चेहरा :::: सलमान खुर्शीद

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कुमार सौवीर||

कहानी में अब जबर्दस्‍त मोड़ आ गया है. दिलचस्‍प मोड़. सारे दर्शक इस कहानी  को सिर्फ आँखों से ही नहीं, दिल से भी देख-समझ रहे हैं. नायक की जगह खलनायक ने ली ली है और सारे पात्र उसे अब कोस-कूट रहे हैं जिसे लानत-मलानत कहा जाता है.

जी हां, सही समझा आपने. यहां सलमान खुर्शीद के बारे में ही बात हो रही है. कहीं सलमान की टांग खींची जा रही है, तो कहीं अरविंद केजरीवाल की. कहीं सलमान खुर्शीद मीडिया का  पर्दाफाश कर रहे हैं तो कहीं उल्‍टे मीडिया सलमान को टांगने की कोशिश में है. लेकिन कुल मिलाकर तियां-पांचा तो सलमान का ही हो रहा है. पहले आरोपों को बेबुनियाद बताने के बाद, फिर आरोपों की जांच प्रदेश सरकार से कराने की मांग के चलते सलमान अब फिलहाल बैक-‍फुट पर खड़े हैं. बावजूद इसके कि इस मसले में सलमान सीधे तौर पर नहीं, बल्कि उनकी पत्‍नी लुईस शामिल हैं. कुछ भी हो, सरकार के आर्थिक जांच प्रकोष्‍ठ पुलिस ने इस हंगामे के बाद अपनी कार्रवाई शुरू कर दी है.

सलमान खुर्शीद. पहले मुस्लिम और देश के तीसरे राष्‍ट्रपति रहे जाकिर हुसैन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके इस नाती के चलते देश के इस बेमिसाल सच्‍चे नागरिक परिवार की प्रतिष्‍ठा को भ्रष्‍टाचार के बदबूदार कीचड़ का सामना करना पड़ेगा. सोचा तो उनके पिता खुर्शीद आलम खां ने भी नहीं होगा, जो देश के विदेश मंत्री तक रह चुके हैं जो अपने ही घर में उपेक्षित रहते हुए अपने स्‍वर्णिम इतिहास के पन्‍ने उलटते रहते हैं. खुर्शीद सलमान पहली जनवरी-1953 को अलीगढ़ में जन्‍मे, विदेश में पढ़े-पले और शिक्षक बने ट्रिनिटी कालेज ऑफ लॉ में. राजीव गांधी की इलीट-टीम को देश का जिम्‍मा सौंपने के अभियान में खुर्शीद को भारत बुलाया और प्रधानमंत्री कार्यालय में उन्‍हें विशेषाधिकारी बना दिया गया. यह सन 81 की बात है और तब प्रधानमंत्री थी इंदिरा गांधी. खुर्शीद इस दफ्तर में कानून के मसले खोजने के साथ देश-विदेश के मुद्दे पर सलाहें दिया करते थे.

उधर जाकिर हुसैन के देहांत के पहले से ही उनके दामाद खुर्शीद आलम खां ने उनकी फर्रूखाबाद के कायमगंज वाली विरासत देखनी शुरू कर दी थी. खासकर उनकी सादी मगर कई मामलों में बेमिसाल निजी मस्जिद और खानदानी महल को. विदेश मंत्री बनने के बावजूद खुर्शीद आलम कायमगंज में ही कायम रहे. धीरे-धीरे खुर्शीद सलमान ने अपनी नयी दुनिया बनाना शुरू कर दिया तो खुर्शीद आलम खां अलग-थलग होने लगे. कायमगंज की खानदानी इमारतें सलमान खुर्शीद के नये रवैये से हार कर ढह गयीं. सलमान के रवैये से खुर्शीद आलम काफी क्षुब्‍ध थे, लेकिन अब तक खासे बुजुर्ग हो चुके खुर्शीद आलम दिल्‍ली में सलमान के जामिया नगर वाले मकान की डेहरी में जाने पर मजबूर हो गये. यह तो होना ही था, पहले विलायत से पढ़ाई, फिर वहीं पर मास्‍टरी. कायमगंज वाला आधार आखिर कब तक टिकता. जो बचा था, वह भी पीएमओ में ओएसडी से होते हुए उनकी उपेक्षाजनक व्‍यस्‍तता के चलते ढह गया. कायमगंज में अब जाकिर हुसैन और खुर्शीद आलम खां की यादें ही बची हैं. और कुछ बचा है तो केवल हर चुनाव में सलमान खुर्शीद का अस्‍थाई डेरा.

नये दौर के सलमान की दुनिया में पुराना दौर, पुराना दीन और पुराना धर्म अस्तित्‍व खत्‍म हो चुका था. और उसके बजाय इसमें आ चुका था बिरतानिया कल्‍चर, जहां दिन-रात होती हैं गपशप, पार्टियां और भौतिकवादी-आधुनिकता. जहां होती है केवल आभिजात्‍यता, और जहां तक पहुंचने की शर्त होती है सम्‍पन्‍नता. जहां होते हैं अमीर और दौलत के बल पर बौद्धिकता का शगल पूरा करने वाले लोग. आम आदमी की तो न वहां पहुंच होती है और न ही कोई स्‍थान. कांग्रेस के एक वरिष्‍ठ पदाधिकारी बताते हैं कि राजीव-चौकड़ी में शामिल लोगों में केवल राजीव गांधी ही अकेले शख्‍स थे जो आम आदमी तक पहुंचने की ख्‍वाहिश रखते थे. इतना ही नहीं, राजनीति में आने के बावजूद हालांकि यदा-कदा वकालत करते रहते रहे हैं, लेकिन वह भी सुप्रीम कोर्ट तक में ही. वकालत में भी उनकी वकालत केवल महमूदाबाद के राजा की सम्‍पत्ति वापस दिलाने तक ही सीमित रही जो देश के बंटवारे के वक्‍त पाकिस्‍तान चले गये थे और जिनकी यहां बची सम्‍पत्ति को देश ने शत्रु-सम्‍पत्ति के तौर पर कानूनन जब्‍त कर ली थी. इसके सलमान खुर्शीद अलावा सिमी और मुख्‍तार अंसारी जैसे लोगों के मुकदमे ही लड़े. हाईप्रोफाइल. यह दीगर बात है कि ऐसे ज्‍यादातर मुकदमों में सलमान खुर्शीद की खूब फजीहत हुई. दिल्‍ली में कांग्रेस के एक नेता बताते हैं कि खुर्शीद केवल कारपोरेट वकील ही रहे. अवाम या उनके किसी मसले से कोई लेनादेना उनका कभी नहीं रहा. आवाम के प्रति उनकी उपेक्षा की एक नजीर देखिये. सन -09 के फर्रूखाबाद लोकसभा चुनाव में खुर्शीद के कड़े विरोध में थी बसपा. माहौल चक्‍कर डालने में काफी था. उस दौरान वहां जिन लोगों से भी मैंने बातचीत की, उनका कहना था कि सलमान नेता नहीं, मौसमी शिकार हैं. लेकिन हमारी मजबूरी है बसपा के खिलाफ रहना. एक बातचीत में खुर्शीद ने ऐसी शिकायतों पर प्रतिवाद किया था कि मैं लोकसभा के जरिये देश चलाना चाहता हूं, लेखपाल-दारोगा का झंझट निबटाना नहीं.

सलमान खुर्शीद ने अपनी इसी मंडली के बूते ओएसडी के बाद पहले उपमंत्री, राज्‍य मंत्री और आखिरकार कैबिनेट सीट हासिल की. लेकिन कभी-कभार गांधी-टोपी पहन लेने वाले खुर्शीद ने शायद ही कभी ट्रेन से सफर किया. वाराणसी के एक वरिष्‍ठ पदाधिकारी बताते हैं कि कभी मजबूरी में अगर कभी पूर्वांचल का दौरा भी किया, तो शाम तक वे यहां ताज होटल के आलीशान कमरे में ही वापस लौट आते थे. अपने ग्रुप की अम्बिका सोनी, दिग्विजय सिंह और जयराम रमेश जैसे बड़े नेताओं की ही तरह खुर्शीद की जुबान जब भी हिली, बवंडर ही मचा. आपको खूब याद होगा फरवरी-12 का विधानसभा चुनाव जब उनकी पत्‍नी लुईस चुनाव लड़ी थीं. दिग्विजय की जुबान की ही तरह खुर्शीद ने धर्म के आधार पर आरक्षण की मांग कर दी. यह जानते हुए भी कि खुर्शीद वास्‍तव में कानून-चीं हैं और यह जानते हुए भी संविधान के तहत भाषा, धर्म और संस्‍‍कृति के आधार पर यह मांग कर दी. बवाल हो गया इस बयान पर. चुनाव ने इस पर ऐतराज किया और कांग्रेस ने भी उन्‍हें जम कर टोका. मगर तब हंगामा हो गया जब खुर्शीद ने पलटवार किया कि बेहतर होगा कि इस बात पर मुझे फांसी पर लटका दिया जाए.

एक और वाकया देखिये. यह समय था खुर्शीद को कांग्रेस की बागडोर दूसरी बार सौंपे जाने का. यूपी में कांग्रेस की बर्बादी पर चिंता पर बात करते हुए एक उच्‍चस्‍तरीय बैठक पर एक बड़े नेता ने चुटकी ली, कि हमारे पास चमत्‍कारिक नेताओं की कमी है. बेहतर है कि खुर्शीद किसी जनांदोलन के दौरान कुछ दिन जेल चले जाएं तो कांग्रेस खड़ी हो सकती है. कहने की जरूरत नहीं, कि इस बैठक के बाद केवल हंसी-ठिठोली ही होती रहे. लब्‍बोलुआब यह कि अपने दो बार के कार्यकाल में खुर्शीद ने किसी भी आंदोलन की पहलकदमी नहीं की. हां, पार्टी में भितरघात और साजिशों की फसल खूब लहलहाई.

वैसे यह दुर्भाग्‍य ही तो है कि कानून मंत्री बने अधिकांश नेता लगातार विवादों से ही घिरे रहे हैं. भले वह स्‍वामी सुब्रहमण्‍यम हों, या हंसराज भारद्वाज अथवा राम जेठमलानी. इन लोगों ने अपने कृत्‍यों-बयानों से केवल सरकार ही नहीं, देश भर को हिलाने में कसर नहीं छोड़ी. लेकिन यह पहला मौका है जब कोई कानून मंत्री भ्रष्‍टाचार के फंदे में फंसा है. लंदन से लौट कर उन्‍होंने दिल्‍ली में जो प्रेस कांफ्रेस बुलायी, वह ऐतिहासिक हंगामी थी. उस वक्‍त पत्रकारों के रवैये पर सवाल तो उठाये जा सकते हैं, लेकिन यह भी सच ही है कि खुर्शीद ने आपा खोने की सारे हदें पार कर ली थीं. वह भी तब, जब कि उनसे कैफियत मांगी जा रही थी कि इस घोटाले में अफसरों के हलफनामा जैसे गंभीर आरोप हैं. खुर्शीद ने यह तो कह दिया कि ऐसे कैम्‍प 17 नहीं, बल्कि 34 आयोजित किए गये थे, लेकिन ऐसे कैम्‍पों की तारीख पर उनकी घिग्‍घी बंध गयी.

पिछले दस बरसों के बीच केंद्र सरकार के सभी बड़े मंत्री किसी न किसी घोटाले में लिप्‍त दिख रहे हैं. तो ऐसे में सवाल यह नहीं कि जाकिर हुसैन ट्रस्‍ट की कर्ताधर्ता लुईस पर करीब 72 लाख रूपयों के घोटाले का आरोप है. सामान्‍य तौर पर ऐसे आयोजनों में इस बात की बाकायदा गुंजाइश बनी ही रहती है कि 10-20 फीसदी लक्ष्‍य पूरा न कर पाये. लेकिन सवाल तो यह है कि आखिर क्‍या वजह है कि इस खुर्शीद इस समय सरकार में अलग-थलग और अकेले पड़ गये हैं. सवाल तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट तक में तर्क-वितर्क के आधार पर दूध-पानी अलग करने का दम भरने वाले कानून-दां खुर्शीद के पास आम आदमी के सवालों का जवाब क्‍यों नहीं बचा है. कुछ भी हो, विकलांगों को राहत दिलाने के लिए आयोजित ऐसे कैम्‍पों के चलते समाज को भले ही लाभ न मिला हो, लेकिन ताजा घटनाक्रमों के चलते सरकार की तो विकलांगता सतह पर उभरने ही लगी है.

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