रंग लाया दीवानों का संघर्ष, गृह मंत्रालय को ठुकराना पड़ा दिल्ली सरकार का प्रस्ताव

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 आखिरकार मीडियादरबार.कॉम की लगभग महीने भर चली मुहिम और उसमें मिले लाखों पाठकों  के सहयोग का नतीज़ा आ ही गया। गृह मंत्रालय को हारकर प्रधानमंत्री की अपील और दिल्ली सरकार के प्रस्ताव को मानने से मना करना पड़ गया। सोमवार देर शाम मंत्रालय ने विंडसर प्लेस प्रकरण से अपना हाथ वापस खींच लिया। गौरतलब है कि पिछले महीने दिल्ली सरकार ने प्रधानमंत्री की अपील पर गृह मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजा था जिसमें विंडसर प्लेस का नाम सन् 1920 के दशक के जाने-माने बिल्डर और लेखक खुशवंत सिंह के पिता सर शोभा सिंह के नाम पर रखने की सिफारिश की गई थी।

प्रकरण की शुरुआत हुई थी 28 जून को, जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बड़े ही गुपचुप तरीके से दिल्ली की शीला सरकार को बाकायदा एक पत्र लिख कर विंडसर प्लेस का नाम बदलने का सुझाव रखा था। इस पत्र में मनमोहन सिंह ने इस जगह का नाम उनके समर्थक और प्रशंसक बने लेखक खुशवंत सिंह के पिता सर शोभा सिंह के नाम पर करने की अपील की थी। पत्र में जिक्र था कि सर शोभा सिंह अंग्रेजो के जमाने में दिल्ली के जाने-माने ठेकेदार थे और उन्हें याद करने का यह एक बढ़िया तरीका होगा।

लेकिन यह भी एक तथ्य है कि कभी “आधी दिल्ली का मालिक” के नाम से जाना जाने वाला यह शख्स अमर शहीद भगत सिंह के खिलाफ असेंबली बम कांड में गवाह रह चुका है। कुछ इतिहासकारों ने तो यहां तक लिखा है कि शोभा सिंह दर्शक गैलरी के दरवाजे पर डटा रहा और सिपाहियों को बुला कर भगत सिंह की ओर दौड़ाया। यह अलग बात है कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त खुद ही नारेबाजी करते हुए गिरफ्तारी देने के लिए तैयार बैठे थे।

हमें जैसे ही प्रधानमंत्री के पत्र की जानकारी मिली हमने इस खबर को  न सिर्फ अपने मंच पर बल्कि फेसबुक, ट्विटर तथा ऑरकुट समेत तमाम सोशल नेटवर्किंग साइटों पर फैलाया। उधर शीला सरकार ने भी आनन-फानन में गृह मंत्रालय को सर शोभा सिंह को सम्मान देने के लिए विंडसर प्लेस के नए नामकरण का प्रस्ताव केंद्राय गृह मंत्रालय को भेज दिया। दरअसल इस प्रस्ताव की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि दिल्ली सरकार तकनीकी तौर पर अभी भी केंद्र शासित प्रदेश की तरह कार्यरत है और इस तरह के किसी भी फेसले के लिए इसे केंद्र सरकार की अनुमति की जरूरत होती है, अन्यथा शायद दिल्ली सरकार खुद ही यह कार्रवाई कर देती।

बहरहाल, इस मुहिम में बड़ी संख्या में इंटरनेट यूजरों और ब्लॉग लेखकों ने खुद आगे बढ़ कर हिस्सा लिया। इस सीरीज में लिखे गए तमाम लेखों को उन्होने न सिर्फ हमारे लिंक के जरिए बल्कि अपने-अपने पोस्ट पर  लगा कर देश भर में फैलाया। कुछ समाचार चैनलों ने भी इस खबर पर अपना ध्यान केंद्रित किया। न्यूज-24 और दिल्ली आजतक ने जहां इक्का-दुक्का रिपोर्ट लगा कर इस लक्ष्य को पाने में सहयोग किया वहीं नए लॉन्च हुए चैनल न्यूज़ एक्सप्रेस ने तो बाकायदा अभियान ही छेड़ दिया।

इस मुद्दे पर लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेताओं का रुख खासा चौंकाने वाला रहा। संपर्क करने पर तो बयान देने को हर कोई तैयार दिखा, लेकिन किसी ने  खुद आगे आ कर कोई आंदोलन छेड़ने की जहमत न उठाई। ऐसे में नौजवानो के एक छोटे से संगठन- ” भगत सिंह क्रांति सेना” का कदम बेहद सराहनीय रहा। इस संगठन ने न सिर्फ कॉलेजों में और नौजवानों के बीच इस मुद्दे पर जागरुकता अभियान चलाया बल्कि जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल करने की तैयारी भी कर ली।

सूत्रों का कहना है कि सरकार ने खुशवंत सिंह की ताजा सफाई पर सभी अखबारों पर पाठकों की प्रतिक्रिया पर नज़र रखी थी। करीब निन्यानवे प्रतिशत लोग जब खुशवंत सिंह की दलीलों से सहमत नहीं दिखे तो पहले से ही संसद में अन्य कई मुद्दों पर घिरी सरकार ने इस मामले से पीछा छुड़ाने में ही अपनी भलाई समझी।

मीडियादरबार.कॉम अपने उन तमाम समर्थकों का शुक्रिया अदा करता है जिन्होंने इस मिशन को सफलता के अंजाम तक पहुंचाया। हम यहां एक बार फिर यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हमारा खुशवंत सिंह के लेखन (और खुद उनके शब्दों में ही- बकवास) से कोई दुराग्रह नहीं है, लेकिन साथ ही यह भी बताना चाहेंगे कि इस प्रकरण को एक चेतावनी माना जाए ताकि कोई अपनी लेखनी का इस्तेमाल अपने स्वार्थों को साधने के लिए न कर पाए।

 

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9 thoughts on “रंग लाया दीवानों का संघर्ष, गृह मंत्रालय को ठुकराना पड़ा दिल्ली सरकार का प्रस्ताव

  1. खुशवंत सिंह के पिता ‘शोभा सिंह’ और ‘शादी लाल’ की गवाही से ‘सरदार भगत सिंह’ को फांसी हुयी थी , ‘शोभा सिंह’ और ‘शादी लाल’ दोनों को सर की उपाधि और अथाह जमीन जायेदाद मिली थी , ‘शोभा सिंह’ बाद में इस जायेदाद के दम पर बहुत बड़ा बिल्डर बन गया और ‘शादी लाल’ भी एक चीनी मिल का मालिक बना मगर शादी लाला मरने पर गाँव के किसी दुकानदार ने कफ़न का कपडा नहीं दिया था और कफ़न का कपडा दिल्ली से मंगवाना पड़ा था , सर शोभा सिंह (खुशवंत सिंह) के पिता के नाम पर दिल्ली की एक सड़क का नाम रखा जा रहा है , गद्दारों को अंग्रेजों ने इनाम दिया था ये तो उन के हिसाब से जाएज भी था मगर अब आज़ाद भारत में गद्दारों का सम्मान .
    आज़ाद भारत में हमेशा सच्चे देशभक्त हमेशा गरीबी में जीते रहे और नकली देशभक्तों ने खूब मौज की है, सरदार भगत सिंह के परिवार को भी सही पहेचान और सम्मान आज़ादी के काफी समय बाद ‘मनोज कुमार ‘ जी की फिल्म ‘शहीद’ के आने के बाद मिला, (मुझे सौभाग्य से सरदार भगत सिंह जी के छोटे भाई “राजेंदर सिंह जी’ के दर्शन एवं बात करने का अवसर मिला था ). वीर सावरकर का सारा जीवन ही संघर्ष में बीता था. रानी झाँसी, कुंवर सिंह , मंगल पण्डे , नवाब सिराजुद्दौला, नबाब आशफुद्दौला, चंद्रशेखर आज़ाद, ………..आदि किसी के परिवार का बाद में किया हुआ किसी को भी शयेद कुछ पता नहीं होगा
    मै खुशवंत सिंह का दोष नहीं कह रहा हूँ , मैं तो केवल इतना कह रहा हूँ कि आज़ादी कि लड़ाई लड़ने वाले आज़ादी के बाद भी दुःख झेलते रहे और देश के प्रति गद्दारी करने वाले ‘सर शोभा सिंह’, ‘सर शादी लाल’, रामपुर के नवाब, महाराजा पटियाला, ……… आदि के बंसज सारी जिन्दगी ऐश करते रहे .

  2. जय हो , भगत सिंह क्रांति सेना का भी धन्यवाद |

  3. jo gaddaro ko sammnit karte han wo ssale khud hi gaddar han.
    ve to apna bhaichara nibha rhe han,gaddaron ka sath de kar.
    lekin shayad ve aam aadmi or media ki power ko nhi jante,agar hum unko kursi per baitha sakte han to lat markar us kursi ko tod bhi sakte han…….thanks to media and thank to our public

  4. इस लड़ाई में जीत के लिए मीडिया दरबार की पूरी टीम को जितना बधाई दी जाए कम है। उन्होंने दिखा दिया कि एक अकेला आदमी अगर सच के साथ खड़ा हो तो झूठ की पूरी व्यवस्था को उसके कदमों में झुकना ही पड़ता है।

  5. दरअसल हकीकत ये है कि हम अपना मोल आज तक समझ न पाए, जिस दिन हमने अपना मूल्यांकन कर लिया उस दिन हर मंजिल आसान हो जायेगी . मुददा खुशवंत सिंह नहीं हमारी अस्मिता थी. और जब अस्मिता पे दांव लग जाता है तो फिर हमें जान की परवाह नहीं रहती.. हम अपनी मुहिम में कामयाब हुए, ये ख़ुशी की बात है..

  6. this is really a good news 2 all those who have atleast 1%patriotism in their mind……congratulations to all of them who r behind this….great effort …….congrats to media durbar……

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