी तरह से जिला मुख्यालय उरई के नजदीक एक बड़ी मंडी और 26 लघु ग्रामीण मंडियों के लिए 1 अरब रुपए से अधिक का बजट है. लिफ्ट सिंचाई की पूर्व-संचालित 6 इकाइयों के पुनुरुधार के लिए भारी भरकम खर्च भी किया गया किन्तु एक भी इकाई से किसानों को सिंचाई की सुविधा नहीं मिल सकी है.
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इस स्थिति के कारण आसानी से समझ में आता है कि चाहे राज्य सरकार रही हो अथवा केंद्र सरकार, सभी ने बुन्देलखण्ड के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार अपना रखा है. इसके चलते यहाँ अव्यवस्था का आलम है. वर्तमान में जो थोड़ी बहुत हलचल इस क्षेत्र में देखने को मिल रही है उसके पीछे काम करने की मानसिकता कम और आगामी लोकसभा चुनावों की तैयारी ज्यादा है. इस मानसिकता में सकारात्मक कार्यों की उम्मीद करना बेमानी ही होगा. बुन्देलखण्ड पैकेज की आवंटित धनराशि को आपसी सहमति से कागजों पर खर्च कर दिया जायेगा और इस क्षेत्र का निवासी हमेशा की तरह अपने आपको ठगा सा महसूस करता खड़ा रहेगा. मंहगाई, गरीबी, पेयजल की समस्या, सूखे कुँए, तालाब, नहर आदि से लड़ते-लड़ते वह अंततः अपनी जान से हाथ धो बैठता है. यही कारण है कि छलावे का शिकार यहाँ का किसान, मजदूर, ग्रामीण हताशा-निराशा में आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा लेता है.
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सरकारों को इस ओर ध्यान देना होगा और समझना होगा कि सिर्फ पैकेज ही किसी भी क्षेत्र के विकास के लिए काफी नहीं. वहां के संसाधनों का वहां के नागरिकों के हित में सकारात्मक प्रयोग, नए-नए संसाधनों का निर्माण, रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाना आदि ऐसे कदम हो सकते हैं जो किसी भी पैकेज से ज्यादा प्रभावी होंगे. इन कदमों से न केवल क्षेत्र का विकास होगा बल्कि नागरिकों को भी जीवन-यापन का रास्ता मिलेगा और वे आत्महत्या जैसे कृत्य की ओर नहीं बढ़ेंगे.
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