इरोम के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता समझ से परे है

सामाजिक स्थितियां किस तरह से असंतुलन की ओर लगातार बढ़ रही हैं, इस बात को जब तक समझा जाता है तब तक स्थिति और भयावहता की ओर चली जाती है। वर्तमान में देश में एक ओर मेधा पाटेकर, अन्ना हजारे, केजरीवाल जैसे लोग आन्दोलनों के द्वारा समाज को बदलने का सपना पाले हैं और लगातार जनमानस में अपनी पहचान बनाये हुए हैं। इनकी एक आवाज पर अधिसंख्यक जनमानस इनके साथ उठ खड़ा होता है तो कभी-कभी सरकार भी कतिपय डर के कारण इनकी बातों को सुनने का बहाना करने लगती है। इन आन्दोलनकारियों के एक-एक कदम को मीडिया भी जनमानस के सामने लाना अपना सर्वप्रथम कार्य समझती है। इसके उलट विगत 12 वर्षों से आन्दोलन कर रही, भूख हड़ताल पर बनी इरोम शर्मिला से बात करने के लिए न तो सरकार ने कोई बहाना खोजा और न ही आम जनमानस ने उसकी सुध ली। मीडिया के लिए भी इरोम का आन्दोलन कोई विशेष बात नहीं है, उसकी लड़ाई को, उसके संघर्ष को आम आदमी के सामने लाना मीडिया की प्राथमिकता भी नहीं। वह पिछले 12 वर्षों से अकेली, निपट अकेली लड़ती हुई अपने आपमें ही जिन्दा है।

 इन हालातों पर रोष नहीं आता है, क्षोभ नहीं होता है, गुस्सा नहीं आता है बस एकाधिक रूप से हताशा और निराशा का माहौल बनने लगता है। किसी समय में समाज के जिम्मेवार लोगों द्वारा कहा जाता था कि परिस्थितियां बदलती हैं बस बदलने वाला चाहिए होता है; समाज में कुछ गलत होता दिख रहा है तो चुप न रहो, विरोध करो, आपत्ति दर्ज करो सुनवाई होगी। यही लोग युवा पीढ़ी के द्वारा आक्रोश दिखाने पर कहते थे कि विरोध का तरीका संयमित होना चाहिए; न्याय पाने के लिए लम्बी यात्रा करनी पड़ सकती है पर न्याय मिलता है। गांधी जी के अहिंसा को, उनके शांतिपूर्ण आन्दोलनात्मक रवैये को लेकर उपदेशात्मक लहजा हुआ करता था और तो और मुन्नाभाई सरीखों ने दिखाया कि शाान्तिपूर्ण आन्दोलन का का आज भी महत्व है। इधर लग रहा है कि ये सब बातें बेमानी सी हो गई हैं, अब न तो अहिंसात्मक तरीके से कोई बात बनती दिख रही है और न ही सरकार किसी आन्दोलन के प्रति सकारात्मक रुख दिखा रही है। यदि ऐसा कुछ भी होता तो इरोम के संघर्ष की ओर सरकार ने ध्यान अवश्य ही दिया होता।

इरोम द्वारा सेना के अधिकार को लेकर किया जा रहा आन्दोलन, संघर्ष अपने आपमें कितना सही है और कितना गलत इसका आकलन सम्पूर्ण स्थितियों के अध्ययन के बाद करने का कार्य सरकार का, विभिन्न एजेंसियों का, प्रबुद्धजनों का हो सकता है किन्तु उसकी बात को, उसके संघर्ष को, उसकी मांग को किसी प्रकार की अहमियत न देना सरकार की निरंकुशता का परिचायक है। इरोम ने सैनिकों द्वारा जो होते देखा और उसे देखकर उसकी प्रतिक्रियास्वरूप उसने न तो हिंसात्मक तरीका अपनाया और न ही किसी तरह का उपद्रव फैलाने की कोशिश की, यहां तक कि उसके द्वारा भीड़ को भी अपनी ताकत नहीं बनाया गया। उसने निर्भीकता से, बिना किसी से डरे अपनी बात को सबके सामने रखा और अपने आन्दोलन को, अपनी भूख हड़ताल को प्रारम्भ कर दिया। यह अपने आपमें कितनी हताशा और निराशा की बात है कि एक आन्दोलनकारी को, अहिंसात्मक कदम उठाने वाले को बिना उसकी बात सुने लगातार जेल में डाले रखा गया। विद्रूपता तो इस बात की है कि सरकार ने बजाय उसके साथ वार्ता करने के, उसकी मांगों के सही-गलत का आकलन करने के उसकी भूख हड़ताल तुड़वाने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल किया।

अभी हाल का अन्ना आन्दोलन रहा हो अथवा तदोपरान्त केजरीवाल के तमाम सारे प्रयास, कहीं से भी नहीं लगा कि सरकार किसी भी रूप में अब विरोधात्मक स्वरों के सामने झुक रही है अथवा किन्हीं शर्तों पर ही वार्ता करने को तैयार होती दिख रही हो। यहां सरकारी पक्ष के लोगों द्वारा कुतर्क पेश किया जा सकता है कि अन्ना, केजरीवाल अथवा इरोम की मांगे अतिरंजना से भरी हुई हैं। हो सकता है ऐसा हो किन्तु बिना बातचीत के, बिना सही-गलत का आकलन करके एक अकेले व्यक्ति का विगत 12 वर्षों से जबरन, नली की मदद से तरल खाद्य पदार्थ के द्वारा उसके अनशन को गलत, आपराधिक करार देने का प्रयास किया जा रहा है। यह कदापि मानवीय, सामाजिक अथवा सकारात्मक कदम नहीं है। सरकारों द्वारा वर्तमान में जो कदम उठाये जा रहे हैं, बयानबाजी की जा रही है उनसे लगता है कि लोकतान्त्रिक सत्ता के मुखौटे में राजशाही कार्य कर रही है। देश में भारतीय नागरिकों द्वारा चुने प्रतिनिधियों के स्थान पर, भारतीय सरकार के स्थान पर कोई विदेशी प्रतिनिधि, विदेशी सरकार कार्यरत हैं। विद्रूपता, विडम्बना, हताशा, निराशा के इस माहौल से निकलने का कोई रास्ता अब किसी को भी सूझ नहीं रहा है।

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