गुटखे पर प्रतिबंध से बात नहीं बनेगी!

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-डॉ. आशीष वशिष्ठ||

आम आदमी के स्वास्थ्य के दृष्टिगत 15 राज्यों द्वारा गुटखा प्रतिबंध का निर्णय सही मायने में काबिलेतारीफ है. गुटखे से होने वाले शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानियों और विशेषकर युवाओं को इस बुरी व जानलेवा लत से बचाने के लिए प्रतिबंध की मांग पिछले काफी समय से सामाजिक संगठन कर रहे थे. देश के अन्य राज्यों में भी गुटखे पर प्रतिबंध की तैयारी हो रही है. लेकिन आम आदमी के स्वास्थ्य से जुड़े इस अति गंभीर विषय और प्रतिबंध के मध्य कुछ व्यवाहारिक प्रश्न, तथ्य, तकनीकी व कानूनी दांवपेंच ऐसे हैं जिनका उत्तर सरकार और न्यायालय के पास नहीं है. गुटखा व्यवसायियों के व्यापारिक हित, सरकार को गुटखा उद्योग से प्राप्त होने वाले भारी भरकम राजस्व, इस उद्योग से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से जुड़े छोटे-बड़े करोड़ों व्यापारियों, लाखों कर्मचारियों तथा प्रतिबंध के बाद उपजने वाली स्थितियों मसलन अवैद्य निर्माण, बिक्री, तस्करी पर विचार करना आवश्यक जान पड़ता है.

भारत में गुटखा व्यवसाय दस हजार करोड़ रुपये का है. विश्व बाजार में तंबाकू के उत्पादन में भारत अग्रणी भूमिका तो निभाता ही है वहीं तंबाकू की खपत में भी वो चौथे पायदान पर है. देश की अर्थव्यवस्था में तंबाकू अहम भूमिका निभाता है. भारत में सबसे ज्यादा तंबाकू की खपत खैनी, जर्दा और गुटखा में ही होती है. भारत जिन देशों में तंबाकू को निर्यात करता है उनमें रूस, ब्रिटेन, जापान शामिल हैं. देश की अगर बात की जाए तो गुजरात उन राज्यों में शुमार है जहां पर तंबाकू की खेती राज्य की अस्सी प्रतिशत भूमि पर की जाती है. राज्य के आणंद और खेड़ा जिले तो ऐसे हैं जहां की पूरी जमीन पर तंबाकू की ही खेती होती है.

देश में गुटखे के 400 से अधिक ब्रांड की बिक्री से होने वाले कारोबार से करीब 100 बिलियन रुपये की कमाई होती है और इस व्यवसाय से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर करीब ढाई करोड़ लोगों को रोजगार मिला है. देश में गुटखा व्यवसाय  के कुल कारोबार की 25 फीसदी सर्वाधिक खपत महाराष्टï्र में होती है. महाराष्ट्र में में 300 करोड़ रुपये की गुटखा बिक्री से सरकार को प्रतिवर्ष 100 करोड़ रुपये की राजस्व  प्राप्ति होती है. दिल्ली सरकार को 40 करोड़ के राजस्व की प्राप्ति गुटखा उद्योग से होती है. उत्तर प्रदेश में गुटखा का कुल व्यापार दो हजार करोड़ रुपए का है जिसमें केंद्र और राज्य सरकार को करों के रूप में पांच सौ करोड़ का नुकसान होगा. करों के रूप में राज्य सरकार को दो सौ करोड़ तो केंद्र सरकार को तीन सौ करोड़ हासिल होते हैं. गुटखे व्यवसाय से प्राप्त होने वाले कुल राजस्व का दस फीसद केवल गुजरात से ही आता है.

उत्तर प्रदेश को गुटखा व्यवसाय का गढ़ कहा जाता है.  गुटखा प्रदेश के सभी जिलों में बनता है लेकिन कानपुर, आगरा व मथुरा में इसकी कई फैक्ट्रियां हैं जहां गुटखा बड़े पैमाने पर निर्मित होता है. प्रदेश में गुटखा बनाने वाली एक हजार एक सौ इकाई है. केंद्र की ओर से जारी खाद्य सुरक्षा कानून तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार ने गुटखा उद्योग को आगामी एक अप्रैल से पूरी तरह से बंद करने का आदेश जारी किया. गुटखा की फैक्ट्रियां अब तो राजधानी लखनऊ में भी खुल चुकी है जहां खुलेआम गुटखा बनता है. यह फैक्ट्रियां रिहायशी इलाकों में भी हैं जिसके लिए प्रदूषण विभाग आदि से शिकायतें भी की गयीं लेकिन सरकार का खुला सरंक्षण और अधिकारियों की कमाई का जरियां बनी फैक्ट्रियां खुलेआम चल रही हैं. इसके अलावा महाराष्टï्र, एनसीआर क्षेत्र और देश के विभिन्न राज्यों में भी गुटखा उद्योग धड़ल्ले से चल रहा है.

गुटखा खाना अत्यंत ही खतरनाक है. गुटखा में तम्बाकू का प्रयोग होता है जिसमें निकोटीन पाया जाता है.  तम्बाकू चबाने से मुंह के कैंसर समेत 40 प्रकार के कैंसर हो सकते हैं. तम्बाकू 25 प्रकार की बीमारियों का कारण है और लम्बे समय तक तम्बाकू का प्रयोग करने से यह बीमारियां हो सकती हैं. भारत में मरने वाले हर पांच में से दो लोगो की मौत का मुख्य कारण खैनी, गुटखा यां तंबाकू है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी ताजा रिपोर्ट में खुलासा किया है कि दुनिया भर में 30 साल से ज्यादा उम्र के लगभग 12 फीसदी लोगों की मौत का कारण खैनी, तंबाकू, गुटखा है. भारत में लगभग 16 प्रतिशत लोग इन्हीं तंबाकू उत्पादनों के सेवन से मर रहे हैं. धुआं रहित तंबाकू सेवन के मामले में भारत सबसे अव्वल देशों में से एक हैै. रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि धुआं रहित तंबाकू उत्पादों में सबसे ज्यादा सेवन खैनी का होता है. लगभग 91 प्रतिशत महिलाएं धुआं रहित तंबाकू का सेवन करती हैं. इनमें पान और खैनी शामिल है. मोटर्लटी एट्रीब्यूटेबल टू टोबको नामक रिर्पोट के अनुसार, तंबाकू सेवन के कारण 6 सकेंड में एक व्यकित की मौत हो रही है. पूरी दुनिया में लगभग 50 लाख लोगों की मौत का कारण तंबाकू का इस्तेमाल है. अगले 20 वर्षों में सिगरेट, गुटखा, खैनी, बीड़ी, तंबाकू और हुक्का पीने से पूरी दुनिया में लगभग 6 लाख लोग सेकेंड़ हैंड स्मोकिंग की वजह से मर रहे हैं यानी तंबाकू सेवन करने वाले लोग अपनी ही नहीं बलिक अपने परिवार और आसपास रहने वाले लोगों की भी जान ले रहे हैं. ग्लोबल अडल्ट टोबैको सर्वे के अनुसार, देश में लगभग 27 लाख लोगों की तंबाकू का सेवन कर रहे हैं. इनमें से लगभग 9 लाख लोगों की असमय मौत तय है. लोबल यूथ टोबैको (गेट्स) के अनुसार, दिल्ली में 48.2 फीसदी युवा 15 साल से कम की उम्र में ही तम्बाकू का सेवन शुरू कर देते हैं. यहां के 13 लाख लोग पैसिव स्मोकर और 10 लाख लोग गुटखा के रूप में तम्बाकू का सेवन करते हैं. शोध के अनुसार 5 से 10 साल तक लगातार तम्बाकू सेवन करने वाले 30 फीसदी युवाओं में नपुंसकता पाई गई है.

सुप्रीम कोर्ट और राज्य सरकारों का निर्णय स्वागतयोग्य है, लेकिन गुटखा उद्योग से होने वाली मोटी कमाई और सरकारी अमले को प्रतिमाह इससे मिलने वाली करोड़ों की घूस प्रतिबंध को सही मायने में लागू होने देगी इस पर संदेह है, और ये संदेह निराधार या काल्पनिक भी नहीं है. असल में गुटखे की पाबंदी को लेकर जिस कानून का सहारा लिया गया, गुटखा कंपनियों ने उसका बड़ी आसानी से तोड़ निकाल लिया है. नए कानून के मुताबिक, जिस पान मसाले में तंबाकू या निकोटिन होगा, उसकी बिक्री पर पूरी तरह बैन होगा. गुटखे पर यह रोक नए फूड सेफ्टी एक्ट के तहत लगाई जा रही है, जिसके तहत स्वास्थ्य के लिए असुरक्षित पाए गए खाद्य पदार्थों के लिए छह महीने तक की सजा और एक लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है. असुरक्षित खाद्य पदार्थ के कारण मौत होने पर अधिकतम सात साल की सजा और 10 लाख रुपये जुर्माने की व्यवस्था है. गुटखा कंपनियों ने जो खेल किया है, उसके अनुसार उन्होंने अपने गुटखे में से तंबाकू व निकोटिन को निकालकर उसे सादा बना दिया है और तंबाकू का पाउच अलग से तैयार कर उसे मार्केट में उतार दिया है. कानून में सीधे तौर पर तंबाकू या खैनी बेचने पर प्रतिबंध नहीं है. गुटखा पर पाबंदी से तो केवल इतना सा होगा कि जर्दा मिला पान मसाला रख नहीं सकते दोनों को अलग-अलग खरीद उन्हें मिलाकर तो खाया ही जा सकता है. सरकारी प्रतिबंध को दरकिनार कर अब भी दोगुनी और तिगुनी कीमतों पर गुटखे बिक रहे हैं.

गुटखे पर प्रतिबंध से पूर्व देश के कई राज्यों में शराबबंदी के असफल प्रयोग किए जा चुके हैं. गुटखा और सिगरेट लॉबी में छिड़ी व्यापारिक जंग भी सबके सामने है. राज्य सरकारें भी भारी भरकम राजस्व का मोह भारी मन से ही छोड़ पा रही है. सरकारी मशीनरी को इस उद्योग से मिलने वाली मोटी घूस भी प्रतिबंध की राह में रोड़े अटकाएगी. सरकार ने प्रतिबन्ध लगाकर तो आधा काम किया है. इससे काम नहीं चलेगा. अगर पूरी तरह स्वास्थ्य का ध्यान रखना है तो आम जनता को भी सामने आना पड़ेगा. लोग अब गुटखे का विकल्प ढूंढने के बजाय इसे छोडऩे का संकल्प लें. उनका यह कदम खुद के साथ उनके परिवार और बच्चों के हित में होगा. मीडिया और सामाजिक संस्थाएं लोगों को सचेत व जागरूक करने के लिए बहस और प्रचार के जरिये वातावरण बनाएंगे तो प्रतिबंध के बगैर इस बुराई पर रोक लगाई जा सकती है. इस कार्य में गुटखा निर्माताओं व व्यापारियों के सहयोग की भी जरूरत है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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