सोनिया, गैंगरेप और सच्चाखेड़ा का सच

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एक बात नोट की किसी ने?…सामूहिक बलात्कार के बाद जल मरी उस बच्ची के घर पे सोनिया गाँधी बल्कि मुख्यमंत्री के भी पंहुचने से पहले कौन था. कौन सा कांग्रेसी लीडर?…बी.के. हरिप्रसाद. पता है कौन हैं वो?…हरियाणा में कांग्रेस के प्रभारी. और आप पता लगा के देख लीजिये सोनिया गाँधी के इस दौरे को इतना बड़ा इवेंट बनाने का काम भी राज्य के सूचना तंत्र ने नहीं खुद कांग्रेस हाईकमान ने किया था. बात सिर्फ मरहम की नहीं है. मरहम ही लगाना एक मकसद हो तो नेता, सरकारें और दल वो दो चार अफसरों को टांग और दो चार लाख रूपये का ऐलान कर के भी लगा लेते रहे हैं.

राज्य में कांग्रेस की सरकार हो, रेप पे रेप हो तो पार्टी की पीड़ा स्वाभाविक है. लेकिन पूरे राज्य में इन वारदातों के बहाने दलितों में असुरक्षा का माहौल हो तो फिर सोनिया गाँधी की चिंता ये भी है कि सूबे में पोलराइज़ेशन कैसे हो रहा है. खासकर तब कि जब राज्य का मुख्यमंत्री जाट है, डीजीपी जाट है और मुख्य सचिव भी जाट है. जिस राज्य में दलित गांवों से निकल कर शहरों में जिला मुख्यालयों पे आ के रहने, खाने, सोने को विवश हो जाएं वहां सोनिया गाँधी का अपने मुख्यमंत्री को बताना बनता ही है कि प्रदेश में सरकार तुम्हारी नहीं, कांग्रेस की है. सोनिया गाँधी भूपेंद्र सिंह हुड्डा को यही बताने आईं थीं. सच्चाखेड़ा का सारा शो इसी लिए खुद कांग्रेस और उस में भी बीके हरिप्रसाद का था.

अब इन बीके हरिप्रसाद की विवशता समझ लीजिये. हाईकमान की तरफ से हरियाणा के प्रभारी हैं और प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ उन का छत्तीस का आंकड़ा है. देखने और गिनने की बात ये नहीं है कि पिछले कोई पांच बरस में पार्टी के मुख्यमंत्री की मौजूदगी वाले कितने राज्यस्तरीय कार्यक्रमों में वे शामिल हुए हैं, बल्कि ये है कि कितनों में नहीं हुए हैं. मुख्यमंत्री के साथ शायद ही वे कोई मंच सांझा करते हैं.

अब ये तो कोई राजनीति की बहुत मोटी जानकारी वाला भी मानेगा ही कि खुद सोनिया गाँधी के ऐसे किसी क्राइम स्पाट पे चले आने से हुड्डा सरकार की बदनामी हुई है. अब कहने को भले ही आप इस को एक मानवतापूर्ण आगमन कह लें, लेकिन कांग्रेस ने इसे एक गंभीर घटना तो माना ही है न. घटना को तूल मिल सकने के जोखिम पर भी सोनिया गाँधी आईं तो इस का साफ़ अर्थ है कि पार्टी हुड्डा को कुछ समझाना चाहती है. और इसे और खुलासे से समझना हो तो फिर केंद्र के पी.एल.पूनिया जैसे उन विभिन्न आयोगों के अगुवाओं के बयानों से भी समझ लीजिये जिन में लगातार ‘राज्य की बढ़ती खराब स्थिति’ पर चिंता जताई जा रही है. राज्य में अपनी ही पार्टी की सरकार हो तो कोई नेता बोलता है कभी?..यहां क्यों बोल रहे हैं….इस लिए कि सब को पता है सोनिया जी अब यही चाहती हैं. अंदर का सच ये है कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा सोनिया गाँधी की सद-इच्छा से मुख्यमंत्री नहीं बने थे.

बहुतों को मेरी ये बात शायद अटपटी लगे. आसानी से विशवास नहीं होता न कि कांग्रेस में सोनिया गांधी की मर्ज़ी के बिना कोई मुख्यमंत्री कैसे हो सकता है. अरे भई, जिन नटवर सिंह के साले अमरेंदर सिंह को हटाया आपने वही पराजय और पूरी पंजाब में कांग्रेस में उन के खिलाफ लगभग विद्रोह के बावजूद प्रदेश अध्यक्ष कैसे हैं? जिन वीरभद्र सिंह को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा लेकर रुखसत किया आपने वो आप ही के लगाए ठाकुर कौल सिंह और फिर गंगू राम मुसाफिर को ठिकाने लगा कर हिमाचल कांग्रेस के अध्यक्ष और चुनावों के सर्वेसर्वा कैसे हैं? उत्तराखंड में विजय बहुगुणा भी हैं उतने हंगामे के बावजूद तो इस लिए कि अभी भी जैसे भी हैं नारायण दत्त तिवारी आप उनके खिलाफ जा पाने स्थिति में नहीं हो उत्तराखंड में. कांग्रेस के माई बाप तो सोनिया गाँधी के बिना भी हुए हैं और होंगे लेकिन भाजपा को सत्ता तक लाने वाले सिर्फ एक हुए, अटलबिहारी वाजपेयी. ‘कलंक’ जैसा शब्द इस्तेमाल करने के बावजूद नरेंद्र मोदी का कुछ बिगाड़ तो वे भी नहीं पाए थे और न आज नितिन गडकरी के ही बस का है वो. नरेंद्र मोदी गुजरात में क्या किसी भाजपा या संघ की की भी मेहरबानी से हैं?..या येदुरप्पा कर्नाटक में?

दबाव कई बार जाति और समुदाय के भी होते हैं. वे जो होते ही हैं और वे भी जिन्हें बस ओढ़ लिया जाता है. कांग्रेस के बाहर बहुत कम लोगों को पता है कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा कम से इस दूसरी बार तो मुख्यमंत्री कांग्रेस को धमका के बने थे. वरना बीके हरिप्रसाद की क्या बिसात कि प्रदेश में मुख्यमंत्री के समानांतर अपनी भी एक व्यवस्था चला सकें? वो चलती है क्योंकि वो उन से चलवाई जाती है. आज भी सच्चाखेड़ा वे ही ले के आये सोनिया गांधी को. उन्हीं के ज़रिये समझाना चाह रही है कांग्रेस हुड्डा को कि बस चौधरी साहब बहुत हो गया.

याद है किसी को अब कि विधानसभा के चुनाव कराने अर्धसैनिक बलों के दस्ते आये थे 2010 के हरियाणा विधानसभा चुनावों में. हो भी तो ये पता नहीं होगा आप को कि चुनाव और उनकी कोई ज़रूरत भी ख़त्म हो जाने बाद जब वे लौट रहे थे वापिस दिल्ली की ओर, तो उन्हें रास्ते में ही रोहतक रोक दिया गया था. दो दिन तक वे रोहतक में डेरा डाल के पड़े रहे थे. ये वो दिन थे जब दिल्ली में कांग्रेस नब्बे में से कुल चालीस सीटें आई होने की जिम्मेवारी तय करते हुए हरियाणा में अपने अगले मुख्यमंत्री का फैसला करने में जुटी थी. ये सब चलते ये खबर चूंकि टीवी पे खूब चली थी तो शायद याद हो आप को कि ‘राज्य की कमान एक दलित को देने’ की खातिर हाईकमान ने राज्य की एक सांसद शैलजा को बुलाया और बातचीत की.

ये एक गंभीर मूव था. ज़मीनी सच ये है कि आंकड़ों की द्रष्टि से जाट तो एक चौथाई भी नहीं हैं हरियाणा की कुल आबादी में और दलित, कांग्रेस का आकलन था कि, सरक लिए हैं कांग्रेस से. उन्हें न सिर्फ हरियाणा में, बल्कि इस के असर से, दूसरे राज्यों में भी पा लेने मकसद से शैलजा को राज्य की कमान देने पे पूरी गंभीरता से विचार किया गया. बल्कि राज्य में उन के बहुत करीबी लोगों ने तो बधाइयां देनी और लेनी भी शुरू कर दीं थीं. हुड्डा के लिए पटाक्षेप होता हुआ दिखने लगा था. चुनाव के आंकड़े, दलितों के पलायन जैसी ज़मीनी सियासी अच्छाइयां और पार्टी की संगठन के स्तर पे रिपोर्ट भी, सब खिलाफ था उन के. बहुत ज्यादा संभावना थी कि हमेशा की तरह शाम चार बजे कांग्रेस मुख्यालय पे होती चली आ रही प्रेस कांफ्रेंस में ऐलान कर दिया जाएगा. लेकिन उस से ठीक पहले कुछ कांग्रेसियों(?) ने कांग्रेस मुख्यालय पर मोहसिना किदवई के दफ्तर में घुस कर हंगामा कर दिया. ये नारे लगाते हुए कि राज हुड्डा को न मिला तो आग लगा देंगे सारे हरियाणा में.

उधर प्रेस कांफ्रेंस में होने वाली घोषणा रुक गई. इधर हरियाणा में वापसी करते अर्धसैनिक बल. कांग्रेस के इतिहास में ऐसा विकट और प्रकट विरोध करने की हिम्मत कभी किसी ने नहीं की थी. बेशक इस लिए भी कि सोनिया गांधी जैसा रहम खा जाने वाला दिल का नरम अध्यक्ष भी कभी नहीं रहा कांग्रेस में कोई. इंदिरा गांधी होतीं तो स्वर्ण सिंह, जगजीवन राम और वाय.बी. चव्हाण वाली गाड़ी पे चढ़ा देतीं वे हुड्डा को. लेकिन घर, देश, प्रदेश और पार्टी की मजबूरियों की खातिर एक टाल की उन्होंने. युद्ध का एक सिद्धांत ये भी है कि चार कदम आगे बढ़ने के लिए कभी दो कदम पीछे भी हटना पड़ता है. सोनिया गांधी ने भी समझौता किया परिस्थतियों से और हुड्डा को शपथ दिलानी पड़ी. रोहतक में रुके जवान तीन दिन बाद घरों को लौटे.

हुड्डा के पहले से मुख्यमंत्री हो जाने के हकदार बीरेंदर सिंह को पार्टी राज्यसभा ले गई. उन्हें महासचिव जैसी जिम्मेवारी दे कर दिल्ली, उत्तराखंड और हिमाचल जैसे राज्यों की जिम्मेवारी दे दी. शैलजा केंद्र में मंत्री थीं ही. वे मंत्री बनी रहीं. उन्हें हरियाणा ला कर लोकसभा के एक उपचुनाव से पार्टी बची रही. लेकिन हुड्डा के राज में कांग्रेस की प्रतिष्ठा, विश्वसनीयता घटती चली गई. खासकर मिर्चपुर कांड के बाद. इस ने तो गुडगांव के हौंडा और गोहाना को भी पीछे छोड़ दिया. प्रदेश में जब फिर दलित बैकलेश शुरू हुआ और फिर शैलजा के आ सकने की संभावना, तो आरक्षण के नाम पर जाटों का एक आंदोलन आया. खुद कांग्रेसियों का कहना है कि ये हुड्डा ने कराया. ये हाईकमान को फिर डराने की एक योजना थी जो फिर काम कर गई.

लेकिन पता नहीं कितना गंभीर है हाईकमान इस बार, लगता मगर ये है कि अब कांग्रेस ने ये बताने का मन बना लिया है कि हरियाणा अगर जागीर है तो पार्टी की तो है. किसी एक नेता की नहीं है. ये खबर आप पढ़ ही चुके हों शायद कि ज़मीनों के चेंज आफ लैंड यूज़ की फाइलें अब पार्टी तलब करने लगी है. हरियाणा में ये करोड़ों नहीं, अरबों रूपये का धंधा है. एक सीनियर कांग्रेसी के मुताबिक़, ”इतना माल पीट लिया है हुड्डा ने कि उन्हें तो कांग्रेस की ज़रूरत ही क्या है हरियाणा में. अब तो हालत ये है कि वे चाहें तो देश में एक कांग्रेस खड़ी कर सकते हैं.” वे कहते हैं, बल्कि हरियाणा में तो कांग्रेस को खुड्डे लाइन लगा ही दिया है हुड्डा ने. दलित छिटक ही चुके हैं. राव इंद्रजीत और कैप्टन अजय यादव की हालत के बाद अहीर साफ़ हैं. बनियों, पंजाबियों ने कभी हुड्डा को अपना नेता माना ही नहीं. इस लिए बचना अगर हरियाणा में कांग्रेस को है तो हुड्डा को जाना ही होगा. इस और इस तरह के कुछ और कांग्रेसियों की राय में इस बार यूं सोनिया के आने का हुड्डा के जाने के साथ गहरा संबंध है. ये अलग बात है कि सोनिया गांधी वो भी हैं जिसे कुछ रहम से लिखें तो रहमदिल कहते हैं.

(लेखक जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम के संपादक हैं. उन से संपर्क [email protected] पर किया जा सकता है.)

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