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सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका खारिज

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चुनाव आयोग ने आज जनता पार्टी प्रमुख सुब्रमण्यम स्वामी की उस याचिका को आज खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने कांग्रेस पार्टी की मान्यता को इस आधार पर रद्द करने की मांग की थी कि उसने एक कंपनी को 90 करोड रुपये का ऋण देकर नियमों का उललंघन किया है.

मुख्य निर्वाचन आयुक्त वी एस संपथ की अध्यक्षता में आयोग ने स्वामी की अर्जी खारिज करते हुए कहा कि उनकी याचिका किसी राजनीतिक दल की मान्यता समाप्त करने के लिए निर्धारित किसी भी आधार के तहत नहीं आती है. चुनाव आयोग ने डा स्वामी को भेजे पत्र में कहा, ‘‘पार्टी की मान्यता रद्द करने के लिए आपने जो आधार बताया है वह राजनीतिक दल की मान्यता को समाप्त करने के लिए निर्धारित किसी भी आधार के तहत नहीं आता.

आयोग ने कहा कि स्वामी द्वारा चुनाव चिन्ह (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश 1968 के पैरा 16ए का हवाला देते हुए लिखे गये तीन और पांच नवम्बर के पत्र विचार योग्य नहीं हैं. इस प्रावधान के तहत यदि कोई दल चुनाव आचार संहिता या आयोग के किसी निर्देश का पालन करने में विफल रहता है तो आयोग को उसकी मान्यता निलंबित करने या उसे वापस लेने का अधिकार है.

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि जन प्रतिनिधितव कानून की धारा 29 बी और 29 सी में प्रावधान है कि धारा 29 ए के तहत पंजीकृत कोई राजनीतिक दल किस तरह से अपने लिये धन की व्यवस्था करेगा. लेकिन इस कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसमें यह कहा गया हो कि राजनीतिक दल किस तरह से इस धन का इस्तेमाल करेंगे. आयोग ने यह भी कहा कि स्वामी के आरोपों के अनुसार अगर पार्टी ने आयकर कानून 1961 के किसी प्रावधान का कथित रुप से पालन नहीं किया है तो यह मामला उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है. स्वामी ने चुनाव आयोग को तीन नवम्बर को लिखे पत्र में कहा था कि प्रथम दृष्टया कांग्रेस ने चुनाव कानून और आयकर कानून के तहत अपराध किया है और इस मामले में सुनवाई करना और पार्टी की मान्यता समाप्त करने पर निर्णय करना जरुरी है.

आयोग को लिखे पत्र में स्वामी ने आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी के नेतृतव वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने एसोसिएटेड जर्नल्स प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी को 90 करोड रुपये से ज्यादा का कर्ज देकर नियमों का उल्लंघन किया है इसलिए उसकी मान्यता खत्म की जाये. आयोग ने उसकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाने संबंधी स्वामी के आरोप को भी गंभीरता से लेते हुए इन्हें पूरी तरह निराधार करार दिया और ठुकरा दिया. आयोग ने कहा कि स्वामी ने जिस अखबार की खबर का हवाला दिया है उससे आयोग का कोई लेना देना नहीं है. आयोग ने यह भी कहा कि उसने तीन या चार नवम्बर को कोई निर्णय ही नहीं किया था. इसलिए फैसले को लीक करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है.

स्वामी ने अपने पत्र में कहा था कि एसोसिएटेड जर्नल को कांग्रेस पार्टी से 90 करोड रुपये का बिना जमानत का ऋण मिला जिसे उन्होंने आयकर कानून के तहत गैर कानूनी होने का दावा किया क्योंकि राजनीतिक दल वाणिज्यिक उद्देश्यों से ऋण नहीं प्रदान कर सकते हैं. उन्होंने अपने पत्र में लिखा, ‘‘ यह ऋण राजनीतिक दलों के पंजीकरण और मान्यता के नियमों और दिशानिर्देशों का उल्लंघन है. आयकर अधिनियम की धारा 13 ए और जन प्रतिनिधित्व कानून :आरपीए: की धारा 29ए में राजनीतिक दलों को किसी कंपनी को बिना ब्याज या ब्याज के साथ ऋण देने का कोई प्रावधान नहीं है.’’

कांग्रेस ने स्वामी के आरोपों को खारिज करते हुए उन पर तथ्यों को तोड मरोड कर पेश करने और झूठा दुष्प्रचार करने का आरोप लगाया था. पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा था कि इस संबंध में कोई वाणिज्यिक उद्देश्य कैसे हो सकता है जब ऋण पर कोई ब्याज नहीं लिया गया.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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