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चौदह साला मलाला मात दे रही है तालिबानी सोच को…

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-अंकित मुटरिजा||

मलाला, अपने आप में एक बुलंद आवाज ही नहीं बल्कि प्रतीक बन गयी है उन आम लोगों की,  जो बताती हैं कि कट्टरपंथी चरमपंथी सोच, विचार, मुल्क को पतन की ओर नही लें जा सकते, उन्हें इसकी इजाजत नही दी जा सकती हैं! हमें चाहिए तो सिर्फ शांति और एक ऐसी आवाम जो शिक्षित हो!! मलाला महज 14 वर्षिय बच्ची हैं..

मलाला ने वो कर दिखाया जो इस उम्र के बच्चे अधिकांशतया सोचते तक नही हैं. हमें मलाला से सीखना चाहिए कि उम्र हमारे हौसलों और जज्बों को हमारी मंजिल तक नही पहुंचाती. पहुंचाता हैं तो वो हैं हमारा अटूट संकल्प, जो किसी भी बहाव में टूटता नही. मलाला जानती हैं शुरूआत से ही कि वो जिस स्वात घाटी में शिक्षा या महिलाओं की आज़ादी की बात कर रही हैं, जिस तालिबान से वो टकरा रही हैं वो उसे नुक्सान पहुंचा सकता हैं. लेकिन उसने एक इंटरव्यू में कहा कि उसे इस बात का खौफ़ नही. और देखिए, मलाला की दोस्त भी कितनी बहादुर निकली कि जब कुछ तालिबानी स्कूल बस में घुस कर पूछते हैं कि मलाला कौन हैं ? तब भी वे लड़किया बूंदूक की नोक से डरती नही, चुप रहती हैं, नही बताती उन्हें. पाकिस्तान भर में किस कदर अमेरिकी कूटनीति के तहत तालिबान ने अपने पैर पसारे इस बात से सब परिचित हैं.

देखने वाली खास बात यह हैं  कि एक बच्ची के डटे रहने से लोग सड़को पर निकल कर मलाला पर हुये इस काय़र हमले का विरोध कर रहें हैं. बरसों की जलालत जो उन पर तालिबानों द्वारा थोपी जाती रहीं उसके खिलाफ़ बुलंद आवाज उठा रहें हैं. देखना होगा कि यह बदलाव क्या पाक के भविष्य के लिए एक मिसाल बनेगा. पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ के अध्यक्ष इमरान खान ने इस हमले की निंदा तो की पर खुल कर तालिबान का नाम तक ना लें सके, इस से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह लोग कितने ख़तरनाक हैं जिन्हें एक बच्ची ने हिला कर रख दिया. मलाला का हथियार उसकी कलम बना, उसकी आवाज बनी, उसके वो साथी बने जो हर पल उसके साथ हैं.

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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