दिल्ली में “स्लटवॉक” हुआ पूरे कपड़ों में, “निराश” चैनलों ने लिया विदेशी फूटेज का सहारा

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जब पोज दिया स्लट ड्रेस्ड फिरंगन ने तो टूट पड़ी मीडिया

कभी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने पुलिस का बचाव करते हुए कहा था कि राजधानी की लड़कियों को भड़काऊ कपड़े नहीं पहनने चाहिए। रविवार को हुई स्लट रैली ने शायद शीला को करारा जवाब दिया जब पूरी दुनिया से कदम मिलाने के बावजूद लड़कियों ने शालीन कपड़े ही पहने। सुबह जब सैकड़ों महिलाएं सड़कों पर उतरीं तो उनका मकसद था महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा का विरोध।

किसी भी एंगल से स्लट तो खोजना ही था

 

 

हालांकि स्लटवॉक नाम से दुनिया भर में जारी इस आंदोलन का नाम सारी सुर्खियां ले उड़ा। अंग्रेजी शब्द स्लट को गाली के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. ऐसी स्लटवॉक दुनिया के कई बड़े शहरों में हो चुकी है। इसकी शुरुआत कनाडा के टोरंटो में हुई जब एक पुलिस अफसर ने कहा कि महिलाओं को यौन हिंसा से बचने के लिए स्लट यानी सेक्स वर्करों जैसे कपड़े पहनने से बचना चाहिए।

कैमरामैनों को निराश ही किया ऐसे प्रदर्शनों ने

 

शहर के बीचों-बीच “बेशर्मी मार्च” के नाम से जंतर-मंतर पर यह रैली कड़ी सुरक्षा के बीच हुई। हालांकि दुनिया के बाकी शहरों की तरह यहां की महिलाओं ने रैली के दौरान कम कपड़े नहीं पहने थे। इस आंदोलन में शामिल हुईं एक घरेलू महिला निष्ठा सिंह कहती हैं, “असली दिक्कत समाज की सोच में है। महिलाओं के मामले में वह दोहरे मापदंड अपनाता है। पुरुषों को तो खास तरह के कपड़े पहनने या न पहनने के लिए कभी नहीं कहा जाता.”

हर अनार पर टूट पड़े सैकड़ों बीमार

 

लेकिन मीडिया ने खोज-खोज कर हॉट मैटेरियल ढूंढा और अपने चैनलो व अखबारों के लिए तस्वीरें भेज दीं। जब टीवी चैनलों ने इन्हें भी अपर्याप्त माना तो आखिरकार एजेंसियों से मिली विदेशों की फूटेज दिखाने लगे। यही हाल अखबारों का भी रहा। हालांकि दिल्ली स्लटवाक की आयोजकों ने कुछ विदेशी मेहमानों को भी बुला रखा था,  जिन्होंने फोटो सेशन भी रखा, लेकिन ऐसे मौकों पर कैमरामैन गिद्ध की तरह टूटते नजर आए।

दिल्ली में इस आंदोलन के आयोजकों का कहना है कि महिलाओं के पहनावे को यौन हिंसा का बहाना नहीं बनाया जा सकता. भारत में भी महिलाओं को कपड़ों को लेकर कई बड़े नाम टिप्पणियां करके विवाद खड़ा कर चुके हैं। यहां महिलाओं के साथ छेड़छाड़ अक्सर होती है और कई लोग इसके लिए उनके कपड़ों को जिम्मेदार ठहराते हैं।

फूटेज़ विदेशी. कैप्शन देसी

दिलचस्प बात यह रही कि जब दिल्ली स्लटवाक में कोई “खास मसाला” नहीं मिला तो कई चैनलों ने टोरॉन्टो और लंदन के आयोजनों की फूटेज़ को आधार बना कर पैकेज़ चलाना शुरु कर दिया। खबर भड़काऊ बनाने के चक्कर में चैनलों ने खूब गर्मागरम चित्र दिखाए, लेकिन भारतीय स्लटवाक को बहस का मुद्दा बना दिया।

 

दिल्ली का  प्रदर्शन वैसे तो एक छात्रा उमंग सब्बरवाल के फेसबुक अभियान से शुरु हुआ था, लेकिन कई नामचीन हस्तियों ने भी इसे अपना समर्थन दिया। इस मुहिम में शामिल हुईं ज्यादातर महिलाओं ने टी शर्ट और जींस पहनी थी। काफी महिलाएं पारंपरिक भारतीय लिबास में भी थीं. यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली आर्ची शर्मा कहती हैं, “हम बेवजह कोई ऐसा कपड़ा नहीं पहनना चाहते जिसमें हम सहज महसूस न करें. लेकिन लड़की जो भी पहने, उसके साथ छेड़छाड़ तो होती है।”

उमंग सब्बरवाल

 

आयोजकों के मुताबिक दिल्ली की रैली खासी सफल रही और अब वे जल्दी ही मुंबई में भी स्लटवॉक का आयोजन करेंगी, लेकिन “देसी-हॉट” न मिलने से निराश फोटॉग्राफरों ने तो  यहां तक कह डाला कि जब दिल वालों की दिल्ली में प्रदर्शन इतना “फीका” रहा तो शिवसेना की आमची मुंबई में तो लड़कियां घूंघट निकाल कर आएंगी और तब कौन उनकी तस्वीरें उतारने जाएगा?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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