कांग्रेस की रामलीला…

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-आशीष वशिष्ठ||

आखिरकर अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव की कर्मस्थली रामलीला मैदान में कांग्रेस को उतरना ही पड़ा. पिछले दो वर्षों में ऐसे कई मौके आए जब अन्ना, केजरीवाल और रामदेव ने यूपीए सरकार को रामलीला मैदान से ललकारा लेकिन यूपीए के सबसे बड़े घटक कांग्रेस द्वारा संसद और मीडिया के समक्ष बयानबाजी से ही काम चलाया गया लेकिन पानी नाक से ऊपर पहुंचने लगा तो कांग्रेस को रामलीला मैदान की याद आई. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने रैली के माध्यम से खुद को सही साबित करने का हर संभव हथकंडा अपनाया. अक्सर मौन रहने वाले प्रधानमंत्री के मुखारविंद से बोल निकले और यूपी विधानसभा चुनावों में पार्टी की लुटिया डुबोने के बाद राहुल बाबा भी आक्रामक शैली में भाषण देते दिखे. एक बात तो है दो वर्षों के जन आंदोलनों और रैलियों ने हठधर्मिता और बेशर्मी ओढ़े और सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस नेतृत्व को रामलीला मैदान में रैली के लिए विवश तो कर ही दिया. लेकिन सवाल यह भी है कि पिछले दो वर्षों से किसी बड़े मंच से कांग्रेस ने जनआंदोलनों के विरोध में कोई बड़ी रैली या मंच का उपयोग नहीं किया था फिर एकाएक एफडीआई जैसे बासे मुद्दे की आड़ में रामलीला मैदान में कांग्रेसी रामलीला समझ से परे है.
यूपीए सरकार पर विपक्ष के साथ केजरीवाल, अन्ना और रामदेव लगातार हमले बोल रहे हैं उनके सीधे निशाने पर कांग्रेस नेतृत्व और नेता हैं बावजूद इसके कांग्रेस ने बेशर्मी और हठधर्मिता का परिचय देते हुए मनमानी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. दागी मंत्रियों को प्रोमोशन से लेकर एफडीआई को मंजूरी, पेट्रोल-डीजल व एलपीजी के दामों में वृद्घि तक कांग्रेस ने जो चाहा वो किया. भ्रष्टाचार, कांड, घोटालों का पर्दाफाश होने पर कांग्रेस आलाकमान की सेहत पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ा लेकिन जब आरोपों की आंच गांधी परिवार के दामाद राबर्ट वाड्रा और कांग्रेस युवराज राहुल गांधी पर पहुंची तो कांग्रेस आलाकमान चौकन्ना हो गया और गांधी परिवार पर कीचड़ उछलने के एक पखवाड़े के भीतर ही कांग्रेस आलाकमान प्रधानमंत्री के साथ रामलीला मैदान में आने को विवश हो गया. राहुल गाँधी जिस आक्रामक मुद्रा, आवेश और जोश में भाषणबाजी कर अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़े करते दिखे. वहीं राहुल ने देश की तमाम समस्याओं की जड़ राजनैतिक सिस्टम को बताया और यहाँ तक कहा कि आम और कमजोर आदमी के लिएयह सिस्टम बंद है. ऐसे में देश भी राहुल गांधी से चंद सवाल पूछना चाहता है कि राहुल की पार्टी पिछले आठ साल से सरकार में है तो सिस्टम बदलने के लिए क्या किया? कांग्रेस को बदलने से किसने रोका? कांग्रेस के दरवाजे आम आदमी के लिए क्यों बद हैं? कांग्रेस को बदलने के लिए राहुल गांधी को कितना वक्त चाहिए? आजादी के बाद देश में सबसे ज्यादा वक्त तक कांग्रेस का शासन रहा तो सिस्टम बदलने से किसने रोका? क्या कांग्रेस के अरविंद केजरीवाल बनना चाहते हैं राहुल गांधी? क्योंकि राहुल गांधी सिस्टम बदलने की जो बात कर रहे हैं वही बात पिछले दो सालों से टीम केजरीवाल भी कहती आ रही है.

भ्रष्टाचार के आरोपों का और केंद्र के यूपीए सरकार का जैसे चोली दामन का साथ है. कामनवेल्थ घोटाले से लेकर अभी तक समय समय पर किसी किसी घोटाले के सन्दर्भ में यूपीए सरकार का नाम आता रहा है. यूपीए सरकार का नाम इन आरोपों के कारण इतना धूमिल हो चुका है कि अब इस सरकार के द्वारा उठाया गया कोई भी कदम जनता को मुसीबत के काले बादल के रूप में ही नजर आतें हैं. यही कारण है कि अब विपक्ष के साथ साथ सहयोगी दल भी यूपीए सरकार पर हमले बोल रही है. इसीलिए यूपीए सरकार की अगुवाई कर रही कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली के रामलीला मैदान पर महारैली का आयोजन किया है. इस रैली में कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने रैली में उपस्थित जनता को संबोधित कर खुद अपनी पीठ थपथपाई.
जहां एक तरफ कांग्रेस चारो तरफ से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई है. आये दिन कोई न कोई नया भ्रष्टाचार का मुद्दा कांग्रेस के सिर पर फोड़ा जा रहा है. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी अपनी पार्टी की तारीफ करते नहीं थक रही है. सोनिया गांधी ने अपनी पार्टी को बाकी सभी पार्टियों के अलग बताया. अब कांग्रेस के कार्यकाल में जितने कांड और घोटाले सामने आए हैं उन्हें देखकर यह बात सिद्घ होती है कि कांग्रेस सभी पार्टियों से अलग ही है. भ्रष्टाचार के आरोपों को अनदेखा करते हुए सोनिया ने यह  तक कहने में गुरेज नहीं बरता कि कांग्रेस की नीयत और दामन पूरी तरह से साफ़ है. हम पूरी ईमानदारी से देश के विकास और लोगों के हित के लिए काम कर रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह भी मौन तोड़ते हुए बड़ी बेशर्मी से यूपीए सरकार की उपलब्धियां गिनाने में जुटे रहे और मंहगाई व जनविरोधी निर्णयों को देश के भविष्य की खातिर मजबूरी बताया. राहुल गांधी ने अपने भाषण का मुख्य निशाना विपक्ष को बनाया. लब्बोलुबाब यह है कि सोनिया, प्रधानमंत्री और राहुल स्वयं अपनी सरकार की पीठ थपथपाते नजर आए. लेकिन भ्रष्टाचार पर रोक कैसे लगेगी और आम आदमी के दु:ख-दर्दे कैसे कम होंगे इस पर तीनों महानुभावों ने एक भी शब्द नहीं बोला.
असल समस्या यह है कि कांग्रेस समस्या की जड़ पर वार करने की बजाय पत्तों की साफ-सफाई और बयानबाजी से देश की समस्या का ध्यान बंटाने का कुचक्र रच रही है. कांग्रेस आलाकमान पर आरोपों की बारिश होते ही यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्र्टी बचाव की मुद्रा में मैदान में उतर आई है. कांग्रेस को इस वर्ष गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनाव के साथ अगले वर्ष दिल्ली सहित कई दूसरे प्रदेशों में होने वाले विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की चिंता और हार का डरा सता रहा है. और अब तो आरोपों की सीधी बौछार गांधी परिवार पर होने लगी है तो बचाव के लिए मैदान में उतरना कांग्रेस की मजबूरी बन चुका है. पिछले आठ वर्षों में यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी की हठधर्मिता, बेशर्मी और कारगुजारियों और रामलीला को देश की जनता ध्यानपूर्वक देख-सुन रही है. जन लोकपाल, भ्रष्टाचार, कांड, घोटाले, कांग्रेस नेताओं और मंत्रियों की कारगुजारियां और बयानबाजी आने वाले समय में कांग्रेस पर भारी पड़ेगी इसी डर ने कांग्रेस आलाकमान को अंदर ही अंदर डरा दिया है अभी आने वाला समय ही बताएगा कि जनता कांग्रेस के साथ कैसा व्यवहार करेगी.

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