कैग की दीवार में सियासत की सेंध..

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-प्रणय विक्रम सिंह||

सीएजी के पूर्व ऑडिटर के बयान ने कांग्रेस को एक अवसर मुहैया करा दिया है। संसद के शीतकालीन सत्र की अवधि अभी चल रही है यद्यपि सदन स्थगति ही रहता है किन्तु आशा है कि यदि सदन चला तो निश्चित रूप से सरकार विपक्ष को टू-जी घोटाले में दर्शायी जा रही राशि पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे अपने मंत्रियों के बयानों की याद अवश्य दिलायेगी। आरपी सिंह के बयान के बाद सियासत में गर्माहट आ गई है। सत्ता पक्ष व विपक्ष के मध्य जुबानी जंग चरम पर पहुंच गयी है। लेकिन सत्ता पक्ष व विपक्ष की नूरा कुश्ती के बीच घोटाले की गंभीरता का सवाल कही खोने लगा है। उसकी जगह घोटाले की राशि मुख्य मुद्दा बनती जा रही है।
दूसरी तरफ  टू-जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में मिली नाकामी को खुश सरकार अब पूर्व अधिकारी के बयान से जोड़ कर खुद को पाक साफ दिखने जुट गयी है। लोकतांत्रिक भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है कि केंद्रीय मंत्री अपने खराब प्रदर्शन पर खुशी से झूम उठे हों। उनकी मंशा है कि इस नीलामी में खराब प्रदर्शन का ठीकरा कैग के सिर फोड़ दिया जाए, जिसने संचार मंत्री के तौर पर ए.राजा के कार्यकाल में स्पेक्ट्रम की नीलामी में सरकार पर घपले का आरोप लगाया था। जैसे इतना ही काफी नहीं हो, कपिल सिब्बल ने यह कहकर अप्रत्यक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट पर भी उंगली उठाई कि संवैधानिक प्राधिकरणों को नीति निर्माण में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। फिर स्पेक्ट्रम की फीकी नीलामी के पीछे क्या राज है?
सच्चाई यह है कि पिछले तीन सालों में सरकार की ढुलमुल नीतियों और आर्थिक मोर्चे पर कमजोर प्रदर्शन के कारण 2012 में 2जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के प्रति टेलीकॉम उद्योग का रुख ठंडा रहा। घोटाले-दर-घोटाले की चोट से सरकार की छवि इतनी खराब हो गई कि इसमें लोगों का विश्वास खत्म हो गया है। इसी कारण टेलीकॉम उद्योग ने नीलामी में अधिक रुचि नहीं ली। लेकिन सरकार दिखा रही है कि टू-जी घोटला कैग और विपक्ष की कूट रचना का फलितार्थ है। उसमें दिखाई गयी राशि आधारहीन है। कपोल कल्पित हैं। जिसकी कोई वैधानिकता नहीं है। सरकार को कुछ कहने से पहले यह समझ लेना चाहिए कि कैग ने अपनी रिपोर्ट में 1.76 लाख करोड़ रुपए के नुकसान का महज अंदाजा लगाया है। यह राशि राजस्व हानि के अंतिम अनुमान तक के रूप में नहीं दी गई है। वहीं, असल नुकसान का तो पता ही नहीं चल पाएगा क्योंकि इसके लिए यह जानना जरूरी है कि 2008 में स्पेक्ट्रम के लिए बाजार क्या कीमत अदा करना चाहता था।
चूंकि नीलामी हुई नहीं तो यह पता नहीं लग सकता कि वास्तविक नुकसान कितने का हुआ। और कैग प्रमुख विनोद राय ने 2जी घोटाले के नुकसान का एक ही आंकड़ा नहीं दिया था। उन्होंने चार आंकड़े दिए थे 67,364 करोड़ रुपए, 69,626 करोड़ रुपए, 57,666 करोड़ रुपए और 1,76,645 करोड़ रुपए। इसमें पहला आंकड़ा (67,364 करोड़ रुपए) एस.टेल की पेशकश पर आधारित था। एस.टेल ने राष्ट्रीय स्तर पर स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए 6,000 करोड़ रुपए की पेशकश की थी। दूसरे आंकड़े (69,626 करोड़ रुपए) का आधार बना था यूनिटेक वायरलेस(यूनिनॉर) में हिस्सेदारी के लिए टेलीनॉर द्वारा चुकाया गया प्रीमियम।
तीसरा आंकड़ा(57,666 करोड़ रुपए) स्वात टेलीकॉम में हिस्सेदारी के लिए इतिस्लात द्वारा चुकाया गया प्रीमियम आधार बना था। स्वात टेलीकॉम का नाम बाद में बदलकर डीबी इत्तिस्लात हो गया था। अब यह कंपनी भारत से अपना कारोबार समेट चुकी है। नुकसान का चौथा और आखिरी आंकड़ा (1,76 लाख करोड़ रुपए) 2010 में हुई 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी पर आधारित था। 3जी स्पेक्ट्रम की इस नीलामी में रिकॉर्ड कीमत मिली थी। हालांकि इसे भी सरकार ने नुकसान के अंतिम आंकड़े के तौर पर नहीं माना। कैग का कहना है कि ये आंकड़े अनुमानित हैं और इस पर बहस हो सकती है। लिहाजा सरकार को मौके की गंभीरता और अपने बयानों की आधारहीनता में समीक्षा करनी चाहिए। खैर इतना तो तय है कि लेखा परीक्षक के एक अधिकारी की तरफ से आई रिपोर्ट विपक्ष के पूरी सरकार विरोधी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को नुकसान पहुंचाएगी। विपक्ष और भ्रष्टाचार के मामले पर सरकार के विरोध में खड़े हुए अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने सरकार को टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में खासतौर पर इसलिए घेरा था कि ये नुकसान भारत के इतिहास में बहुत बड़ा था। अदालत ने भी इस मामले पर सरकार के खिलाफ कार्रवाई की थी। अदालत के आदेश के बाद स्पेक्ट्रम के आवंटन भी रद्द हुए।
हालांकि हाल में हुई टू-जी स्पेक्ट्रम की नीलामी ने पहले ही इस पर कई तरह के सवाल खड़े कर दिए थे क्योंकि इसमें खजाने को महज नौ हजार करोड़ रूपए के आसपास ही हासिल हो पाए। पर इसका जबाव बनिस्पत कैग के सरकार को खुद अपनी व्यवस्था में खोजे तो ज्यादा बेहतर परिणाम मिलेंगे। बहरहाल, यह साफ   है कि आरपी सिंह भी मानते हैं कि सरकारी खजाने को नुकसान हुआ, अलबत्ता उनके मुताबिक इसका आंकड़ा बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया। यानी यह नहीं कहा जा सकता कि कोई घोटाला हुआ ही नहीं, जैसा कि कांग्रेस साबित करना चाहती है और जैसा कि एक समय कपिल सिब्बल ने दावा किया था। जहां तक नुकसान के आंकड़े का सवाल है, आरपी सिंह के बयान को लेकर कई सवाल उठते हैं। 2-जी से संबंधित रिपोर्ट खुद उन्होंने लोकलेखा समिति को सौंपी थी। वे संयुक्त संसदीय समिति के सामने भी पेश हुए। मगर दोनों अवसरों पर उन्होंने रिपोर्ट से कोई असहमति जाहिर नहीं की। रिपोर्ट को अंतिम रूप दिए जाने से पहले तथ्यों की जांच-परख उन्हीं के समकक्ष पांच अफसरों ने की थी और वे सब आकलन से सहमत थे। तब भी आरपी सिंह ने कोई विरोध नहीं जताया था। सीएजी की रिपोर्ट में दिए नुकसान के हिसाब को गलत ठहराते वक्त आरपी सिंह ट्राई की सिफारिशों का हवाला देते हैं, पर विचित्र है कि अपना आकलन निकालते समय वे इन्हीं सिफारिशों को नजरअंदाज कर देते हैं। कांग्रेस 2-जी आवंटन मामले में यह कह कर भी अपना बचाव करने की कोशिश करती आई है कि पहले आओ पहले पाओ की नीति राजग सरकार के समय से चली आ रही थी और उसने इसी का पालन किया था। मगर उच्चतम न्यायालय में भी सरकार की सफाई टिक नहीं पाई। आखिर न्यायालय ने एक सौ बाईस लाइसेंस रद्द कर दिए और स्पेक्ट्रम सहित प्राकृतिक संसाधनों के आबंटन की बाबत अधिक पारदर्शी नीति बनाने की हिदायत दी। कोयला घोटाले की बाबत भी पिछले दिनों वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि हो सकता है यह सिर्फ आंकड़ों का खेल साबित हो। अगर उनकी यही राय है तो फिर कोयला खदानों के आबंटन की समीक्षा के लिए अंतर-मंत्रालयी समिति गठित करने की भी क्या जरूरत थी?
देश के इतिहास में कैग पर इस तरह के आरोप कभी नहीं लगे। सवाल यह नहीं है कि कैग की स्पेक्ट्रम रिपोर्ट सही थी या गलत। सवाल इससे आगे का है कि जिस तरह से कैग को राजनीतिक विवाद में घसीटा जा रहा है, क्या उससे इस संस्था की विश्वसनीयता व गरिमा को गंभीर आघात नहीं पहुंच रहा है? कैग की प्रतिष्ठा व विश्वसनीयता को बनाए रखने की जिम्मेदारी समान रूप से सरकार व विपक्ष के कंधों पर है। देश के संविधान निर्माताओं ने कैग की संवैधानिक जिम्मेदारी तय करते हुए इस बात का ध्यान रखा था यही कारण है कि कैग रिपोर्ट की संसदीय जांच-पड़ताल लोकलेखा समिति द्वारा की जाती है, जिसका चेयरमैन प्रमुख विपक्षी दल का नेता होता है। दुखद तथ्य है कि अब संसदीय समितियों का इस्तेमाल भी राजनीतिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाने लगा है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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