ज़ी न्यूज़ और ज़ी बिजनेस के संपादकों को जेल भेजने की तैयारी में नवीन जिंदल..

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एक अपुष्ट मगर सही खबर के अनुसार जी न्यूज के एडिटर सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के एडिटर समीर आहलूवालिया के खिलाफ कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के तरफ से एक एफआईआर दर्ज करा दिया गया है. सूत्रों द्वारा मिली जानकारी पर भरोसा करें तो दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की इंटर स्टेट सेल में एफआईआर नंबर 240 है, जिसमें अभियुक्त सुधीर चौधरी और जी बिजनेस को बनाया गया है. इन दोनों पर नवीन जिंदल की तरफ से आरोप लगाया गया है कि इन लोगों ने कोल ब्लाक आवंटन से जुड़ी खबरें न दिखाने को लेकर उन्हें ब्लैकमेल किया और रंगदारी मांगी.
सूत्रों के मुताबिक खबर न दिखाने के लिए मांगी गई रकम पांच करोड़ से पचास करोड़ के बीच है. चर्चा है कि नवीन जिंदल ने पूरे एविडेंस के साथ एफआईआर दर्ज कराई है जिसमें काल रिकार्डिंग से लेकर वीडियो रिकार्डिंग तक शामिल है. यह भी कहा जा रहा है कि एक होटल में मीटिंग के लिए जिंदल ने संपादकों को बुलाया था, वहां की वीडियो रिकार्डिंग भी है. यह तो सबको पता है कि जी न्यूज और जी बिजनेस पर कोल ब्लाक आवंटन के मामले को लेकर नवीन जिंदल के खिलाफ जोरशोर से खबरें चलाई गई थी. नवीन जिंदल पर जी के रिपोर्टर से बदतमीजी करने का भी आरोप लगा था. अब नया डेवलपमेंट पता चला है.
हालांकि अभी कोई एफआईआर होने की बात की पुष्टी नहीं कर रहा है. खुद जी न्यूज के एडिटर सुधीर चौधरी कह रहे हैं कि उन्हें नहीं पता कि ऐसा कुछ हुआ है क्योंकि उनके पास किसी प्रकार का ऐसा कोई फोन नहीं आया जिससे पता चले कि कोई एफआईआर दर्ज हुई है. सुधीर चौधरी ने जरूर आशंका  व्यक्त की कि उन लोगों ने जिस तरीके से कोल ब्लाक आवंटन मसले पर स्टैंड लिया और नवीन जिंदल सहित तमाम लपेटे में आए लोगों के खिलाफ खबरें दिखाईं, उससे वे लोग बौखलाए हुए हैं और किसी भी हद तक उतर सकते हैं. सुधीर चौधरी ने ब्लैकमेलिंग और रंगदारी जैसे आरोपों से इनकार किया और कहा कि अगर ऐसा आरोप लगाया गया है तो यह खबर दिखाने की प्रतिक्रिया स्वरूप और बदला लेने की भावना के तहत है.
मीडिया दरबार द्वारा इस मसले पर जानकारी चाहने के लिए नवीन जिंदल के निजी मोबाइल पर सम्पर्क करने पर उनका मोबाइल स्विच ऑफ मिला. गौरतलब है कि जिंदल समूह के संस्थापक स्व. आर.पी. जिंदल के जीवित रहते कभी भी किसी पत्रकार और जिंदल समूह के बीच कोई मसला खड़ा नहीं हुआ. लेकिन नवीन जिंदल में अपनी आलोचना को सहन करने का आदत नहीं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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