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चिंता का कारण है मनोरोगियों की बढ़ती संख्या..

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-डॉ. आशीष वशिष्ठ||

विशेषज्ञ शर्लिन चोपड़ा को भी मनोरोगी की श्रेणी में रखते हैं..

मनोरोगियों की तेजी से बढ़ती संख्या एक बड़ी चिंता का कारण है. वहीं मानसिक रोगियों के प्रति परिवार व समाज की बढ़ती बेरूखी और असहयोग कोढ़ में खाज का काम कर रहा है. असल में मनुष्य ने सभ्यता, समाज और विज्ञान के क्षेत्र में बुलंदियों को तो छू लिया है लेकिन इसके साथ-साथ लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में भी काफी बदल गई है. लोगों की सोच, जीवन शैली में भी काफी परिवर्तन हुआ है. लोगों में अधिक सुख व आराम की तलाश के कारण मानसिक रोग तेजी से बढ़ रहे हैं.

लोग जितने मॉडर्न व उन्नत हो रहे हैं, उनकी इच्छाओं व उम्मीदों का दायरा उतना ही बढ़ता जा रहा है. वह धीरे-धीरे मेंटल डिसऑर्डर की ओर अग्रसर हो रहे हैं और उन्हें इसका अहसास तक नहीं हो रहा है. इसकी वजह से उनकी रोजमर्रा की सहज और सीधी जिंदगी जटिल बन रही है. वल्र्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार भारत और अमेरिका में सबसे ज्यादा डिप्रेशन और मेंटल इलनेस के पीडि़त मिलेंगे. विश्व स्वास्थ्य संगठन [डब्लूएचओ]के आंकड़ों पर गौर करें तो दुनियाभर में करीब 45 करोड़ व्यक्ति मानसिक बीमारियों या तंत्रिका संबंधी समस्याओं के शिकार हैं. डाइग्नोस्टिक एंड स्टैटिस्टिकल मैनुअल ऑफ मेन्टल डिस्आर्डर्स के नवीनतम संस्करण में इन मानसिक बीमारियों का जिक्र है. साथ ही यह भी कहा गया है कि मनोविज्ञानियों के लिए आज भी यह पता लगाना एक चुनौती है कि अगर कोई व्यक्ति मानसिक बीमारी से पीडित है तो उसकी बीमारी क्या है.

डब्लूएचओ के सर्वे के अनुसार प्रतिदिन 10 लोगों में से एक लोग इस बीमारी का शिकार होते हैं. विश्व के 125 मिलियन लोग मानसिक असंतुष्टि का शिकार हैं. अमेरिका में 24 फीसदी लोग मेंटल डिसऑर्डर का शिकार हैं, वहीं भारत के 14 फीसदी लोग इस मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं. सर्वे में बताया गया है कि वर्ष 2020 तक मेंटल डिसऑर्डर व मानसिक रोग सबसे बड़ी बीमारी के तौर पर सामने आ जाएगा. इस बीमारी से ग्रसित होकर विश्व में पूरे दिन भर में 3 हजार से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं. 14 से 44 साल की उम्र के लोगों में यह ज्यादा देखने को मिलती हैं. भारत में पुरुषों से ज्यादा महिलाएं इस बीमारी से ग्रसित हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ के अनुसार भारत की महिलाएं रोज किसी न किसी मानसिक तनाव से गुजरती हैं. घर से ऑफिस तक की आपाधापी उनकी जिंदगी को असंतुलित कर देती है. क्योंकि महिलाएं भावनाओं से ज्यादा जुड़ी हुई रहती हैं, इसलिए उन्हें इन परेशानियों से जूझना पड़ता हैं. अगर ऐसा ही रहा तो वर्ष 2030 तक भारत में मेंटल डिसआर्डर जैसी बीमारी से ग्रसित लोग सबसे ज्यादा होंगे. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने राज्यसभा में पेश आंकड़ों में कहा था कि देश में मानसिक रोगियों की संख्या में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है और यह संख्या करोड़ों में पहुंच चुकी है इसलिए सरकार इसका सर्वेक्षण कराना चाहती है. आजाद ने समस्या की गंभीरता के साथ यह भी स्वीकार किया कि देश में मनोचिकित्सकों और मनोरोगियों का उपचार करने वाले संस्थानों की भी संख्या काफी कम है. एक अनुमान के अनुसार देश में मानसिक रोगियों की संख्या 125 मिलियन है. देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 19 करोड़ आबादी में करीब तीन करोड़ लोग इस रोग से ग्रस्त है. यह चौकानें वाले तथ्य इंडियन साइकियाट्रिक सोसायटी (आइपीएस) के है. उत्तर प्रदेश देश के उन राज्यों में शुमार है जहां सबसे तेजी से मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है.

तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि लोगों की नैतिकता में आई गिरावट के चलते आज स्वार्थ रिश्तों पर हावी हो रहा है. वहीं मानसिक रोगी से पिंड छुड़ाने के लिए उन्हें मानसिक रोग अस्पतालों में भर्ती कराकर परिवार अपने कर्तव्य से मुक्ति पा लेते हैं. अस्पतालों में रोगी को इलाज तो मिलता है लेकिन जिस प्यार, दुलार, स्नेह और देखभाल की आवश्यकता मानसिक रोगियों को होती है वो उन्हें अस्पताल में मिल नहीं पाती है. मानसिक रोगियों की बढ़ती संख्या के पीछे अनेक कारण है, लेकिन जिस तेजी से देश में मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है वो सोचने को बाध्य करती है. जब तक समस्या बड़ी न हो तब तक लोगों का ध्यान मानसिक बीमारियों की ओर जाता ही नहीं है. अकसर मानसिक बीमारी के संकेतों को लोग यह सोचकर नजरअंदाज कर जाते हैं कि यह तो अमुक व्यक्ति की आदत ही है. कुछ लोग मानसिक बीमारी को पागलपन समझते हैं. अवसाद, हमेशा दु:खी रहना, निराशा से उबर न पाना और मामूली बातों को लेकर आत्महत्या के बारे में सोचना इन लक्षणों को कोई भी गंभीरता से नहीं लेता. इस प्रकार के मनोविकारों से ग्रस्त व्यक्ति की सोच को अगर हम सकारात्मक दिशा में बदल सकें तो आधी समस्या वैसे ही हल हो जाएगी. ज्यादातर लोगों को अपनी बीमारी के बारे में पता ही नहीं है. असावधानी बरतने से स्थिति बिगड़ सकती है. इसमें से कई तो जाने-अनजाने, झांड-फूंक के चक्कर में पडक़र अपनी बीमारी और बढ़ा लेते हैं.

अपने भले की सोच के चलते कुछ लोग अपनों को ही मानसिक रोगी करार देकर अस्पतालों में भर्ती करा देते हैं. देशभर के 400 मानसिक संस्थानों की समीक्षा के बाद सामने आए आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं. मानसिक रोगियों के हितों के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था ‘नाजमी’ ने हाल में देशभर के मानसिक अस्पतालों में मौजूद मरीजों पर अध्ययन किया. सामने आया कि करीब 20 प्रतिशत लोगों को अस्पतालों में भर्ती किए जाने की कोई जरूरत ही नहीं थी. ऐसे लोगों से बातचीत में खुलासा हुआ कि कहीं बहु ने सास को, कहीं बेटे ने पिता को तो कहीं पति ने पत्नी को मानसिक रोगी घोषित करने के लिए मनोचिकित्सकों की मदद ली. नेशनल एलायंस ऑन एक्सेस टु जस्टिस फॉर पीपुल्स विद मेंटल हेल्थ (नाजमी)के अनुसार लोगों ने स्वार्थ के चलते ऐसा किया. मानसिक रोगी घोषित करने की श्रेणी न होने के कारण इसका गलत इस्तेमाल हुआ. ऐसे लोगों में बुजुर्गो और महिलाओं की संख्या ज्यादा हैं. विकलांग अधिकार गु्रप के अनुसार कि ऐसे रोगियों को अधिकार होना चाहिए कि वह अस्पताल में भर्ती होंगे या या नहीं. इलाज के लिए ऐसे रोगियों को दिया जाने वाला करंट का इस्तेमाल भी बिना मरीज की सहमति के नहीं होना चाहिए.

मनोरोगों पर अंकुश लगाने के ठोस उपाय भी ढूंढने होगें यदि ऐसा न किया गया आने वाले समय में स्थिति भयावह हो जाएगी. मानसिक रोग विशेषज्ञों की मानें तो मरीजों की संख्या सामाजिक और आर्थिक असमानता की वजह से भी बढ़ रही है. पारिवारिक परेशानी और तनाव भी इसका एक बड़ा कारण है. मानसिक रोगियों के कानूनी हकों के बारे में जानकारी भी समस्या को बढ़ा रही है. मानसिक रोगों से पीडि़त लोगों के अधिकार की सुरक्षा करने के लिए मैंटल हेल्थ एक्ट बनाया गया है. इस एक्ट के तहत अगर मानसिक रोगी के अभिभावक उसकी देखभाल नहीं करते हैं, तो उनके विरूद्ध अदालत में याचिका दायर की जा सकती है और कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है. मानसिक रोग से पीडि़त व्यक्ति की संपति का ध्यान रखने के लिए अदालत हस्तक्षेप कर सकती है. इसके अलावा मानसिक रोगी मुफ्त कानूनी सहायता लेने के हकदार भी है. मानसिक रोगी हम सब और पूरे समाज की जिम्मेदारी है. हमें उनके साथ प्रेम, स्नेह और इज्जत से पेश आना चाहिए क्योंकि उन्हें चिकित्सा से अधिक हमारे साथ ओर स्नेह की आवश्यकता है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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