वोह है खास और हम हैं आम यानि मैंगो…

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थ्री इडियट्स का वह घटिया सा मगर सदी का का सबसे ज्यादा प्रसिद्ध संवाद “तोहफा कबूल करो हूजूर” फिर से ज़ेहन में ताज़ा करवा दिया इस देश के सबसे शक्तिशाली परिवार के दामाद ने. हम तो आम हैं. जो ख़ास चाहे चूस के चले जाये. मगर एक मौजूं सवाल भी खड़ा है साथ में कि हमें इस हाल तक पहुँचाया किसने? कौन है वोह जो जिम्मेदार है इसका?? कोई तो होगा ही न???

-आशीष वशिष्ठ||

यूपीए की चेयरपर्सन एवं कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा ने मैंगो पीपल इन बनाना रिपब्लिक  लिखकर विवाद को जन्म दिया है, जिसका चहु तरफा विरोध और आलोचना हो रही है. अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से तिलमिलाएं रॉबर्ट ने फेसबुक पर जानेअनजाने सामंतवादी सोच को ही उकेरा है. रॉबर्ट के कॉमेंट ने देश की जनता को सोचने को विवश किया है कि क्या सत्ताधारियों, उनकी संतानों और रिशतेदारों की दृष्टिï में आम आदमी का कोई मानसम्मान है भी या नहीं?

बनाना रिपब्लिक लेटिन अमेरिका के उन देशों को कहा जाता है जहां भ्रष्टाचार, माफियाराज और रजानीतिक व्यवस्था हावी रहती है. अहम् प्रश्न यह है कि आखिरकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को बनाना रिपब्लिक बनाया किसने? रॉबर्ट वाड्रा के मैंगो पीपल ने या देश के नेताओं और उनके रिश्तेदारों ने? अगर जनता ने बनाना रिपब्लिक बनाया है तो रॉबर्ट की स्पष्टवादिता के लिए उनका सावर्जनिक अभिनंदन होना चाहिए? लेकिन देश की जनता जिन विषम स्थितियों में जीवन बसर कर रही है उसे देखसुनकर किसी भी संवदेनशील व्यक्ति आंसू निकल आएंगे. राबर्ट वाड्रा की टिप्पणी जबरा मारै, रोवै दे की कहावत चरितार्थ करती है.

सार्वजनिक जीवन में, मीडिया के समक्ष और  जनता के मध्य चिकनीचुपड़ी और हमदर्दी भरी बातें करने वाले हमारे नेता, मंत्री, अफसर और तथाकथित बड़े और रसूखदार वास्तविक जीवन में कितने क्रूर, निर्दयी और कलुष मन के स्वामी हैं, ये विभिन्न अवसरों पर प्रदर्शित हो चुका है. सत्ता के मद में चूर तथाकथित बड़े और प्रभावशाली लोग आम आदमी को निजी स्वार्थ और लाभ के लिए प्रयोग करते हैं और मतलब निकल जाने पर उसे निचुड़े हुए नींबू के छिलके की भांति फेंक देते हैं. देश की जनता और विकास का पैसा डकारने वाले कॉरपोरेट घरानों के सच्चे हमदर्द और दोस्त रॉबर्ट वाड्रा ने अपने ऊपर लगे भ्रष्टïाचार के  आरोपों का कायदे से उत्तर देने की बजाए फेसबुक पर अपनी कड़वाहट, क्रोध और भड़ास निकालकर यह जताने की कोशिश की है कि आम आदमी की क्या हिम्मत की वो उनके खिलाफ जुबान खोले और उंगली उठाने की हिमाकत करे.

स्वतंत्रता सेनानियों, देशभक्तों और नेताओं ने भारत की स्वतंत्रता का स्वपन और उसके लिए सर्वस्व न्यौछावर इस आशा और उम्मीद के साथ किया था कि जब सत्ता अपने हाथों में होगी तो देश की जनता स्वतंत्र वातावरण में सांस लेगी और अपनी इच्छानुसार देश का निर्माण और विकास होगा. लेकिन वोट बैंक, तुष्टिïकरण और जातपात की ओछी राजनीति ने स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों को मसलने में कोई कसर नहीं छोड़ी. राष्ट्र निर्माण, विकास और देश के आम आदमी के कल्याण और उत्थान के लिए खर्च होने वाला रुपया भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों और सत्ता के दलालों की तिजोरियों में जाने लगा. किसी जमाने में देशप्रेम में सर्वस्व न्यौछावर करने वाले नेता वर्तमान में सत्ता प्राप्ति के लिए नीच से नीच कर्म करने में संकोच नहीं करते हैं. विधायिका ने भ्रष्टाचार का जो गंदा बीज बोया था, कालांतर में उसे कार्यपालिका और न्यायापालिका ने पालापोसा. आज भ्रष्टाचार  देश की अर्थव्यवस्था सार्वजनिक जीवन की रगों में गंदे रक्त की तरह तेजी से दौड़ रहा है. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् शुरू हुआ घपलों, घोटालों का क्रम वर्तमान में भी अनवरत जारी है. 

लोगों की तीखी नाराजगी पर झल्लाते हुए वाड्रा ने फेसबुक अकाउंट ही बंद करने की घोषणा कर दी. उन्होंने कहा कि मेरी फ्रेंड लिस्ट में ऐसे लोग भी शामिल हो गए हैं जो मजाक तक नहीं समझते. उन्होंने यह भी लिखा कि बाद में जब वह फेसबुक पर लौटेंगे तो उनकी फ्रेंडस लिस्ट में सिर्फ समझदार लोग होंगे. राबर्ट का ससुराल पिछले 65 वर्षों से देश की जनता के साथ जो क्रूर मजाक कर रहा है, उसे देश की जनता अब बखूबी समझने लगी है. वहीं राबर्ट की समझदारी की परिभाषा भी समझ से परे है. असल में नेताओं और उनके रिशतेदारों को भलीभांति यह मालूम है कि देश की जनता भोली और इमोशनल है, दोचार दिन चिल्लाएगी उसके बाद खुद खुद शांत होकर बैठ जाएगी. चुनाव के समय वादों और घोषणाओं का पिटारा खोलकर या फिर दलित, गरीब या किसानों के साथ हमदर्दी दिखाकर वो जनता का वोट पाने और उसे गुमराह करने में कामयाब हो ही जाएंगे. सत्ता पर काबिज महानुभावों को यह भी पता है कि जब समस्त शक्तियां और अधिकार हमारे पास हैं तो जनता की नाराजगी या गुस्से से क्या डरना. राबर्ट भी समान मानसिकता के स्वामी हैं इसलिए तो अपने ऊपर आरोप का कीचड़ उछलने के बाद उन्होंने सफाई देने या अपना पक्ष रखने की बजाय दूसरे की समझदारी को ओछा बताने और मजाक करने से बाज नहीं आए.

राबर्ट कोई अपवाद भी नहीं है. कमोबेश हर नेता, मंत्री और शक्ति संपन्न व्यक्ति, उसके रिशतेदारों और चम्मचों की मानसिकता राबर्ट वाड्रा के समान है. राबर्ट जैसे तमाम उदाहरण हमारे आसपास बिखरे पड़े हैं. बड़े बाप की तथाकथित संतानों का मिजाज और दिमाग किस हद तक खराब है कि खबरें आए दिन मीडिया में छाई रहती हैं. लेकिन जब ये मालूम हो कि सजा देने वाला हाथ जोड़े घर की चौखट पर पहरा दे रहा हो या फिर दिनरात सैल्यूट मारता हो, जिस देश में कानून की देवी बिकाऊ हो और सगेसंबंधी और रिशतेदार शक्तिसंपन्न पद पर बैठे हो तो फिर डरने या घबराने की कोई जरूर ही नहीं है. तथाकथित बड़े घरों के सिरफिरी संतानों और रिशतेदारों के लिए पूरा देश उनकी जागीर है और मैंगो मैन से मनमाना व्यवहार और बर्ताव करने के लिए वो स्वतंत्र और स्वच्छंद है.

जिस देश में स्वतंत्रता के 65 वर्षों उपरांत भी जनता भुखमरी, अशिक्षा, बाल वेश्यावृृत्ति, बेरोजगारी, बालश्रम, कुपोषण, बालविवाह और भिक्षावृत्ति के जाल में जकड़ी हो, जहां एक वक्त का खाना जुटाना सबसे बड़ी उपलब्धि हो, जिस देश में 65 फीसदी जनता वहां देश को बनाना रिपब्लिक कौन बनाएगा ये सहजता से समझ आता है. आंकठ तक भ्रष्टाचार में डूबी विधायिका, कार्यपालिका, न्यायापालिका, सत्ता और शक्तिसंपन्न महानुभावों और उनके सिरफिरे, तुनकमिजाजभ्रष्ट रिशतेदारों ने ही स्वस्थ, समृद्घ और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और साधनोंसंसाधनों से भरपूर राष्टï्र को बनाना रिपब्लिक बनाया है, ये बात साफ हो चुकी है. असल में आम आदमी का मुंह खोलना और सवालजवाब सत्ता पचा नहीं पा रही है और अपनी स्थिति स्पष्ट करने की बजाए हमलावार मुद्रा धारण किये है. लेकिन राबर्ट और सत्ता के नशे मे चूर तमाम लोगों को हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जनता जब करवट लेती है बड़ेबड़ों के होश ठिकाने लगा देती है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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