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बेहोशी और मदहोशी, दोनों ही तोड़नी जरूरी हैं

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– डॉ. दीपक आचार्य||

लगातार बढ़ती जा रही जनसंख्या के साथ ही लोगों के फितुर और हरकतों में भी नवाचारों के साथ इजाफा होता जा रहा है. आदमी अपनी आदमीयत के तमाम प्रतिनिधि कारकों को एक-एक कर छोड़ता जा रहा है और उसके स्थान पर वह सब अंगीकार करता जा रहा है जो कभी पशु, कभी असुर और कभी पिशाचों के गुण रहे हैं. आदमी अपनी पूरी यात्रा में उन सारी अच्छाइयों और चिह्नों को छोड़ देता है जिनसे उसकी पहचान हुआ करती थी या है.

आजकल आदमी को पूर्ण आदमी तक नहीं कहा जा सकता. कोई दिन-रात सोने में तो कोई धमाल या षड़यंत्रों में मशगुल है, कोई उन सारे धंधों में लगा हुआ है जो रात के अंधेरों में होते रहे हैं.

कोई आदमी न होकर खुद दुकान हो गया है. आदमी के सर से लेकर पाँवों तक की जो स्थिति है उसने आदमी का पूरा व्यापारीकरण कर दिया है. इतना कि आदमी कोई जिस्म न होकर पूरी की पूरी मोबाइल दुकान हो. आदमी नफा-नुकसान को देखकर अपने दिमाग और दिल की खिड़कियों को खोलता और बंद करता है.

पहले लोग आदमी के ठिकानों पर आते थे. आज आदमी अपने स्वार्थों के फेर में जाने किन-किन ठिकानों की खाक छानने लगा है. उसके लिए न कोई धरम रहा है, न शरम. आदमी वह सब कुछ करने में भिड़ा हुआ है जो उसे अपने लिए या अपना लगता है. छोटी सी जेब, बैंक के लॉकर और चारदीवारियों से घिरे छोटे या बड़े मकान को ही अपना संसार समझने वाला आदमी त्रिशंकु की तरह अपना संसार बसाना चाहता है. उसे ईश्वर की बनायी दुनिया से कोई सरोकार नहीं है. उसे यह भी पता नहीं है कि उसका पड़ोसी या कुटुम्बी कौन है.

जो उसके साथ रुपया-पैसा, खाने-पीने का व्यवहार करता है, मुफत का माल उड़ाने और गलत-सलत धंधों या कि चाहे-अनचाहे अपराधों का मौका देता है या बिना कुछ मेहनत किए हराम की कमाई देने का बंदोबस्त करता है या उसमें मददगार बन जाता है, धौंस और दबावों के साथ लाल-पीले और काले कारनामों से लूट-खसोट के रास्ते बताता है और परायों का माल हड़पने या कि हजम करने के रास्तों और गलियों का पता बताता है, और ऐसे ही कामों में हिस्सा बँटाता रहता है, वही उसका है.

उसे संबंधों से कोई मतलब नहीं रहा है. उसे एक ही संबंध सूझता और दिखता है और वह है धन-दौलत व स्वार्थपूर्ति का. इसके साथ ही सदियों से प्यासे भूखों की एक और जमात है जो नाम की भूखी है और इस भूख को मिटाने के लिए वह कुछ भी कर सकती है, और करवा भी. छपास पिपासु और तस्वीर के भूखों की खूब संख्या आजकल मकर संक्रांति पर उड़ने वाले रंग-बिरंगे पतंगों की तरह आसमान पर छायी हुई नज़र आ रही है.

वह जमाना लद गया जब आदमी कड़ी मेहनत और पुरुषार्थ के साथ कमाता था और उन सभी लोगों से लेकर मवेशियों और परिवेश तक का ख्याल रखता था जो उसके आस-पास हुआ करते थे. उसमें इतनी संवेदनशीलता भी थी कि किसी को जरूरत पड़ने पर वह सहज ही हाजिर होकर उसके सुख-दुःख में हाथ बंटाता था और सामूहिक सोच के साथ सभी को आगे बढ़ाने के बाद अपने डग आगे बढ़ाता था. उसे अच्छी तरह भान था कि आदमी को आदमी होने का अहसास कराने और आदमी बनने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. यह पुरुषार्थ ही उसे जिन्दगी के अंतिम क्षण तक आदमी होने का शाश्वत बोध कराता रहता था.

आजकल पुरुषार्थ तो हवा हो गया और उसकी जगह ले ली है हरामखोरी ने. आदमी खुद कुछ करना नहीं चाहता. वह चाहता है कि चतुराई और धूर्त्तता की वो पराकाष्ठा प्राप्त कर ले जहां सामने वालों को हद दर्जे का उल्लू बनाकर किस तरह उसका माल या पैसा अपने कब्जे में कर लिया जाए. मेहनत दूसरे करें और माल वह उड़ाए.

आदमी की खाल में ऐसे बहुत सारे लोग हमारे आस-पास भी हैं, अपने क्षेत्र में भी हैं और पूरे हिन्दुस्तान में फैले हुए हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि आदमी के नाम पर ये वो कलंक हैं जिन्हें धरा पर भेजकर भगवान भी रोजाना कुलबुलाता और पश्चाताप करता होगा.

बिना कुछ किए धराए कभी चालाकियों से,  किन्हीं दबावों से तथा कभी प्रलोभन या पराये नरपिशाचों की ताकत का खौफ बताकर धन-दौलत, जमीन-जायदाद तथा पॉवर के स्वामी बन बैठे लोगों में दो तरह की ख़ासियतें हुआ करती हैं- बेहोशी और मदहोशी. आदमी में न कुछ का मद रहा है, न गंध. परायों पर पलने वाले आदमी के लिए उसकी इंसानियत भी परायी हो चली है.

पराये मद की गंध पाकर, परायों का परिक्रमा या स्पर्श सुख पाकर तथा पुरुषार्थहीन कचरे की गंध सूंघ-सूंघ कर फूले नहीं समा रहे इन लोगों का पूरा जीवन ही मदांध और मोहांध हो चला है. इस मद के मारे उन्हें और कुछ सूझता ही नहीं है  और लगता है कि जैसे पराये मद का मोद ही जीवन का अंतिम और सर्वाेपरि लक्ष्य है.

यह मद ही है जो उनके दिल और दिमाग पर प्याज की झिल्लियों की मानिंद जाने कितने कालिख भरे आवरण चढ़ा देता है कि इन्हें अपने दंभ के सिवा कहीं कुछ सूझता ही नहीं.

यह अहंकार ही इन लोगों को इतना अधिक खजूरिया व्यक्तित्व दे डालता है कि ये जमाने भर को अपने से नीचे और हीन मानने लगते हैं और वहीं से शुरू हो जाता है इनकी बेहोशी और मदहोशी का चरमोत्कर्ष.

जहां इनका मद बौना हो जाता है वहाँ बेहोशी ओढ़ लेते हैं और मासूमियत भरा ऐसा अभिनय कर डालते हैं जैसे दुनिया में इनके मुकाबले कोई और मासूम या भोला कोई हो ही नहीं. दूसरी ओर मदांध अवस्था में ऐसे मदहोश हो जाएंगे कि अपने आपको सिकंदर से कम नहीं समझते.

इन दोनों ही किस्मों के आदमियों की अपने यहाँ भी कोई कमी नहीं है. ऐसे लोगों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ती जा रही है कि कुछ कहा नहीं जा सकता. इन्हें देख कर आने वाले समय में इन हरामखोरों का कोई अलग धर्म या सम्प्रदाय स्थापित होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता, जहाँ तमाम नवाचारों के साथ उन सारे कर्मों, क्रियाकर्मों की खुली छूट होगी जो राक्षसों के जमाने में भी नहीं हुई होगी.

इन लोगों की बेहोशी और मदहोशी को तोड़ने के लिए हमें ही आगे आना पड़ेगा वरना कोई स्पीड ब्रेकर अभी नहीं लगा तो जमीर और जमीन विहीन ये लोग उन सभी को बेच देंगे जिन पर हमारा भारत महान टिका हुआ है. जहाँ मौका मिले, वहाँ निर्भयतापूर्वक आगे आएं और मुखर होकर इन डुप्लीकेट आदमियों को असली आदमी की सत्ता का भान कराएं, यही हमारा और आपका युगधर्म है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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