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पानी की इस बर्बादी को कौन रोकेगा…?

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-डॉ. आशीष वशिष्ठ||

तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा ये कोरी बयानबाजी या कल्पना नहीं है क्योंकि जिस तेजी से पीने के पानी के स्त्रोत सूख और घट रहे हैं उसके लक्षण दिखने भी लगे हैं. जल प्रदूषण, सूखते जल स्त्रोत, प्रदूषित होती नदियां और वर्षा जल का संचयन न हो पाने पर तो  खूब चर्चा और विचार-विमर्श होता है लेकिन सरेआम हमारे चारों ओर पीने के मीठे पानी की बर्बादी हो रही है जिस पर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो.

देश के हर छोटे बड़े कस्बे, शहर और महानगरों में बने दोपहिया और चार पहिया वाहनों के सर्विस सेन्टर और धुलाई सेंटरों में प्रतिदिन पीने योग्य पानी का जमकर दुरूपयोग और अपव्यय वाहन धुलने जैसे महत्वहीन कार्य में खर्च होता है लेकिन पीने के पानी की इस बड़ी बर्बादी की और चर्चा न के बराबर ही हुई है. पर्यावरण संरक्षण और जल की समस्या को लेकर संघर्ष और आंदोलनरत संगठनों ने अभी तक इस गंभीर मुद्दे को प्रभावशाली तरीके से उठाया ही नहीं है. परिणामस्वरूप देश में बिना किसी रोक-टोक के धड़ल्ले से सर्विस सेंटर व वाहन धुलाई सेंटर की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है जहां बीस से दो सौ रुपये के लिए गाड़ी धोने के नाम पर हजारों लीटर पानी व्यर्थ में बहा दिया जाता है. इस मसले पर स्थानीय प्रशासन से लेकर सामाजिक संगठन, पर्यावरणविद्वों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की चुप्पी हैरान करने वाली है.

 

एक अनुमान के अनुसार सर्विस सेण्टर में कार धुलाई में 300 से 500 लीटर और दोपहिया वाहन पर 100 से 150 लीटर तक साफ पानी बहाया जाता है. देश में जिस तेजी से दोपहिया और चार पहिया वाहनों में वृद्घि हो रही है उस अनुपात में प्रतिदिन लाखों लीटर पानी वाहनों की धुलाई में खर्च होता है. सर्विस सेण्टर के अलावा घरों में प्रतिदिन वाहन धोने वालों की बड़ी तादाद है जो गाड़ी चमकाने के नाम पर अमूल्य पानी व्यर्थ बहाते हैं. चार पहिया वाहनों में ट्रक, बस और अन्य दूसरे बड़े वाहनों की संख्या भी करोड़ों में है जिनमें कारों की तुलना में चार से छह गुना अधिक पानी खर्च होता है. बढ़ती आबादी के साथ दो और चार पहिया वाहनों की संख्या में बड़ी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. वाहनों की संख्या के अनुपात में जल की बर्बादी भी हो रही है.

विश्व बाजार में चीन के बाद आटो उद्योग देश का सबसे तेजी से बढ़ता उद्योग है. विश्वभर में बनने वाली प्रत्येक छठी कार भारत में बिकती है. एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में देश में 60-70 मिलियन वाहन है. आटोमोबाइल इंडस्ट्रीज की वार्षिक बढ़ोतरी 18-20 फीसदी है. जिस गति से देश में दोपहिया, चार पहिया और व्यावसायिक वाहनों की संख्या बढ़ रही है उस हिसाब से अगले 20 वर्षों में देश में वाहनों की संख्या 400-450 मिलियन पहुंचने के आसार है. तस्वीर का दूसरा रूख यह है कि देश में जल संपदा बड़ी तेजी से सूख व घट रही है. पिछले दो दशकों में पानी के बढ़ते व्यावसायिक, अंधाधुंध दोहन एवं प्रयोग से जलस्तर तेजी से गिर रहा है. जिसके चलते देशभर में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है.

 

धरती की सतह पर तकरीबन 326 मिलियन क्यूबिक मील की दूरी तक पानी फैला हुआ है. पृथ्वी पर मौजूद पानी का एक प्रतिशत से भी कम पीने योग्य है, बाकी समुद्र के खारे पानी और बर्फ के रूप में जमा हुआ है. धरती पर तीन बड़े महासागरों प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और हिंद महासागर में जल का अथाह भंडार है. महासागरों में पृथ्वी का 97 प्रतिशत पानी है. धरती में मौजूद पानी का केवल 3.5 प्रतिशत ही इस्तेमाल कर सकते हैं. यह 0. 6 प्रतिशत भू-जल नदियों, तालाबों और झीलों में पाया जाता है. हमारे लिए उपयोगी पानी का 70 प्रतिशत कृषि के लिए और 22 प्रतिशत उद्योगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. रोजाना सूरज की गर्मी से करीब एक खरब टन पानी वाष्प बनकर उड़ जाता है.

विश्व के कुल उपलब्ध जल में से मात्र 0.08 प्रतिशत ही पीने के लिए उपलब्ध है और इसका वितरण भी पूरे विश्व में एक समान नहीं है. इससे भी बड़ी समस्या यह है कि मानवीय गतिविधियां इस प्राकृतिक संसाधन को बर्बाद कर रही है. विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार एशिया और प्रशांत क्षेत्रों मेंं प्राकृतिक संसाधनों को सबसे अधिक दोहन किया गया है और इस शताब्दी में पूरे विश्व में पानी की कमी होगी. 2008 में यूनेस्को के महानिदेशक कोचचिरो मत्सूरा ने कहा था कि, जल की उपलब्धता कम हो रही है, जबकि मांग नाटकीय रुप से बढ़ रही है. अगले 20 वर्षों में संसार में प्रति व्यक्ति जल आपूर्ति एक तिहाई तक गिरने की संभावना है. देश के पूर्वोत्तर राज्यों में पेयजल की उपलब्धता गंभीर स्थिति में है. असम में शहरी आबादी की केवल 10 फीसदी जबकि तमिलनाडु की 50 फीसदी जनता को ही पेयजल उपलब्ध है. पेयजल की समस्या का सामना करने वाले कुछ अन्य राज्य केरल, आंध्र प्रदेश, बिहार, गोवा, बिहार, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, मेघालय,  मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा व सिक्किम शामिल है.

वाहन धुलाई में खर्च में व्यर्थ होने वाले साफ व मीठे जल की बर्बादी से पूरा विश्व चिंतित है. अमेरिका, आस्ट्रेलिया, स्पेन, फ्रांस, इण्डोनेशिया, जापान, मलेशिया, रोमानिया और यूएई आदि देशों ने कानून बनाकर वाहन धुलाई में होने वाली बर्बादी को रोका है. देश में केन्द्र शासित प्रदेश चण्डीगढ़ में स्थानीय प्रशासन ने वाहन और घर धुलाई और बागवानी पर खर्च होने वाले पानी की बर्बादी पर रोक लगाने के लिए सुबह के समय धुलाई के कार्यों पर रोक लगाने का प्रयोग किया था, जो काफी हद तक सफल रहा. वहीं दक्षिण भारत में कुछ समाजसेवी और सामाजिक संगठन वाहनों की धुलाई में खर्च होने वाले जल की हानि व उससे होने वाले जल प्रदूषण को रोकने की दिशा में कार्य कर रहे हैं. लेकिन देश में व्यापक तौर पर इस दिशा में कोई बड़ा प्रयास या अभियान नहीं चल रहा है. बड़े सर्विस सेंटरों पर वाहन धुलाई के समय पानी के साथ बहने वाले तेल, डीजल, ग्रीस से होने वाले जल व भू-प्रदूषण की रोकथाम के लिए बड़े व प्रतिष्ठिïत सर्विस सेण्टरों में गंदगी निवारण संयंत्र [ईटीपी] की व्यवस्था न के बराबर है. गली-मोहल्ले में खुले सर्विस व धुलाई सेण्टर जहां प्रतिदिन हजारों लीटर पानी बहाया जाता है वहां किसी कानून कायदे का पालन होगा ये सोचना भी बेमानी है.

पानी की बर्बादी का रोकने के लिए लाखों-करोड़ों के विज्ञापन जारी करने वाले सरकारी अमले का ध्यान जल की इस बड़ी बर्बादी की और अभी तक क्यों नहीं गया है यह बात समझ से परे है. हैरानी की बात यह है कि सर्विस सेण्टरों में जल की बर्बादी को रोकने के लिए कोई नियम या कानून देश में मौजूद नहीं है. सर्विस सेण्टरों में वाहन धुलाई से होने वाले जल प्रदूषण की रोकथाम के लिए भी कानून नहीं है. कानून और जानकारी के अभाव में प्रतिदिन देशभर में हजारा सर्विस व धुलाई सेण्टर व आमजन सरेआम बड़ी बेरहमी से साफ और मीठे पानी को बर्बाद कर रहे हैं. पानी की इस बर्बादी को रोकने के लिए सरकारी मशीनरी के साथ, नागरिकों व सामाजिक संगठनों को इस दिशा में अलख जगानी होगी और अगर हम आज सजग ना हुए तो अगली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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