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सैंडी ने बताया कि सरकार को लोककल्याणकारी क्यों होना चाहिए!!

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-पलाश विश्वास||

अमेरिका में आये भयानक तूफान से अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के समीकरण बदलते हुए नजर आ रहे हैं।अमेरिका में वैसे भी अर्ली वोटिंग के तहत मतदान शुरू हो चुका है! लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा प्राकृतिक आपदा से निपटने में कितनी कारगर होती है, राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसे साबित करने का भरसक प्रयत्न करते हुए यहूदी, हिंदू लाबी और आक्रामक अमेरिकी राष्ट्रवाद के रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी ही नहीं, खुले बाजार के वर्चस्व और सरकार व राष्ट्र  भूमिका खत्म करने वाले साम्यवादविरोधी उत्तरआधुनिकतावाद को करारा जवाब दिया है। साम्यवाद भी राष्ट्रहीन व्यवस्था को क्रांति का अंतिम लक्ष्य मानता है क्योंकि उसके मुताबिक राष्ट्र सत्ता वर्ग के हितों का प्रतिनिधित्व करता है और उसमें सर्वहारा का प्रतिनिधित्व असंभव है। दूसरी ओर, उत्तरआधुनिकतावाद साम्यवाद के अंत की घोषणा कर चुका है। बाजार के वर्चस्व के लिए राष्ट्र की भूमिका सीमाबद्ध करना वैश्विक अर्थव्यवस्था की सर्वोच्च प्राथमिकता है। अमेरिका दुनियाभर में साम्यवाद के अवसान के बाद समूचे युरोप में अपनी तरह के लोकतंत्र की स्थापना में कामयाबी पाने के बाद अफ्रीका, लातिन अमेरिका, एशिया और अरब में लोकतंत्र का निर्यात करने लगा है। अमेरिकी वर्चस्व वाले वैश्विक आर्थिक संस्थानों विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन. यूनेस्को, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ के कारिंदे कारपोरेट मदद से दुनियाभर की सरकारें चला रहे हैं। दुनियाभर में वित्तीय और नागरिकता कानून अमेरिकी हितों के मद्देनजर बाजार और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा अभियान के तहत मूलनिवासी बहुसंख्य जनता की जल, जंगल, जमीन, आजीविका और नागरिकता से बेदखली के अश्वमेध कर्मकांड बतौर, जनसंहार की नीतियों को आर्तिक सुधार बताकर संसद और संविधान की हत्या करके बदला जा रहा है। नीति निर्धारण में जनता का प्रतिनिधित्व खत्म है तो कारपोरेट प्रायोजित सिविल सोसाइटी परिवर्तन के झंडेवरदार बतौर उभर रहे हैं।तूफान सैंडी ने इस खुले बाजार के वर्चस्व और निजीकरण  के धमाके के मुकाबले चुनी हुई सरकार की भूमिका को नये सिरे से स्थापित किया है, जिससे कारपोरेट खेल के उलट ओबामा की स्थिति मजबूत हुई है।अमेरिका में एक ओर राष्ट्रपति चुनाव को लेकर महज कुछ ही घंटे बचे हैं वहीं बराक ओबामा और उनके प्रतिद्वंद्वी रोमनी महत्वपूर्ण राज्यों में मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अंतिम कोशिश में जुटे हैं। व्हाइट हाउस को लेकर जंग में मंगलवार को चुनाव से पहले अंतिम सप्ताहांत में अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी के बीच कांटे की टक्कर चल रही है, लेकिन अभी भी कुछ स्पष्ट उभरकर सामने नहीं आया है। वाशिंगटन पोस्ट-एबीसी न्यूज की ताजा राष्ट्रीय रायशुमारी में काफी निकट का मुकाबला रहने की उम्मीद है।

वाशिंगटन पोस्ट-एबीसी न्यूज की ताजा राष्ट्रीय रायशुमारी में काफी निकट का मुकाबला रहने की उम्मीद है। ओबामा और रोमनी दोनों को 48-48 फीसदी वोट हासिल हो सकता है। हालांकि,चुनाव पंडितों ने अहम मुकाबले में मौजूदा राष्ट्रपति को हल्की बढ़त दी है। चुनाव में काफी नजदीकी मुकाबला देखने को मिलेगा।सुस्त अर्थव्यवस्था और विपक्ष की ओर से तमाम तरह के हमलों का सामना कर रहे 51 वर्षीय ओबामा अपने अधूरे काम को पूरा करने के लिए एक और कार्यकाल चाहते हैं। ओबामा पूर्व रिपब्लिकन प्रशासन की गलत नीतियों की शिकार अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कुछ और समय की मांग कर रहे हैं वहीं रोमनी मतदाताओं को यह समझाने में जुटे रहे कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था गलत पटरी पर है और इसमें पूरी तरह से बदलाव की जरूरत है। सबसे नवीनतम सीएनएन सर्वेक्षण में ओबामा केवल एक अंक से रोमनी पर भारी पड़े। ओबामा को 48 और रोमनी को 47 प्रतिशत वोट के साथ मुकाबला काफी नजदीकी रहने की उम्मीद जताई गई।

बीबीसी संवाददाता पॉल एडम्स का कहना है, “दस दिन पहले, पहली बहस के समय तक, तक लग रहा था कि मिट रोमनी का प्रचार तेज हो रहा है. लेकिन अब मतदान से कुछ ही दिन पहले लगता है कि स्थिति कुछ बदल रही है.” उनका ये भी कहना है कि रोमनी के पक्ष में पर्याप्त संख्या में स्विंग स्टेट्स नहीं जा रहा है जिनके आधार पर हार-जीत का फैसा होना है. बराक ओबामा ने पिछले हफ्ते में खासा अच्छा प्रदर्शन किया है.” पॉल एडम्स का कहना है कि तूफान सैंडी की तबाही के बाद राहत कार्यों और कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति ओबामा की सराहना हुई है हालाँकि अब भी लाखों लोग सैंडी से हुई तबाही के परिणामों से जूझ रहे हैं.

व्हाइट हाउस ने कहा है कि ओबामा ने शनिवार को एक आपदा घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर भी किये।राष्ट्रपति चुनाव के चुनाव प्रचार के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तूफान सैंडी से प्रभावित हुये इलाकों में राहत कार्रवाई पर नजर रखे हुये हैं।इस तरह का तूफान कहीं और हुआ होता तो तबाही इससे कई गुना ज्यादा होती। प्रलयकारी सैंडी आने वाला है और इससे भारी तबाही होगी, इसकी सूचना अमेरिका के लोगों को पहले से थी। प्रभावित इलाकों में सभी तैयार थे। चूंकि सैंडी की सूचना पहले से थी, इसीलिए वहां तैयारी पहले हो चुकी थी। तैयारी जिस अवधारणा से हो रही थी उसका नाम था ‘फेलिंग सेफली’ यानी सावधानी से फेल होना। सब-वे सिस्टम बंद कर दिए गए। तूफान के बाद आने वाली बाढ़ में लोगों को बिजली का करेंट न लगे,इसीलिए बिजली के ग्रिड बंद कर दिए गए। राहत कैंप तैयार हो गए। ओबामा ने ओहायो जाने से पहले फेडरल इमरजेंसी मैनेजमेंट एजेंसी के मुख्यालय का दौरा किया। प्रवक्ता जोशुआ अर्नेस्ट ने बताया कि राष्ट्रपति ने फोन पर न्यूयार्क, न्यूजर्सी और कनेक्टीक्ट के गवर्नर और मेयर से वार्ता की। यह आपदा घोषणा पत्र तूफान सैंडी के कारण इस सप्ताह तेज हवाओं व बाढ़ से प्रभावित रोड द्वीप के इलाकों के लिए है।

तूफान सैंडी की वजह से अमेरिका में जलवायु, पर्यावरण, पारिस्थितिकी और ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे गर्मा गये हैं। यहां तक कि इसके असर में रिपब्लिकन मेयर और गवर्नर तक को ओबामा की तारीफ करनी पड़ रही है।एक अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाक्रम में न्यूयार्क के मेयर माइकल ब्लूमबर्ग ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में बराक ओबामा का समर्थन करने का ऐलान किया है।कभी ओबामा के कट्टर आलोचक रहे ब्लूमबर्ग ने अपने इस फैसले का कारण यह बताया है कि वह जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में बराक ओबामा की सेवाओं से बहुत खुश हैं। ब्लूमबर्ग के इस निर्णय पर मंगलवार की रात को अमेरिका के पूर्वी तट पर आए विनाशकारी तूफान सैंडी के बाद बराक ओबामा द्वारा उठाए गए कारगर कदमों ने भी प्रभाव डाला है।इससे पहले यह बताया गया था कि ओबामा सरकार ने न्यूजर्सी, न्यूयॉर्क और कनेक्टिकट में तूफान से पीड़ित निवासियों की मदद के लिए 34 लाख डॉलर आवंटित किए हैं।उल्लेखनीय है कि सन् 2010 में ब्लूमबर्ग की एक बार अर्थव्यवस्था के हालात पर चर्चा के दौरान ओबामा से जिरह हो गई थी। इसके बाद ब्लूमबर्ग ने कहा था कि ओबामा बेहद घमंडी व्यक्ति हैं। उस वक्त ओबामा छुट्टिया बिताने विनयार्ड में थे। इस दौरान ब्लूमबर्ग और ओबामा ने 15 मिनट तक बात की थी। समाचार पत्र ऑस्ट्रेलियन फाइनेंसियल रिविव के अनुसार मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डाक ने इस बातचीत के बारे में बताया था ओबामा से बात करने के बाद ब्लूमबर्ग ने कहा कि मैं इस तरह के घमंडी इंसान से कभी नहीं मिला।

इसके विपरीत हमारे यहां प्रधानमंत्री खुलेआम अबाध विदेशी पूंजी प्रवाह और निवेश का माहौल बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण, खनन अधिनियम, पर्यावरण और वनाधिकार कानून के तहत किसी भी  नियंत्रण को खत्म करने की वकालत कर रहे हैं।प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट के लिए बायोमैट्रिक डिजिटल नागरिकता का इंतजाम किया गया है ताकि बहुसंख्यक बहिष्कृत समुदायों को जल जंगल और जमीन से बेदखल किया जाये।अभयारण्य और समुद्तरतट तक  परमाणु संयंत्रों और सेज की बलि चढ़ाये जा रहे हैं। तेल और कोयला जैसी प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े मंत्रालयों के मंत्री तक कारपोरेट तय करते हैं। पर्यावरण मंजूरी न मिली तो पर्यावरण मंत्री बदल दिये जाते हैं।रविवार को रामलीला मैदान पर कांग्रेस की महारैली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, कोई भी देश तेज आर्थिक विकास के बिना गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा जैसी समस्याओं के छुटकारा नहीं पा सका। कड़े फैसले किए बिना रोजगार के अवसर पैदा नहीं किए जा सकते। देश में निवेश को बढ़ाया जाए हमने इस दिशा में बराबर कोशिशें की हैं और हमें कामयाबी भी मिली है। हमने आर्थिक विकास का रेकॉर्ड बनाया है। हमने इस पर खास ध्यान दिया है। तेज आर्थिक विकास का फायदा सबको मिलना चाहिए, गांवों तक पहुंचना चाहिए। हमारी पार्टी और सरकार का मानना है कि देश की तरक्की होनी चाहिए।हमारी सरकार का मानना है कि ये फैसला हमारे हित में है, इसलिए आम जनता औऱ किसानों दोनों को फायद होगा। आज किसानों की फसल का हिस्सा इसलिए बर्बाद हो जाता है क्योंकि स्टोरेज नहीं होता। लेकिन हमने इन सुविधाओं को बढ़ाने के लिए प्रावधन किया है। हमारे फैसले के बारे में कहा जा रहा है कि छोटे व्यापारियों को नुकसान होगा। ऐसा जनता को गुमराह करने के लिए कहा जा रहा है, या समझ न होने की वजह से कहा जा रहा है। हमने समझदारी से फैसला लिया।1991 में FDI के बारे में जरूरी फैसले किए थे, उसके अच्छी नतीजे साफ दिखाई देते हैं। विरोध करने वालों में फर्क इस मुद्दे पर है कि हम किस तरह से देश का निर्माण करना चाहते हैं। हम फैसले में बदलाव भी ला सकते हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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