मीडिया पर अंकुश, ऐसी पत्रकारिता मतलब रीढविहीन

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-जयश्री राठौड़||

राष्ट्रीय प्रेस दिवस के मौके पर शिमला में परिचर्चा हुई। इसमें लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की मौजूदा स्थिति और अन्य मुद्दों पर विचार किया गया। कार्यक्रम सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग की ओर से राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर मीडिया की स्वतंत्रता विषय पर आयोजित किया गया था। उन्होंने कहा कि मीडिया की स्वतंत्रता बनाई रखी जानी चाहिए और पत्रकारों को खबर भेजते समय जमीनी हकीकत के साथ समझौता कर बिना किसी दबाव के अपना कार्य करना चाहिए। अतिरिक्त मुख्य सचिव अजय मित्तल ने पेड न्यूज की प्रवृति पर चिंता जताई। कहा किसी भी संस्थान के लिये बाहरी नियत्रंण एंव नियमन उचित नहीं है तथा यह आत्म नियंत्रण के रूप में होना चाहिए। 
वरिष्ठ पत्रकार पी.सी. लोहुमी ने कहा कि मीडिया को बिना किसी दबाव के कार्य करना चाहिए और आत्मावलोकन समय की मांग है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाली समस्याओं और चुनौतियों का मुकाबला बहादुरी के साथ किया जाना चाहिए। समाज पत्रकारों का वास्तविक साथी है, इसलिए पत्रकार को समाज के साथ अपने रिश्ते श्रेष्ठतम रखने चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय प्रेस दिवस भारत में स्वतंत्र एवं उत्तरदायी प्रेस का प्रतीक है। पेड न्यूज, ठेके पर भर्ती और मीडिया पर समाचारपत्र के मालिकों का दबाव चिंता का विषय है और यदि उचित कदम न उठाए गए तो यह समाज के लिए घातक सिद्ध होगा। उन्होंने कहा कि समाज के प्रति पत्रकारों का दायित्व औरों से अधिक है तथा आत्मनियंत्रण एवं मूल्यों का पालन करते हुए पत्रकारों की आजादी कायम रखी जानी चाहिए।
हिमुडा के उपाध्यक्ष गणेश दत्त ने कहा कि प्रेस दिवस मीडिया कर्मियों का अपना दिवस है और आत्मावलोकन के लिए यह एक उचित मंच है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता एक पवित्र व्यवसाय है और पत्रकारों को ध्यानपूर्वक अपना कार्य करना चाहिए तथा जनता तक सत्य सूचना पहुंचानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जनहित के मामलों एवं समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर उठाना चाहिए और मीडिया को सरकार द्वारा किए जा रहे विकास को भी उचित स्थान देना चाहिए।
आकाशवाणी शिमला के केंद्र निदेशक सुनील भाटिया ने कहा कि पत्रकारों को बिना किसी भेदभाव के सकारात्मक एवं विकासात्मक पत्रकारिता पर बल देना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोग सकारात्मक एवं तथ्यों पर आधारित समाचारों को अधिमान देते हैं।
निदेशक सूचना एवं जन सम्पर्क बी.डी. शर्मा ने मुख्य अतिथि तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों का स्वागत किया और मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रकाश डाला।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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One thought on “मीडिया पर अंकुश, ऐसी पत्रकारिता मतलब रीढविहीन

  1. पत्रकारिता भी अब एक व्यापर बन गया है इसलिए कुछ हद तक मीडिया पर भी अंकुश लगाना जरूरी है लेकिन एक सीमा तक !इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया अपने कुछ लोभी और बिकाऊ पत्रकारों की वजह से बदनाम हुई है और इसी का परिणाम है की मीडिया पर अंकुश लगाने की बात होने लगी है !किसी एक का नाम तो नहीं लिया जा सकता ,पर इतना जरूर कहा जा सकता है की कुछ पत्रकार सत्ता पक्ष के हाथो ,कुछ व्यापारिओं के हाथो तो कुछ विपक्षी डालो के हाथो की कठपुतली बन चुके है जिनसे एक दुसरे के द्वारा अपना स्वार्थ पूरा करने में लगे हैं !उन्हें कोई फर्क नहीं परता की उनके द्वारा लिखी और कही गई बातो से समाज पर बुरा असर पर रहा है या अच्छा !उन्हें सिर्फ इतना पता होता है की वो अपनी पत्रकारिता से नाम और दम दोनों पा रहे हैं !

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