क्यों न इस दशहरे अपने भीतर के रावण को मारा जाये..

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दहन करें अपने भीतर के रावणत्व का..तभी है विजयादशमी की सार्थकता…

डॉ. दीपक आचार्य

विजयादशमी पर्व अर्थात वह दशमी जो दस प्रकार के शत्रुओं, दसों दिशाओं में व्याप्त असत्य और बुराइयों पर सत्य की विजय का स्मरण कराता है। हर साल आने वाला दशहरा हमें कुछ न कुछ संदेश दे जाता है मगर हम हैं कि इसे औपचारिकता मात्र मानकर निर्वाह कर रहे हैं।

बुराई पर अच्छाई की, असत्य पर सत्य की और रावणत्व पर रामत्व की जय का उद्घोष करते हैं, भाषण झाड़ते हैं और रावण का पुतला दहन तथा लंका और रावण परिवार का दहन कर इस पर्व की इतिश्री मान लेते हैं।

साल दर साल रावण का दहन करने, स्वर्णभासी लंका को जलाने से लेकर असुरों का प्रतीकात्मक संहार करते हैं फिर भी रावणत्व कम नहीं हो रहा, आसुरी शक्तियाँ निरन्तर सुरसा होती जा रही हैं और लंकाई कल्चर का प्रभाव घर-परिवार और समुदाय-क्षेत्र से लेकर हर कहीं पूरे आकर्षण के साथ दिखाई देने लगा है।

कितने ही लोग आज बेफिक्र और बेशरम होकर राक्षसों की तरह घूम रहे हैं और क्या-क्या नहीं कर रहे हैं। हमारा अपना इलाका हो या दुनिया का कोई कोना, हर तरफ ऐसे लोगों की भरमार हो चली है जिनमें राक्षसों का स्वभाव और पूरे (अव) गुण विद्यमान हैं।

लंका के सारे आकर्षणों को पाने के लिए आजकल आदमी लंकाई स्वभाव में ढलता जा रहा है। हर कोई भिड़ा हुआ है पैसे बनाने में, सोना सहेजने में और जमीन-जायदाद पाने में। कुछ न मिल पा तो शौहरत पाने में।

कुछ बेचारे अच्छे लोगों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर लोग लंका युग में ही जी रहे लगते हैं। वैसे लंका और हमारे बीच कोई ज्यादा दूरी नहीं है। और दूसरे हिसाब से सोचें तो हम लंका के परिवेश और रावणी परंपराओं का अंधानुकरण करने लग गए हैं और हमें उन्हीं में आनंद व तृप्ति का अनुभव होता है।

जो काम रावण के जमाने में लंका में होता था वही आजकल भी हो रहा है। पूरी उन्मुक्तता और स्वच्छन्दता के साथ हम बेशर्म होकर वह सब कुछ प्राप्त करने मे लगे हुए हैं जो औरों के भाग्य का है अथवा जमाने भर के लिए बना है। हमारे कई क्षेत्र ऐसे हैं जो लोगों के लिए सोने की लंका बने हुए हैं।

सोने की लंका हमें आज भी सुहाती है और सोना भी। इस मामले में लंकाई संस्कृति का धु्रवीकरण हो चुका है। आदमियों की एक जमात सोना जमा करने उल्लूओं की तरह दिन-रात भाग रही है। दूसरी जमात ऐसी है जिसे सोने से फुर्सत ही नहीं है। समाज, राष्ट्र और दुनिया में कुछ भी हो जाए, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। खाना-पीना और सोना ही ऐसे लोगों के जीवन का परम लक्ष्य हो चुका हैै।

रावण के चरित्र पर गौर करें तो आजकल उसकी बुद्धिमता, भक्ति और विलक्षणताओं की बजाय हमने उसके वे सारे अवगुण अपना लिये हैं जिनकी वजह से उस महापराक्रमी को धूल धुसरित होना पड़ा।

यह अलग बात है कि हम उसके व परिवार के पुतलों का दहन हर साल जरूर कर रहे हैं लेकिन वह भी इसलिए कि परंपरा चली आ रही है वरना अपने आदर्श और प्रेरणास्रोत का इस तरह दहन कर डालना किसी कृतघ्नता से कम नहीं है।

जो लोग रावणी विचारों के हैं अथवा रावण के पदचिह्नों पर चल रहे हैं उन्हंे न रावण दहन का अधिकार है, न कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलोें के दहन का, और न ही इन्हें कोई अधिकार है लंका दहन का।

बिना किसी प्रतिभा या हुनर के दूसरों के धन और वैभव को हड़पने वाले, परायी स्त्रियों पर बुरी नज़र गड़ाने वाले, भ्रष्ट, बेईमान, चोर-उचक्कों, अपनी ड्यूटी ढंग से नहीं करने वाले, साईड़ बिजनैस करने वाले, हरामखोर, राष्ट्रपुरुष का अंगच्छेदन करने वाले, भारतमाता का अपमान करने वाले, व्यभिचारियों, नाकारा, नुगरों, कमीनों, दिन-रात निन्दा करते हुए श्वानों, सूअरों और कीड़ों की तरह पेट भरने वाले, जेब और घर भरने वाले, झूठी प्रशंसा करने वाले, दंभी-अहंकारी, लोभी-लालची, अपने काम साधने के लिए किसी भी सीमा तक गिर जाने और चापलुसी करने वाले, कामी, क्रोधी, मदांध, झूठे वादे और झूठ फैला कर जनमानस को भ्रमित करने और उल्लू बनाने वाले, कमीशनखोर, माँसाहारी, शराबी, अपवित्र और दुनिया के सारे गुणों से भरपूर या आंशिक प्रभाव वाले लोगों को रावण दहन का कोई अधिकार नहीं है।

हम रावण दहन करते हुए और लंका व राक्षसों के पुतले जलाते हैं और पूरी जिन्दगी काम उन्हीं राक्षसों जैसे करते हैं, यह हमारे दोहरे और घृणित चरित्र को ही व्यक्त करता है। इसके साथ ही अपनी बिरादरी के लोगों के पुतलों का दहन करना मित्रद्रोह, विश्वासघात तथा कृतघ्नता की श्रेणी में आता है।

जो लोग विजयादशमी के दिन रावण दहन करते हैं या देखने जाते हैं उन सभी लोगों को राक्षसराज रावण और उसके परिवार के राक्षसों के पुतलों के दहन से पहले गंभीरतापूर्वक इस बात का चिंतन करना चाहिए कि आखिर इन पुतलों के कर्मों और उनके कर्मों में कितना अन्तर रह गया है।

अपने अब तक के समग्र जीवन की तुलना रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद से करें और देखें कि कितनी समानता या असमानता विद्यमान है। सच्चे मन से इस बारे में सोच लिए जाने पर हमें अपने आप सत्य का भान हो जाएगा।

हममें से असंख्यों लोग ऐसे मिल जाएंगे जिन्हें इस तुलनात्मक अध्ययन के बाद लगेगा कि इन राक्षसों के ही कामों को आगे बढ़ा रहे हम लोगों का भी दहन क्यों न कर लिया जाना चाहिए ताकि एक ही बार में दशहरा मनाकर असत्य और बुराई पर सत्य एवं अच्छाई की जीत का डंका बज जाए और हर साल रावण दहन का खर्च भी नहीं करना पड़े। हमारा भी मोक्ष हो जाए और जो लोग बचे हुए हैं वे भी बिना किसी भय के आनंद के साथ जीवन जी सकें।

लंका का दहन देखने और करने से पहले हम यह भी सोचें कि हम जिस घर या बस्ती में रह रहे हैं उसमें और लंका में क्या फर्क है।  उस जमाने की लंका का स्वर्ण दिखता था, आज हमारे घरों में सोना दिखता नहीं है लेकिन होता खूब है और छिपा कर भी रखा जाता है। आज हमारे आस-पास से लेकर दुनिया के कोने-कोने तक भूमाफियों ने जाने कितनी लंकाएँ बना डाली हैं जहाँ खेलने-कूदने से लेकर घूमने-फिरने तक के लिए खाली जमीन नहीं छोड़ी है।

रावण के दहन का अधिकार राम को है, रावणत्व से भरे हुए लोगों को नहीं। रावण दहन के वक्त यदि कोई चमत्कार हो जाए और रावण के पुतले में जान आ जाए तो सबसे पहले वह उसी का गला घोंट दे जो उसका दहन करने आया है।

रावण को भी पतितपावन राम के हाथों मरने की इच्छा थी। हमें खुद को देखना होगा कि हम रावण दहन के लिए पात्र भी हैं या नहीं। रावण दहन का जश्न मनाने वालों को भी तसल्ली से सोचना होगा कि हम जिस बुराई का अंत कर प्रफुल्लित हो रहे हैं उससे सौ गुना बुराइयों को बोझ लेकर तो हम घूम रहे हैं।

विजयादशमी पर्व की सार्थकता इसी में है कि हम बुराइयों का त्याग करें और अच्छाइयों को स्वीकार करने के साथ ही अच्छे लोगों को भी महत्त्व दें। ऐसा कर सकें तो ही रावण का दहन करें और रावण दहन देखने जाएं, वरना अपने समानधर्माओं का दहन करना और देखना कुलद्रोह और कृतघ्नता की श्रेणी में आता है, और इस पाप से भी हम नहीं बच सकते।

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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