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चालीस दिन में भी नहीं खुला नवरुणा अपहरण कांड…

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बिहार के मुजफ्फरपुर से बहुचर्चित  12 वर्षीया नवरुणा अपहरण कांड में चालीस दिनों बाद भी कोई सुराग हाथ नहीं लग पाने पर रविवार को एडीजी गुप्तेश्वर पांडे जवाहर लाल रोड स्थित चक्रवती लेन पहुंचे. उनके साथ डीआइजी सुशील खोपड़े व एसएसपी राजेश कुमार सहित जांच से जुड़े तमाम अधिकारी मौजूद थे. एडीजी ने नवरुणा के पिता अमूल्य चक्रवती व मां मैत्री चक्रवती से घंटों बातचीत की.

प्रेम-प्रसंग से लेकर भूमि माफिया के बिंदु पर प्रत्येक कोण से चर्चा की गयी. नवरुणा के माता-पिता से मिली जानकारी के आधार पर रविवार की शाम टावर संचालक को फिर से हिरासत में लिया गया है. बताया जाता है कि नवरुणा के मुख्य द्वार की चाबी टावर संचालक के पास भी रहती थी.

पिता का कहना था कि अपहर्ताओं ने खिड़की से घुस कर नवरुणा को कपड़े में लपेट कर मुख्य द्वार से बाहर निकाला था. हालांकि पुलिस इस अपहरण कांड से जुड़े तथ्यों को खुलासा करने से परहेज कर रही है. नवरुणा कांड के पूरे मामले की मॉनिटरिंग डीआइजी सुशील खोपड़े खुद कर रहे है. उन्होनें बताया कि पुलिस की कई टीम इस अपहरण की गुत्थी सुलझाने में जुटी है. प्रत्येक कोण से जांच के लिए अलग-अलग टीम बनायी गयी है. पुलिस की दो टीम कोलकाता व दिल्ली में डेरा डाले हुए है. इधर, एडीजी ने पूरी टीम के साथ नवरुणा के कमरे से लेकर पूरे घर का मुआयना कर हरेक कोण पर जांच की.

नवरुणा के पिता अमूल्य चक्रवती ने कहा है कि उनकी बेटी के अपहरण में भूमि माफियाओं का हाथ है. कई भूमि माफियाओं की नजर उनकी बेशकीमती जमीन पर टिंकी थी. उनलोगों ने 6 कट्टा जमीन का सौदा मालीघाट के मुकेश व रंजीत से तीन करोड़ में 1 सितंबर को तय की थी. बातचीत के दौरान तय हुआ था कि भादो माह के बाद पैसा पैंमेट होगा, लेकिन उसके पहले ही नवरुणा का अपहरण हो गया. इस अपहरण कांड में किस भूमि माफिया का हाथ है, इस प्रश्न पर अमूल्य ने कोई सटीक जबाव नहीं दिया. नवरुणा के पिता ने कहा कि पुलिस प्रशासन पर उनका विश्वास है. पुलिस के वरीय अधिकारियों ने नवरुणा की बरामगदी का उन्हें आश्वासन दिया है.अब तक उनलोगों को बरगलाया जा रहा था. बार-बार पूछने पर यह कहा जा रहा था कि उनकी बेटी अच्छे परिवार में रह रही है. लेकिन कहां, इसका जबाव पुलिस के अधिकारी नहीं दे रहे थे. अगर अपहरण के शुरुआत में सही तरीके से जांच होती, तो शायद मामला कुछ अलग होता. प्रेम प्रसंग का मामला बता पुलिस ने श्वान दस्ता तक को नहीं बुलाया था. बार-बार पुलिस के झूठे आश्वासन के कारण उन्हें नींद की गोली खानी पड़ी. नवरुणा के चाचा निर्मल्य चक्रवती का कहना था कि जवाहर लाल रोड में दुकानों की रक्षा के लिए कई चौकीदार की डयूटी रहती है, लेकिन घटना के दिन किसी भी आवाज नहीं सुनाई पड़ी.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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