सीमावर्ती जिले जैसलमेर में सो रही है पुलिस

एक के बाद एक हो रही है घटनाएं लेकिन पुलिस के पास कोई सुराग नहीं..आम जनता में पुलिस को लेकर दिखाई दे रहा है रोष…जैसलमेर विधायक ने जताई चिन्ता….

-जैसलमेर से मनीष रामदेव||
सीमावर्ती जिले जैसलमेर में आम जन की सुरक्षा के लिये काम रही पुलिस इन दिनों अपनी कार्य क्षमता पर खरी उतरती दिखाई नहीं दे रही है। शहर में आपराधिक घटनाओं के बढते ग्राफ और हर मामले में पुलिस की विफलता ने आम जनता में पुलिस की विश्वसनीयता को कम कर दिया है और सुरक्षा के सवाल पर लोगों का भरोसा पुलिस से उठ सा गया है, एक के बाद एक हो रहे मामलों में पुलिस को मिल रही नाकामी ने कहीं न कहीं आम आदमी को अपनी सुरक्षा के लिये चिन्तित करना आरम्भ कर दिया है क्यों कि लोगों की माने तो पुलिस के भरोसे सुरक्षा की आस रखना अपने आप को धोखा देने जैसा है।
प्रदेश के सबसे बडे क्षेत्रफल में फैला जिला है जैसलमेर सीमा पर स्थित होने व पर्यटन के लिहाज से भी यह जिला अपनी अलग पहचान रखता है, लेकिन जिले की सुरक्षा की बात करें तो शायद प्रदेश की कांग्रेस सरकार इसके लिये चिन्तित दिखाई नहीं पड रही है। जिले में लगातार हो रही आपराधिक घटनाएं एवं इन घटनाओं के पुलिस के पास कोई सुराग नहीं होना स्पष्ट रूप से पुलिस की नाकामी को दर्शा रहे हैं लेकिन सरकार इस ओर आंखे मूंदे किसी बडे मामले के होने का इंतजार करती दिखाई पड रही है।
नजर डाले अगर जैसलमेर में पिछले तीन माह में हुए मामलों पर तो आंकडे चौकाने वाले होंगे और इसमें सबसे खास बात जो निकल कर सामने आ रही है वह यह है कि इन में से एक भी मामले में पुलिस को सफलता हासिल नहीं हो पाई है।

घटना 1- तारीख 8 अगस्त 2012, मामला – हेरोईन तस्करी मामला-  जैसलमेर जिला मुख्यालय पर हनुमान चौराहा स्थित आस्ट्रेलिय ब्लू नाम की होटल से एटीएस व पुलिस द्वारा संयुक्त कार्यवाही करते हुए 8 किलो हेरोईन बरामद करते हुए पांच तस्करों को गिरफ्तार किया गया था लेकिन जैसलमेर पुलिस द्वारा इस मामले में एक आरोपी को बचाने का प्रयास कर मामले में लीपापोती का प्रयास किया गया था और पकडे गये पांच लोगों में से चार की ही गिरफ्तारी दिखाई गई थी लेकिन इस मामले पर एचबीसी न्यूज द्वारा एक आरोपी को बचाये जाने की खबरें प्रसारित किये जाने के बाद जहां पुलिस को उस आरोपी को गिरफ्तार करना पडा वहीं एटीएस ने भी पुलिस की जांच में अविश्वास जाहिर करते हुए उसे इस मामले से अलग कर जांच अपने हाथ में ले ली गई थी। पुलिस की अपराधियों के साथ साठगांठ के इस मामले ने आम जनता में पुलिस की छवि को धूमिल किया था।

घटना 2- तारीख 4 सितम्बर 2012 मामला- जिला परिषद कार्यालय में ताले टूटे– जिले भर की ग्रामीण विकास योजनओं को संचालित करने वाली जिला परिषद जहां से करोडों रूपये की विकास योजनाओं का संचालन होता है। लेकिन चोरों ने अपने बुलंद हौसलों का परिचय देते हुए यहां के ताले भी तोड दिये और पुलिस के पास आज तक इस मामले में कोइ सुराग नहीं है। गौर तलब है कि शिक्षक भर्ती परीक्षा के बाद परिणामो मे हेराफरी की नियत से जिला परिषद परिसर मे चोरो द्वारा ताले तोड कर परीक्षा रिकार्ड के साथ छेडछाड की गई थी जिसको लेकर स्थानीय विधायक छोटूसिंह भाटी व अभ्यार्थियों ने जम कर हंगामा किया था लेकिन पुलिस ने अपनी औपचारिकता पूरी करते हुए केवल मामला दर्ज कर इतिश्री कर ली, पुलिस के पास इस घटना के करीब दो माह गुजर जाने के बाद भी कोई सुराग नहीं है और मामला ठंडे बस्ते में जाता दिखाई पड रहा है।

घटना 3- तारीख 12 सितम्बर 2012 मामला- जिला कलक्टर कार्यालय परिसर में चोरी। जिला कलक्टर कार्यालय स्थित उप पंजीयक कार्यालय, पुलिस कोतवाली से 100 मीटर की दूरी, पुलिस अधीक्षक कार्यालय से महज 50 मीटर की दूरी पर स्थित, लेकिन फिर भी चोरों के बुलंद हौंसले और 11 सितम्बर की रात को चोर यहां से करीब 1 क्विटल वजनी तिजोरी जिसमें करीब 21 लाख रूपये भरे थे ले उडे। पुलिस के पास कोई सुराग नहीं, आज तक अंधेरे में तीर चला रही है पुलिस।
घटना का असर- बात करें अगर इस घटना के असर की तो शहर के सबसे सुरक्षित जिला कलक्टर कार्यालय परिसर में अगर चोरी होती है तो यह चोरों के बुलंद हौंसलों और पुलिस की नाकामी का परिचय तो देता ही है लेकिन इसके साथ आम जनता में भी भय व्याप्त है कि शहर का सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली जगह पर भी चोर हाथ साफ कर सकते हैं तो आम आदमी की क्या बिसात।

घटना 4- तारीख 1 अक्टूबर 2012 मामला- स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में सुरंग खोद कर हुई 83 लाख की चोरी। शहर की सबसे व्यस्ततम मार्ग गडीसर रोड से हनुमान चौराहे की और जाने वाली सडक और इस सडक पर स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया। इस बैंक में चोर द्वारा करीब 12 फीट लम्बी सुरंग खोद कर की गई 83 लाख रूपये की चोरी। हालांकि इस मामले को हनुमानगढ पुलिस की चौकसी की वजह से खोल दिया गया है लेकिन अगर बात करें जैसलमेर पुलिस की इस मामले में पकड की तो घटना घटित होने से लेकर चोर पकडे जाने तक पुलिस धूल में ही लठ्ठ मारती रही। पहली बात- घटना के बाद जहां पुलिस को घटना स्थल को सील कर देना चाहिये था वहां पुलिस द्वारा ऐसा नहीं किया गया जिसके चलते घटना स्थल पर आम लोगों की आवाजाही ने मौके पर पडे सबूतों को मिटा दिया, पुलिस द्वारा इस संबंध में जब बीएसएफ के स्काव्यड डॉग की मदद ली गई तो बीएसएफ ने घटना स्थल पर अधिक लोगों की आवाजाही की बात करते हुए कुत्तों द्वारा अपराधी की सुगंघ के आधार पर जांच में असमर्थता दिखाई गई,। दूसरी बात- घटना घटित होने के बाद पुलिस ने न तो शहर में नाके बंदी की और न ही शहर से बाहर जाने वाली बसों व रेलों पर जांच करवाई गई जबकि पकडे गये आरोपी ने बताया कि वह घटना वाले दिन जैसलमेर में ही था ओर उसी दिन शाम को रेल से दिल्ली गया था, अगर पुलिस तत्परता से रेलों व बसों में धरपकड करवाती तो मामला उसी दिन खुल जाता। तीसरी बात- आरोपी द्वारा बैंक से चुराये गये 83 लाख रूपयों में से केवल 3 लाख रूपये अपने साथ ले जाये गये थे शेष करीब 80 लाख रूपये बैंक के पास ही स्थित पार्क में कचरे के ढेर में रखे गये थे लेकिन पुलिस को इसकी भी कोइ जानकारी नहीं मिल इससे साफ जाहिर होता है कि पुलिस शहर की सुरक्षा को लेकर कितनी चौकस है। चौथी बात- आरोपी द्वारा हनुमानगढ में जाकर बैंक से चुराये गये रूपयोें को चलाने के प्रयास में पकडा जाना हनुमानगढ पुलिस की सफलता मानी जायेगी न कि जैसलमेर पुलिस क्योंकि घटना घटित होने के बाद से आरोपी के पकडे जाने तक जैसलमेर पुलिस के पास कोई भी सुराग नहीं था।

घटना 5 – तारीख 1 अक्टूबर 2012, मामला- मृत घोषित आतंकी  का दिल्ली पुलिस द्वारा 20 साल बाद जैसलमेर के रामगढ स्थित फार्म हाउस  से गिरफ्तार होना। जैसलमेर जिले के सीमावर्ती गांव रामगढ संवेदनशील माने जाने वाले इस सीमा क्षेत्र पर पुलिस के चौकन्नेपन की पोल खोलता यह मामला जहां पर यह आतंकी पिछले लंबे समय से निवास कर रहा था लेकिन पुलिस व खुफिया विभाग को इसकी कोई जानकारी नहीं थी।  20 साल पहले मृत घोषित किये जा चुका खालिस्तानी आतंकी सुखविन्दर सिंह पिछले लम्बे समय से जैसलमेर के रामगढ गांव में रह रहा था यह खालिस्तान कमाण्डो फोर्स का सदस्य था जिसे 1992 में पंजाब पुलिस ने मृत घोषित कर दिया था तब से यह आतंकी जैसलमेर में रह रहा था लेकिन जैसलमेर खुफिया विभाग व पुलिस को इसके बारे में जानकारी नहीं थी इस मामले में दिल्ली पुलिस की चौकस निगाहों ने इस आतंकी को पहचान लिया और कार्यवाही करते हुए इसे गिरफ्तार कर दिल्ली ले जाया गया। दिल्ली पुलिस की माने तो पूर्व में नशीली दवाओं की तस्करी व अन्य आतकी घटनाओं में इसकी लिप्तता हो सकती है। इस घटना ने भी यह जाहिर कर दिया कि जैसलमेर की पुलिस कितनी चौकन्नी है और सीमावर्ती क्षेत्र पर तैनात होने के बाद भी अपने कर्तव्य का निर्वहन किस प्रकार से कर रही है।

घटना 6- तारीख 18 अक्टूबर 2012, डलाराम जाट हत्या प्रकरण। जैसलमेर जिला मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित डाबला गांव के पास नेशलन हाईवे संख्या 15 एक युवक की संदिग्घ हालत में लाश मिलना और पोस्टमार्टम के बाद इस युवक की हत्या होना बताया जाना लेकिन इस मामले में भी पुलिस के हत्थे कुछ नहीं चढ पाया है। घटना होने के के करीब दो सप्ताह गुजर जाने के बाद भी इस मामले को लेकर पुलिस के पास कुछ भी ठोस जानकारियां नहीं हैं। हत्या के दिन पुलिस द्वारा मृतक के दोस्तों व रिश्तेदारों से पूछताछ की गई थी लेकिन इस पूछताछ में पुलिस को कुछ भी नहीं मिल पाया और समय बीतने के साथ साथ लोगों में यह चर्चा का विषय बनता जा रहा है कि पिछले मामलों की तरह इस मामले पर भी पुलिस की नाकामी की धूल ही जम पायेगी।

इन आंकडों के अलावा भी पिछले तीन माह में जैसलमेर शहर में हुई घरों में चोरियों व दुपहिया व चौपहिया वाहनों की चोरियों की बात की जाये तो चौंकाने वाले आंकडे सामने आ सकते हैं।
अब अगर इन मामलों पर गौर करें और जैसलमेर पुलिस का आंकलन किया जाये जवाब अपने आप ही जाहिर होता है कि सीमावर्ती जिले की पुलिस कितनी चौकन्नी है और कितनी कर्तव्य परायण और इतना ही नहीं इस पुलिस के भरोसा कितना सुरक्षित है जैसलमेर जिला।
पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्न उठाते हुए जैसलमेर विधायक छोटूसिंह भाटी ने भी शहर की सुरक्षा को लेकर चिन्ता व्यक्त की है और यहां तक कह दिया कि जैसलमेर में पुलिस की स्थित है तो भी वहीं हाल और नहीं है तो भी वही हाल वाली है।

 

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