सज गया अखाडा आज से शुरू होगा राजनैतिक दंगल…

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अनुराग मिश्र ||

आज से शुरू हो रहा संसद का शीतकालीन सत्र बड़ा ही रोचक रहेगा. रोचक इसलिए रहेगा क्योकि हर बार तरह इस बार भ्रष्टाचार का रामबाण विपक्ष के पास नहीं रहेगा क्योकि खुद इस बार विपक्ष भी खासकर प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा भी भ्रष्टाचार के विभिन्न आरोपों से घिरी हुई है. ऐसी स्थिति में जाहिर है कि विपक्ष के भ्रष्टाचार के मुद्दे की जगह पर उन मुद्दों को उठ्येगा जिन पर वो सरकार को घेर सकें. अपने इन्ही इरादों का संकेत देते हुए कल लोकसभा अध्यक्ष द्वारा बुलाई गयी सर्व्दालिये बैठक में भाजपा सहित सम्पूर्ण विपक्ष ने कहा कि सदन की कार्यवाही तभी सुचारू रूप से चलेगी जब सरकार ऍफ़डीआई के मसले पर वोटिंग कराये. जवाब में सरकार का संकेत था कि वो किसी भी स्थिति में ऍफ़डीआई पर वोटिंग नहीं कराएगी. यानि कही न कही दोनों ने ये संकेत दे दिया है की इस बार भी संसद के पूरे शीतकालीन सत्र के दौरान चूहे बिल्ली का खेल चलता रहेगा.
संसद का यह शीतकालीन सत्र 15वीं लोकसभा का 12वां सत्र और राज्यसभा का 227वां सत्र होगा. सत्र 29 दिन चलेगा और इस दौरान 20 बैठकें होंगी. आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, सत्र के दौरान जरूरी विधायी कार्य किए जाएंगे, जिनमें वित्तीय विधायी कार्य, पूरक मांगें और वर्ष 2012-13 के लिए आम बजट के अनुदान तथा कई विधेयकों को पारित कराना शामिल है. पर यहाँ अहम् सवाल ये उठता है की क्या ऐसा हो पायेगा ? क्या वास्तव में संसद का ये शीतकालीन सत्र अपने उद्देश्यों की पूर्ति कर पायेगा ? वैसे पिछले अनुभव के हिसाब से देखे तो ऐसा होता बहुत मुश्किल ही दिख रहा है जिसके बहुत से उद्धरण मौजूद है और सबसे ताजा उद्धरण तो संसद का पिछला मानसून सत्र ही है.
पिछले सत्र की स्थिति को देखे तो पाएंगे जो सत्र सुचारू रूप से चल सकता था उसे मात्र राजनैतिक स्वर्थो की पूर्ति के चलते इस देश की निम्न से निम्नतर होती जा रही राजनैतिक व्यवस्था की भेट चढ़ा दिया गया .कुछ यही स्थति इस बार के शीतकालीन सत्र में भी बनती दिख रही है. यहाँ यह बात धयान देने योग्य है कि संभवता संसद का ये शीतकालीन सत्र पंद्रहवी लोकसभा का अंतिम सत्र हो. हालांकि इस पर भी अभी असमंजस की ही स्थिति बनी हुई हैं. तृणमूल कांग्रेस जहाँ सरकार के खिलाफ अविश्वाश प्रस्ताव लाना चाहती है तो वही भाजपा अभी भी सरकार को समय देने के मुड़ में हैं. यानि इस सत्र को लेकर सबकी अपनी अपनी ढपली है. जिसके अनुरूप ही ये पूरा शीतकालीन सत्र चलेगा. इस लिहाज से ये कहा जा सकता कि इस बार भी सत्तापक्ष से लेकर विपक्ष तक जोर अजमाइश की बेहतरीन कुश्ती देश के राजनैतिक अखाड़े अर्थात हमारी संसद में देखने को मिलेगी. इस कुश्ती में कौन जीतेगा और कौन हारेगा ये तो समय के गर्भ में छुपा है. पर एक यक्ष प्रश्न जो बार- बार सामने आता है वो ये है कि इस कुश्ती में नुक्सान किसका होता है ? जाहिर है नुकसान तो देश की जनता का ही होगा.
इसको समझने के लिए हमें एक बार फिर संसद के पिछले सत्र यानि मानसून सत्र की तरफ जाना होगा. पिछले मानसून सत्र में कुल १९ बैठके हुई. प्रत्येक बैठक पर सरकार ने ९ करोड़ रूपये खर्च किये. अर्थात करीबन १७१ करोड़ पूरे सत्र को चालाने के लिए खर्च किया गया. पर परिणाम क्या निकला था ? पूरा सत्र कोयला आवंटन की भेट चढ़ गया था. मानसून सत्र के संदर्भ में स्वयं राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा था कि ये सत्र संसदिय इतिहास का सबसे बेकार सत्र रहा है. ऐसी स्थिति में यह सोचना आवश्यक हो गया है कि वर्तमान दौर संसद की भूमिका क्या है और क्या अब संसद के जो सत्र बुलाये जाते है वो मात्र संवैधानिक दायित्वों की पूर्ति के लिए होते ?
संसद का सत्र का बुलाना सरकार की संवैधानिक मज़बूरी है पर उसे सुचारू रूप से क्रियान्वित कराना सभी दलों की जिम्मेदारी है. यही पर हमारे राजनैतिक दल अपनी जिम्मेदारियों से मुह चुरा लेते है. उन्हें संसद की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलवाने से ज्यादा महत्वपूर्ण संसद के बहाने अपने वोट बैंक को मजबूत करना दिखता है. कोई भी दल चाहे वो सत्ता पक्ष हो या मुख्य विपक्षी पार्टियां इस बात पर विचार नहीं करना चाहता कि जनता की गाढ़ी कमाई का करोडो रुपया सत्र की बैठकों और सांसदों के वेतन व भत्तो पर खर्च होने के बाद आखिर ये संसद देश को क्या दे पा रही है. आखिर वो कौन से कारण जिनके चलते हर बार संसद की कई बैठके हंगामे की भेट चढ़ जाती है और सदन अपना काम सुचारू रूप से नहीं कर पता. वास्तव इसके लिए हमारी राजनैतिक संकीर्णता जिम्मेदार है. आज हमारे देश की राजनीति का स्तर राष्ट्रीय हितो की सोच के स्तर से गिरकर क्षेत्रीय, जातिगत, धार्मिक हो गया है. प्रत्येक राजनैतिक दल इन्ही तीनो में अपना वोट बैंक तलाशता है जिसके चलते राष्ट्रीय हितो के स्तर पर विचार करने की इनकी शक्ति क्षीण होती जा रही है और इनकी राजनैतिक सोच निम्न से निम्नतर स्तर की होती जा रही है. आज देश के सभी राजनैतिक दल चाहे वो राष्ट्रीय दल हो या क्षेत्रीय, इनके एजेंडे में राष्ट्रीय हित हासिये पर है और ऐन केन प्रकारेण सत्ता पर काबिज होना ही इनका मुख ध्येय, उद्देश्य व लक्ष्य होता जा रहा है और इसीलिए जरा से राजनैतिक नफा नुकसान के लिए ये कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हो जाते है अब वो चाहे सड़क जाम करना हो या संसद की कार्यवाही को बाधित करना हो.
खैर देखना ये है इस बार के शीतकालीन सत्र में हमारी संसद और इसमें बैठे लोग कितना अपनी साख को जनता के बीच बचाये रख जाते है. क्योकि इतना तो तय कि आज से शुरू हुए संसद के शीतकालीन सत्र में तमाम रंग देखने को मिलेंगे.

(अनुराग मिश्र  तहलका न्यूज, लखनऊ में बतौर उप – संपादक कार्यरत हैं)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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