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इतिहास भूलने वालों को वर्तमान भूला देता है, शिन्देजी!!

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-प्रवीण गुगनानी||

केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील शिंदे ने भारत पाकिस्तान के बीच होने वाली क्रिकेट श्रंखला को लेकर बड़ा  आश्चर्यजनक किन्तु दुखद व्यक्तव्य दिया है कि हमें अतीत को भूल जाना चाहिए और पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना चाहिए. क्रिकेट का खेल अपने स्थान पर है, खेल भावना भी अपने स्थान पर रहे यह उचित हो सकता है, किन्तु इस खेल खेल में हम राष्ट्र को  भूल जाएँ!! ये कैसे हो सकता है? यह परामर्श तो हमें उस कातिल अदा का स्मरण कराता है कि यदि पड़ोसी से दुश्मनी का निर्वाह करना हो तो  उसके बच्चों को नशा करना सिखा दो. जी यद्दपि  शिंदे जी पड़ोसी नहीं घरेलु हैं तथापि प्रकारांतर से  वे हमसे इस  कातिल अदा वाला ही व्यवहार कर रहें हैं और कह रहें हैं कि “क्रिकेट खेलो खूब खेलो और अतीत को भूल जाओ, इतिहास को विस्मृत कर दो, घावों की और देखना बंद कर दो”. देश के लोगों को इतिहास भुलनें की सलाह देना संभवतः गृह मंत्रालय की नई  जवाबदारियों में शुमार किया गया है. हमारे पुरखे, सामाजिक व्यवहार, ग्रन्थ, और पंचतंत्र से लेकर कभी विद्यालय गई न गई नानी दादी की कहानियाँ भी हमें यह शिक्षा देते नहीं थकती कि हमें अपना इतिहास और अतीत सदैव याद रखना चाहिए. प्रसिद्द और महान भारतीय चिन्तक और कुटनीतिज्ञ चाणक्य ने कहा है कि “जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र अपने अतीत और इतिहास को याद नहीं रख पाता है भविष्य उसे भूल जाता है.”

यद्यपि हम शिंदे जी के परामर्शानुसार क्रिकेट के सतही आनंद के लिए हमारें अंतर्मन में गहरे पैठी पाकिस्तान से मिली पीड़ाओं को विस्मृत नहीं करनें वालें हैं तथापि पल भर को यदि हम उनके इस स्वाभिमान विरोधी बयान को मान ले तो भी केवल अतीत को भुलनें से हमें पाकिस्तान के साथ क्रिकेट का आनंद नहीं आयेगा इसके लिए हमें हमारी सीमाओं, सैनिकों, कश्मीर के मूल निवासियों की पीड़ा आदि न जाने कितनी कितनी सच्चाइयों से भरे लदे वर्तमान से भी विमुख होना होगा. पाकिस्तान से क्रिकेट खेलनें के लिए भारत की जनता को सार्वजनिक रूप से यह बयान देते समय शिंदे जी लगता है सचमुच भारत के प्रति पाकिस्तान की कड़वाहट, अपमान और छदम कारस्तानियों को भूल गएँ हैं. भारतीय गणराज्य के केन्द्रीय गृह मंत्री होने के नाते यह निकृष्ट सलाह देते समय शिंदे जी को आम एक भारतीय के इस प्रश्न का जवाब देते न बनेगा कि “भारत पाकिस्तान सम्बन्धों के सबसे ताजा कुछ महीनों पहले के उस प्रसंग को हम कैसे भूल जाएँ जिसमें पाकिस्तान की खूबसूरत विदेश मंत्रीं हिना की जुबान पर यह धोखे से सच आ  गया था कि “आतंकवाद पाकिस्तान का अतीत का मंत्र था, आतंकवाद भविष्य का मंत्र नहीं है”.  अनजाने ही सही पर यह कड़वा और बदसूरत सच हिना रब्बानी की हसीं जुबाँ पर आ ही गया था और पाकिस्तानी कूटनीतिज्ञों ने भी इस धोखे से निकल पड़े इस बयान को लेकर अन्दरखानें हिना की लानत मलामत भी की थी. पिछले वर्ष ही पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई एस आई के प्रमुख शुजा ने सार्वजनिक तौर पर  चुनौतिपुर्वक रहस्योद्घाटन था कि अप्रेल ११ में पाकिस्तान ने भारत पर हमले की पूर्ण तैयारी कर ली थी. इस बात को देशवासी तो अवश्य याद रखेंगे गृह मंत्री जी और आपसे आग्रह भी करेंगे कि भले ही ये सभी कुछ आप भूल जाएँ और खूब मन ध्यान से क्रिकेट खेलें और खिलाएं किन्तु ऐसा परामर्श कहीं भूल से भी देश के रक्षा मंत्री को न दे बैठें  नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा!!

हमें अतीत को विस्मृत करनें का परामर्श देनें वाले शिंदे जी,कृपया बताएं कि मुंबई बम विस्फोट के हमलावरों पर पाकिस्तानी अदालत में चल रहे मुक़दमे में देरी और साशय लापरवाही को कैसे भूल जाएँ?  हम हमारे सरबजीत और वहाँ की जेलों में कष्ट भोग रहे निर्दोष भारतीय नाविकों, सैनिकों और नागरिकों को कैसे भूल जाएँ?? कसाब और अफजल के पाकिस्तान में हुए प्रशिक्षण को कैसे भूल जाएँ???हम यह कैसे भूल जाएँ कि अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं के अनुमान के अनुसार पाकिस्तान में प्रति माह 20 से 25 हिंदु कन्याओं को जबरन चाक़ू की नोक पर मुसलमान बना दिया जाता है???? हम यह कैसे भूल जाएँ कि 1951 में 22% हिंदुओं वाला इस राष्ट्र में अब मात्र 1.7% हिंदु ही बच गए है और हम यह भी नहीं भूल सकते कि पाकिस्तान में बचे हिदुओं को जीना तो छोड़ो मरने के बाद दाह संस्कार में भी अडंगे लगाए जाते है!! हम ये कैसे भूल जाएँ कि पाकिस्तानी मदरसों में हिन्दुओं के बच्चों को अलग थलग रखा जाता है और बैठनें को अलग थलग स्थान दिया जाता है!!! हम यह भी नहीं भूल सकते है कि हमारे देश में सीरियल ब्लास्टों को करने वालों का प्रशिक्षण पाकिस्तान में ही होता है! हम, भारतीय यह भी नहीं भूल सकते हैं कि हमारे अपराधी न.1 दाऊद इब्राहिम को आज भी पाकिस्तान ने अपने काले बुर्के में छिपा रखा है!!

पाकिस्तानी धन बल और मदद से कश्मिर में विध्वंस कर रहे अलगाव वादी संगठन अहले हदीस के हुर्रियत और आई. एस. आई. से सम्बन्ध और इसकी ६०० मस्जिदों और १२० मदरसो से पूरी घाटी में अलगाव फैलाने की बात तो हमारा अतीत नहीं वर्तमान है तो अब क्या हमें क्रिकेट खेलनें के लिए वर्तमान से भी आँखें चुराना होगी? क्रिकेट की थोथी खुमारी के लिए क्या हम वास्तविकताओं से मुंह मोड़ कर शुतुरमुर्ग की भाँती रेत में सर छुपा लें?? कश्मीर  की शांत और सुरम्य घाटी में युवको की मानसिकता को जहरीला किसना बनाया?  किसने इनके हाथों में पुस्तकों की जगह अत्याधुनिक हथियार दिए है??  किसने इस घाटी को अशांति और संघर्ष के अनहद तूफ़ान में ठेल दिया है ??? इस चुनौतीपूर्ण वर्तमान को हम भूल जाएँ तो कैसे और उस षड्यंत्रों से भरे अतीत को छोड़ें तो कैसे शिंदे जी जिसमें अन्तराष्ट्रीय मंचों से लेकर भारत के कण कण पर कश्मीर के विभाजन, कब्जे और आक्रमण की इबारत पाकिस्तान ने  लिख रखी है ?!!! दिल्ली, मेरठ और लखनऊ की गलियों में ठेला चलाते और निर्धनता पूर्ण जीवन जीते उन निर्वासित कश्मीरी पंडितों की पीड़ा को हम कैसे भूलें जो करोड़ो अरबों रूपये वार्षिक की उपज उपजाने वालें केसर  खेतों के मालिक थे??? शिंदे जी हम अतीत और वर्तमान की हमारी छलनी ,रक्त रिसती और वेदना भरी राष्ट्रीय पदेलियों के घावों को भूलना नहीं बल्कि उन्हें देखते रहना और ठीक करना चाहते हैं और आपको भी इस राष्ट्र की इस आम राय से हम राय हो जाना चाहिए! कृपया इतिहास को न केवल स्मृतियों में ताजा रखें बल्कि उसे और अच्छे और प्रामाणिक ढंग से लिपिबद्ध करें! शिवाजी से लेकर महाराणा प्रताप और लक्ष्मी बाई के गौरवपूर्ण इतिहास से लेकर बाबरों, मुगलों, गजनवियों, अफजलों और कसाबों के षड्यंत्रों को हमें याद रखना भी रखना होगा और आने वाली पीढ़ी को व्यवस्थित लिपिबद्ध करके भी देना होगा क्योंकि क्रिकेट हमारी प्राथमिकता हो न हो किन्तु राष्ट्रवाद का आग्रह और राष्ट्र के दुश्मनों की पहचान और उनसें उस अनुरूप व्यवहार हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकता है और रहेगी.

पिछले वर्ष ही पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई एस आई के प्रमुख शुजा ने सार्वजनिक तौर पर  चुनौतिपुर्वक रहस्योद्घाटन था कि अप्रेल ११ में पाकिस्तान ने भारत पर हमले की पूर्ण तैयारी कर ली थी. इस बात को देशवासी तो अवश्य याद रखेंगे गृह मंत्री जी और आपसे आग्रह भी करेंगे कि भले ही ये सभी कुछ आप भूल जातें और खूब मन ध्यान से क्रिकेट खेलें और खिलाएं किन्तु ऐसा परामर्श कहीं भूल से भी देश के रक्षा मंत्री को न दे बैठें , नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा!

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praveen gugnani

म.प्र. के आदिवासी बहुल जिले बैतुल में निवास. "दैनिक मत" समाचार पत्र के प्रधान संपादक. समसामयिक विषयों पर निरंतर लेखन. प्रयोगधर्मी कविता लेखन में सक्रिय .
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