आक्रोशित भारत को दिखाती चक्रव्यूह ..

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-अंकित मुत्तरीजा||

गोविंद सुर्यवंशी और ना जाने कितने नाम हैं तुम लोगों के.. लेकिन बहुत समय से मैं तुम्हें खोज रहा था. अब चले.. |इसी डायलॉग के साथ फिल्म चक्रव्यूह का चक्र शुरू होता हैं. नक्सली कमांडर ‘गोविंद’ (ओम पुरी) पुलिस के हत्थे लगने के बाद से “लाल सलाम” के हर नारे के साथ जल, जंगल, जमीन की बात करने वाले काँमरेड आदिवासियों की जमीन के लिए लड़ने लगते हैं. फिल्म दो दोस्तों की विपरीत सोच से शुरू होती हुई एक राह पर दोस्ती के नाम पर दोनों को ला खड़ा कर देती हैं. अभय देओल जिन्होंने फिल्म में ‘कबीर’ का किरदार अदा किया हैं वो नंदीघाट के नक्सलियों से ख़बरी के तौर पर अपने डीजीपी पुलिस अधिकारी अर्जून रामपाल यानी आदिल के लिए जुड़ते हैं.

काफ़ी हद तक कमांडर ‘राजन’ (मनोज बाजपेयी) और उनके साथियों की कमर तोड़ भी देते हैं. भीतर ही उन्हीं के साथ रह कर घर का भेदी लंका ढाए जैसा कुछ कर दिया जाता हैं. वही,महांता ग्रुप जिसके प्रमुख लंदन में एक आलीशान बंगले में रहते हैं और 15,000 करोड़ का निवेश अपनी कंपनी के माध्यम से नंदीघाट में करने का प्राँजेक्ट बनाते हैं. तमाम पूंजीवादी गांव में रह रहें आदिवासियों को विकास के नाम पर उन्हें उनकी जमीन से बेदखल करने की जी तोड़ कोशिश में लग जाते हैं. आदिल खान इसे ग़लत ठहराते हुये तमाम ठेकेदारों को हवालात में डाल देते हैं और कुछ समय में गृह मंत्री के फोन से इस दुसाहस के लिए फटकारें भी जाते हैं. इसी दौरान आदिल का गांव वालों में विश्वास पैदा करने का संकल्प ढीला होने लगता हैं.आदिल का मानना होता हैं कि बिना आदिवासियों के सहयोग के नक्सली कुछ समय में ही विफल हो जाएंगे. वही, धीमे धीमे कबीर आदिल के साथ मिल कर पुलिस की हर मूवमेंट की जानकारी नक्सली कमांडरो तक पहुंचा कर उन का भरोसा हासिल करने लगता हैं ..

लेकिन धीरे धीरे प्रकाश बंदूक, गोली से अपना हक़ लेकर रहेंगे कहने वाले नक्सलियों को ऐसे दर्दनाक ढंग से फिल्माते हैं कि दिल्ली की मेट्रो में घुमने वाला युवा भी सोचने पर मजबूर हो जाएं-क्या इन लोगों के साथ जो हुआ या हो रहा हैं वो सही हैं? महिला काँमरेड (जूही) जो अपने घर की जमीन छीन जाने के कारण और उसी के चलते पिता की हत्या की रपट लिखवाने थाने जा कर एक रात के बदले रिपोर्ट लिखूंगा की घटियां और शर्मनाक बात सुन कर,छत्तीसगढ़ से भाग मध्य प्रदेश जा कर नक्सल मूवमेंट से जुड़ती हैं फिर खूनी आंखो से तमाम संघर्ष के बाद दस साल जिंदा रहने पर 100 को खत्म कर डालने का दम भरती हैं! दूसरी ओर इन बातों के प्रभाव से कबीर खूद से लड़ने लगता हैं.उसकी लड़ाई किस चीज को लेकर हैं? नक्सलियों से, पूलिस से, वो देश के खिलाफ़ हैं या देश के साथ, आखिर ये लोग ऐसा क्यूं कर रहें हैं ? इन सवालों से उसकी मुठभेड़ इतनी भयावह होने लगती हैं जब वो देखता हैं कि बिना किसी बातचीत के मेरी जानकारी पर नक्सली और तमाम गांव वालों पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई गई. उसका दिल उसी को को दोषी बताने लगता हैं.

यही से आदिल का दोस्त जो शुरूआत से ही भावुक रहा हैं वो आदिल से इन चीजो को लेकर अपना विरोध दर्ज करने लगता हैं. दोस्त आदिल से एक दोस्त की हैसियत से आखरी मुलाक़ात करते वक्त़ दो टूक कबीर से कह देता हैं-गरीब को गरीब रखना, उसके अधिकारों से उसे वंछित रखना, सबसे बड़ा आतंकवाद हैं. इसी सिलसिलेवार बदलाव के दौरान महिला काँमरेड जूही से भावुक रिश्ता जुड़ने के बाद जब एक दफ़ा पुलिस रेड के दौरान कबीर यह पाता हैं कि जूही ने गांव के बच्चो और निर्दोष लोगों के लिए अपनी गिरफ्तारी दें दी.  तब उसी समय भागते हुये अपने दो साथियों संग कबीर एक ऐसी दौड़ लगाता हैं जो शायद उसके रास्ते को बदल कर रख देने की शुरूआत होती हैं, उसके मकसद को बदलने की शुरूआत. जंगल चौकी में पेट्रोलिंग पुलिस इंस्पेक्टर जूही के साथ जबर्दस्ती करता हैं और फटे कपड़ो में उसके मूंह से निकलती हर हवा के साथ यही अलफ़ाज निकलते हैं -“अपना हक़ लें कर रहेंगे”. कबीर अंधेरे में ही चौकी के बाहर से इंस्पेक्टर को साथियों समेत बंदूक की नोक से हाथ हवा में कर अंदर लें जाता हैं और पांच पूलिस अधिकारियों को ढेर कर देता हैं और  जूही को साथ लें जाता हैं. अगले दिन चौराहें पर पुलिस इंस्पेक्टर की लाश समेत खून से लिखा होता हैं- “तुम्हारें हर बर्बर अत्याचार का बदला इसी तरह देंगे” और कैमरा में प्रशासन व्यवस्था को लेकर फिर से सवालों का सिलसिला उठने लगता हैं. इसी दौरान कैसे राजन गिरफ्तार हुआ और आगे कैसे महांता ग्रुप के मालिक के बेटे को अगवा कर  नक्सली अपनी मांगे मनवाने में कामयाब हुये..! बेहद ही रोमांचक और हैरत अंगेज हैं क्योंकि जो प्रकाश झा ने दिखाया वो सचमुच में चक्रव्यूह की भांति भीतर के अंतर्विरोधों से दर्शकों के सोचने का चक्र चालू कर चुका होता हैं.

(अंकित मुत्तरीजा  आईसोम्स से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहें हैं.)

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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