सियासी रंग में रंगी उमा की गंगा समग्र यात्रा…

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-आशीष वशिष्ठ||

 

लखनऊ. भारतीय जनता पार्टी की तेजतर्रार नेता उमा भारती के नेतृत्व में अवरिल और निर्मल गंगा के पावन उद्देश्य से जारी गंगा समग्र यात्रा सियासी रंग में रंगती जा रही है. गंगासागर में जय मां गंगेके उद्घोष के साथ यात्रा की शुरुआत करने वाली उमा भारती के सुर उत्तर प्रदेश तक पहुंचते पहुंचते सियासी रंग में डूब गए. उमा की यात्रा में भाजपा के प्रदेश स्तर के तमाम बड़े नेता दूरी बनाएं ही हुए हैं. वहीं विपक्षी दल इसे राजनीतिक यात्रा करार दे रहे हैं.

अत्यधिक प्रदूषण का शिकार हो चुकी गंगा की अविरलता और स्वच्छता को बनाने के उद्देश्य से 21 सितंबर को पश्चिम बंगाल के गंगासागर से प्रारंभ होकर झारखण्ड, बिहार के रास्ते गत गंगा समग्र यात्रा उत्तर प्रदेश में प्रवेश कर चुकी है. गंगासागर में उमा भारती ने दक्षिणी 24 परगना जिले में कहा था कि, ‘मैं सभी राजनीतिक दलों और समुदायों के लोगों को इस अभियान में हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित करती हूँ ताकि गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाया जा सके. वह गंगा नदी को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा दिए जाने की भी मांग कर रही हैं.उन्होंने  यह भी कहा था कि यह यात्रा पूरी तरह से एक गैर राजनीतिक कदम है लेकिन उत्तर प्रदेश में प्रवेश करते ही उनके बयान राजनीतिक रंग लेने लगे.

गत 9 अक्टूबर को बलिया जनपद के  उजियारघाट से होते हुए भरौली पहुंची यात्रा का स्वागत भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेई ने किया था. इस अवसर पर उमा भारती ने जल, जंगल और जमीन की बात कही तो अगले ही दिन चुनार, मिर्जापुर में उन्होंने कहा कि जो गंगा की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा.भदोही और कानपुर में तो साध्वीने अपनी जुबान बंद रखी और अपना ध्यान गंगा प्रदूषण और यात्रा के मूल उद्देश्य पर केन्द्रित रखा लेकिन कासगंज तक पहुंचते ही उनको भाजपा का पुराना मंदिर राग याद आ गया. उमा भारती ने कहा कि, किसी भी कीमत पर राम जन्म भूमि स्थान या उस परिसर में बाबर के नाम की किसी मस्जिद को नहीं बनने दिया जायेगा. साध्वी ने कहा कि कुछ लोगों के लिए राम जन्म भूमि आंदोलन राजनैतिक रूप से भले ही असफल हो लेकिन उनकी नजर में वह पूरी तरह सफल आंदोलन है.

उमा भारती ने कहा कि मेरे जीवन में तीन पड़ाव आए. पहला, रामजन्म भूमि आंदोलन, जिसे मैं पूरी तरह सफल मानती हूं. दूसरा, तिरंगा आंदोलन, जिसमें मैंने राष्ट्रीय झण्डें तिरंगे की शान की रक्षा के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोडऩे का फैसला करने में एक मिनट की देर नहीं की. तीसरा, गंगा आंदोलन वह पड़ाव है जहां सभी धर्मों के लोग साथ जुडक़र मेरी हौसला अफजाई कर रहे हैं. उमा ने कहा कि मैंने न तो राम जन्म भूमि और तिरंगे के लिए समझौता किया और न ही गंगा के लिए समझौता करुंगी. जरूरत पड़ी तो अपने प्राण भी दे दूंगी.

उमा की सियासी बयानबाजी से विरोधी दलों खासकर समाजवादी पार्टी ने  सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. वहीं भाजपा के प्रदेश स्तर के नेताओं ने भी इस यात्रा से दूरी बना रखी है. 39 दिनों 2500 किलोमीटर की यह यात्रा गंगासागर से शुरू हुई थी 28 अक्टूबर को यह गंगोत्री के पास खत्म होगी. कभी राम के नाम के साथ चुनाव में उतरना तो कभी गंगा का नाम लेकर. उमा भारती हमेशा ऐसे मुददों को उठाना चाहती है जिससे वह हिन्दुओं का ध्यान अपनी ओर खींच सकें. उनके इसी उहापोह ने भाजपा में उन्हें पीछे धकेल दिया. आज नितिन गडकरी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और नरेन्द्र मोदी उनसे काफी आगे निकल आये हैं. वे कभी एक कदम आगे बढ़ाती हैं तो अगले ही पल दो कदम पीछे खींच लेती हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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