सोशल मीडिया पर निगहबानी की शुरुआती योजना तैयार..

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इंटरनेट और सोशल मीडिया पर पहरे की शुरुआती योजना तय हो गई है. सरकार ने फैसला किया है कि सोशल नेटवर्क और इंटरनेट पर सूचनाओं व सामग्री का प्रसारण रोकने के लिए वही नियम लागू होंगे जो टीवी और रेडियो के लिए निर्धारित हैं. गृह मंत्रालय सहित तमाम एजेंसियां इन नियमों के आधार पर सोशल मीडिया की निगरानी करेंगी और आपत्तिजनक सामग्री को सार्वजनिक करने पर पाबंदी लगाएंगी.

इंटरनेट पर पाबंदी के तरीकों और नियमों पर सहमति बनने के बाद अब सभी इंटरनेट ऑपरेटरों और सोशल नेटवर्को को हिदायतें जारी करने का निर्देश हो गया है. सरकार एक अंतरमंत्रालयी समन्वय तंत्र भी बनाने जा रही है, जो सोशल मीडिया और इंटरनेट की लगातार निगरानी करेगा.

सोशल मीडिया पर निगरानी को लेकर सरकार की मुहिम खासी तेज है. अगस्त के अंत में प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के स्तर पर सोशल मीडिया की निगरानी और सामग्री को प्रतिबंधित (ब्लॉक) करने का फैसला किया गया था. फेसबुक, ट्विटर समेत तमाम सोशल मीडिया और इंटरनेट पर कंटेंट प्रसारित करने के नियम तय करने के मकसद से केंद्र सरकार ने गृह मंत्रालय की अगुआई में उच्चस्तरीय समिति बनाई थी.

इस समिति का मानना है कि प्रसारण माध्यमों की निगरानी के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय के प्रावधान प्रभावी रूप से लागू हैं और तरह तरह की कानूनी चुनौतियों के बीच सफल साबित हुए हैं. इसलिए सोशल मीडिया पर निगरानी के लिए फिलहाल इन्हीं नियमों, निर्देशों और अधिकारों का इस्तेमाल किया जाएगा. सरकार सोशल मीडिया पर कंटेंट ब्लॉक करने के लिए कानून व्यवस्था बिगड़ने के खतरे को आधार बनाएगी, जिसके लिए सूचना तकनीक कानून की धारा, 69 (ए) में भी पर्याप्त प्रावधान हैं.

हाल में कई इंटरनेट वेबसाइट और सोशल मीडिया नेटवर्क पर विभिन्न तरह के कंटेंट को लेकर सरकार ने आपत्ति जाहिर की थी और गूगल, फेसबुक आदि से जवाब तलब किया था. लेकिन असम हिंसा के दौरान अफवाहें फैलाने के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल के बाद सरकार ने सीधी कार्रवाई का निर्णय किया. इसके तहत एक प्रभावी मॉनीटरिंग सिस्टम, कंटेंट ब्लॉक करने की क्षमता और जरूरी कानूनी इंतजाम किए जाएंगे. सोशल मीडिया व इंटरनेट पर निगरानी की यह मुहिम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की देखरेख में चल रही है. सूचना तकनीक, दूरसंचार व गृह मंत्रालय, इंटेलीजेंस ब्यूरो, एनटीआरओ जैसी खुफिया एजेंसियां और डीआरडीओ तकनीकी एजेंसियां इसका हिस्सा हैं.

जागरण के लिए अंशुमान तिवारी की रिपोर्ट.

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