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2 अक्टूबर को कौन पैदा हुआ था, इसे बता पाना मुश्किल है लेकिन 11 अक्टूबर को कौन पैदा हुआ था बताना बड़ा आसान है। ऐसा क्यों…..? यह सब मीडिया/प्रचार माध्यमों का कमाल है। 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी (बापू) और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी पैदा हुए थे, और 11 अक्टूबर को बिग बी यानि अमिताभ बच्चन। नेता बड़ा होता है या अभिनेता यह प्रश्न ठीक उसी तरह हैं जैसा कि राम बड़े या परशुराम? उत्तर भी सीधा सा है नेता में कुल 2 अक्षर लेकिन अभिनेता में चार अक्षर (मात्राओं को छोड़कर) होता है इसलिए अभिनेता ही बड़ा होगा।
बड़ा यानि बिग। आजकल बिग बी को बच्चा-बच्चा जानता है और बापू या शास्त्री को जानने में दिक्कतें हैं। बिग बी मीडिया के हर अंक में कहीं न कहीं दिख जाएँगे, लेकिन बापू/शास्त्री इतिहास की पुस्तकों में ही मिलेंगे। बापू और शास्त्री जी का जन्म दिवस यानि (जयन्ती) विद्यालयों और सरकारी महकमों में मनाए जाने की परम्परा है, लेकिन अब धीरे-धीरे करके राजनीतिक परिवर्तन के फलस्वरूप् समाप्त प्राय है।

एक जनप्रतिनिधि और प्रतिष्ठित पद पर विराजमान नेता से जब गाँधी/शास्त्री जयन्ती के बारे में पूछा गया तो उनका उत्तर था अब यह सब शो-शो होकर रह गया है। बड़ा आश्चर्य हुआ। वहीं दूसरी तरफ बिग बी का जमोत्सव उनके फैन्स क्लब, सिने प्रेमियों तथा मीडिया के लोगों द्वारा व्यापक रूप से मनाया जाता है। यहाँ फिर मीडिया के रोल की बात आ ही गई, अब जाने भी दीजिए कौन बड़ा होता है महापुरूष या महानायक (मेगा स्टार/सुपर स्टार)? मेगा स्टार कहलाने वाले बिग बी को हर कोई जानता है। ये किसके पुत्र हैं यह बता पाना कठिन हो सकता है, लेकिन बिग बी के पुत्र जूनियर बच्चन यानि अभिनेता अभिषेक बच्चन, उनकी पुत्र वधू पूर्व मॉडल एवं विश्व सुन्दरी, बॉलीवुड की स्टार नायिका ऐश्वर्या राय, तथा नन्हीं बच्ची आराध्या (बिग बी की पौत्री) को हर कोई जानता है। मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि वर्तमान युग में मीडिया की भूमिका ऐसी है कि ताड़ को तिल और तिल को ताड़ बना दें। कभीं भी, कहीं भी इनके द्वारा कुछ भी किया जा सकता है। एक वरिष्ठ जानकार ने कहा कि पैसे वालों के हाथों मीडिया परसन्स खेल रहे हैं। तभीं ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं।
बड़ा आश्चर्य होता है कि अभिनय सम्राट दिलीप कुमार, राजकपूर, देवआनन्द जैसे बालीवुड सितारों का उल्लेख पहले और आज भी बहुत कम ही होता रहा है। पुराने एवं बड़े अभिनेताओं ने कभीं भी साबुन, तेल आदि सौन्दर्य प्रसाधनों का प्रचार क्यों नहीं किया? मल्टीनेशनल कम्पनियों के ब्राण्ड अम्बेस्डर क्यों नहीं बनें….? क्या इन्हें पैसों की आवश्यकता नहीं थी या फिर इनका रूतबा ही कुछ अलग था। पैसों के लिए अपना स्तर नहीं गिराया, या फिर अभिनय के अलावा अन्य प्रचार जैसे व्यवसाय की तरफ ध्यान हीं नहीं दिया।
बहरहाल कुछ भी हो सारा खेल मीडिया का ही है वरना वैसा कुछ भी न होता जैसा ऊपर लिखा जा चुका है। मीडिया के पॉजिटिव और निगेटिव पहलू का महत्व ही कुछ और है। ऐसा नहीं है कि मीडिया तिल का ताड़ और ताड़ का तिल ही बनाता है। दोनों काम बखूबी करने वाले मीडिया की प्रशन्सा भी होती है। पैसा किसको नहीं चाहिए ‘मीडिया’ को भी धन की दरकार होती है और वह तभी मिलता है ज बवह अपने ब्रम्हास्त्र ‘तिल-ताड़’ को इस्तेमाल करता है। बिग बी के मामले में भी मीडिया ने ऐसा करके लाखों कमाए होंगे और इसमें कोई दो राय नहीं। अब यह मत कहिएगा कि पाठक को जो चाहिए वहीं मीडिया परोस रही है। काश! बापू और शास्त्री जी के जमाने में भी मीडिया आधुनिक होता तो पल-पल की खबरों से हर आम-खास को रूबरू कराता। यदि रहा भी तो इन दोनों शख्शियतों ने पैसा नहीं खर्च किया होगा जैसा कि अब बिग बी ने किया और कर रहे हैं।
27-28 वर्ष पहले एक खबर में पढ़ा था कि ‘कुली’ फिल्म में पुनीत इस्सर (खलनायक) के साथ मारपीट के शॉट में चोट लगने पर अमिताभ बच्चन की सलामती के लिए इनके फैन्स ने रक्तदान किया था, पूजालयों में पूजा-अर्चना किया था। बीच कैण्डी अस्पताल मुम्बई के पास इनके चाहने वालों की भीड़ एकत्र रहती थी। उस समय लाखों रूपए इलाज में खर्च हुए थे। अमिताभ उसके बाद अमेरिका गए वहाँ भी इलाज हुआ वह ठीक हो गए। यहाँ बता दें कि पुनीत इस्सर के एक जबरदस्त घूसे से वह यानि बिग बी एक मेज पर गिर गए थे शॉट तो ओ. के. हो गया था, लेकिन उनकी आँत में घातक चोट लग गई थी। उसी समय एक समाचार पढ़ा था कि अमेरिका में एक कम्पनी ने सिगरेट के प्रचार के लिए अमिताभ बच्चन को ऑफर दिया। घोड़े पर बैठकर उन्हें सिगरेट पीता हुआ दिखाया जाना था, वह सीन मात्र दो मिनट का था। कम्पनी से बिग बी ने पैसों की डिमाण्ड किया तो इण्डिया से लेकर अमेरिका तक उनके इलाज में आया खर्च कम्पनी ने देकर उनसे वह विज्ञापन करवाया, तो ऐसे हैं बिग बी।
अब रही बात देश के महापुरूषों की जैसे राष्ट्रपिता बापू और पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री की तो इन्होंने पराधीन देश को आजाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाने के साथ ही भारत को एक समृद्धशाली देश बनाने का सपना संजोया था, अपनी जेबें नहीं भरीं थीं। ये महापुरूष थें, इन्हें अवतारी कहा जाएगा। रही बात बिग बी की तो ये बॉलीवुड के महानायक कहलाते हैं। अन्तर महापुरूष और महानायक में होता है और यह हमेशा रहेगा। त्यागी महापुरूषों के महाप्रयाण उपरान्त उनके नाम के पश्चात् नारों में अमर रहें कहा जाता है, लेकिन अभिनेताओं, फिल्मी एक्टर्स को यह नसीब नहीं होता।
अब कुछ भी कहा जाए वह सब बेमानी ही होगा, क्योंकि मीडिया का रोल पॉजिटिव/निगेटिव दोनों ही गजब का होता है। लोकतन्त्र है, भीड़ तन्त्र भी कह लीजिए हम कहते हैं कि अपना बिग बी अब बिग बी-70 हो गया। औपचारिक रूप से ही सही लेकिन यह तो कहना ही पड़ेगा कि तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हो पचास हजार।

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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