भारत के दो बनिये, एक “राष्ट्रपिता” बने, दुसरे “बूढी पत्नी से मजा नहीं पा रहे हैं”

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-शिवनाथ झा||
आज सुबह-सुबह एक मित्र का फोन आया. उन्होंने पूछा की आप श्रीप्रकाश जायसवाल पर कुछ लिख रहे हैं? मैंने कहा कि अब लिखने के लिए कुछ बचा है क्या? उनके इस सोच के बारे में भी कुछ लिखना उन्हें पब्लिसिटी ही देगा. फिर अकस्मात् याद आया की मोहनदास करम चाँद गाँधी भी तो “बनियाँ” ही थे. मैं मन ही मन मुस्कुराया. मेरे मित्र कुछ पल तो शांत रहे. मैं क्या लिखना चाह रहा हूँ यह उन्हें पता नहीं था. एक मिनट बाद शांति भंग हुयी और फिर उन्होंने कहा शुरू हों जाएँ.
कुछ दिन पहले एक पुस्तक पढ़ी थी- टेल ऑफ़ टू सिटिज. उस पुस्तक में दो शहरों के सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और लोगों के मानसिक स्तरों का एक तुलनात्मक अध्ययन था. विषय बहुत सटीक थे और दिल को टीस पहुँचाने वाले भी. मैं अपने मन में उस पुस्तक के ‘भाव’ पर भारत के दो बनियों के मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक पहलुओं को एक साथ देखने का एक प्रयास किया हूँ. वैसे दोनों के नाम को एक साथ लेना एक का बहुत बड़ा अपमान करना है, यह मेरे लिए एक कलंक भी होगा की मैंने कैसे यह सोच लिया की जहाँ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का नाम लिख रहा हूँ, उसी पंक्ति में श्रीप्रकाश जायसवाल का नाम कैसे लिखूं. लेकिन पाठक कृपया मुझे माफ़ करेंगे, आखिर यह प्रजातंत्र है और मुझे भी भारत के संविधान के तहत बोलने और लिखने की स्वतंत्रता है.
आज से पांच साल पहले मैं तात्या टोपे के वंशज श्री विनायक राव टोपे और उनके परिवार के संरक्षण पर कार्य कर रहा था लालू प्रसाद पर बनी एक पुस्तक के माध्यम से, एक दिन कानपूर के बनियें से मुलाकात हुयी. मैंने उनसे कहा की आप तो कानपूर लोक सभा से सांसद हैं, अगर आप हमारे इस प्रयास में मदद करते तो महारास्त्र के एक ब्रह्माण का कल्याण हों जाता. वैसे भी यह परिवार भारत का आम परिवार नहीं है. कानपूर का बनियाँ ने तुरंत कहा: “ये मेरे संसदीय चुनाब क्षेत्र में नहीं आते हैं..हमें क्या फायदा होगा?” मैं स्तब्ध रह गया. शायद गुजरात का बनियाँ होता तो यह बीचा कतई उनके दिमाग में दूर-दूर तक नहीं आता.
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जाती से “बनियाँ” थे, गुजरात के एक हिन्दू बनियाँ, जहाँ सावरमती नदी का पानी उस समय वहां के लोगों को, हरेक जन्म लेने वाले बच्चों को, माताओं के प्रति, ना केवल भारत राष्ट्र के लिए वरन सम्पूर्ण स्त्री समुदाय के लिए, चाहे वह भारतीय हों या विश्व के किसी कोने की जननी हों, बहुत ही शीर्षस्थ विचार और सम्मान रखने का पाठ पढाया. सावरमती नदी के जल में अनंत प्रवाह के बाद आज भी गुजरात के लोगों में महिलाओं के प्रति अनंत स्नेह और सम्मान है. वैसे यह अलग बात है की सावरमती नदी के पानी और प्रवाह में अब वैसी बात नहीं रही नहीं तो महज ६६ साल में अपने ही लोगों को विभिन्न सांप्रदायिक धटना में आग के मुंह में धकेल नहीं दिया जाता जो पिछले कुछ सालों से हों रहा है.
बहरहाल, उत्तर प्रदेश के कानपूर शहर, जिसे गंगा नदी की धारा अनंत काल से, अनवरत रूप के उसकी मिटटी को धोती, बहती चली आ रही है, वहां भी एक बनियाँ पैदा होता है जो अपने जीवन के अंतिम कुछ वन्शत को देख रहा है (६८ वर्ष आयु है), लेकिन कहता है “पत्नी जब पुरानी हों जाती है तो मजा नहीं देती है.” मान गए ऐसे सोच रखने वाले को.
कानपुर के इस बनिए का नाम है श्रीप्रकाश जायसवाल. भारत सरकार में मंत्री भी है लेकिन कोयला का. मेरा मानना है श्रीप्रकाश जायसवाल को सबसे पहले अपने नाम के आगे ‘श्री’ और ‘प्रकाश’ दोनों को हटा देना चाहिए. फिर जो बचेगा वह उनके लिए काफी होगा. जायसवाल यानि बनियाँ और सोच भी कोयला के तरह ‘काला’. आखिर मंत्री भी तो कोयला के ही हैं.
मोहनदास करमचंद गाँधी का विवाह १३ वर्ष की आयु में हुआ कस्तूरबाई मखांजी. उस समय पत्नी की आयु पति से एक वर्ष अधिक थी. बाद में, समयांतराल, अपने पति के कंधे-से-कंधे मिलाती, जीवन के एक-एक पग पर अपने पति के साथ भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में साथ देते-देते कस्तूरबाई मखांजी “बा” बन गयी. आज भी भारत के जन-मानस का “बा” के प्रति जो स्नेह है, शायद उस स्नेह को कोई दूसरी महिला नहीं ले पाई. लेकिन, कानपूर के इस बनिये की पत्नी श्रीमती माया  रानी जी इनके उम्र से अच्छी -खासी छोटी हैं, लेकिन कहते हैं इसके अनुसार “पत्नी जब पुरानी हों जाती है तो मजा नहीं देती है.” पता नहीं जायसवाल जी “कौन सा मजा ढूंढ़ रहे हैं?”
मोहनदास करम चंद गाँधी को चार संतान, चारों  बेटा  – हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास. लेकिन कानपपुर के इस बनिये को तीन संतान  – दो बेटा और एक बेटी. इश्वर ना करे, अगर कल पिता के इस कथन को (पत्नी जब पुरानी हों जाती है तो मजा नहीं देती है) इनका  दामाद भी दुहराए, तो एक पिता को कैसा  लगेगा ?
मोहनदास करमचंद गाँधी ‘शुद्ध  शाकाहारी’ थे और गीता के अनन्य भक्त भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए सन्देश  – कर्म  की पूजा  करो  – इनके  जीवन का मूल मन्त्र था और इसी मन्त्र के सहारे जीवन पर्यंत सत्य -और- अहिंसा द्वारा भारत के आवाम  को अंग्रेजी हुकूमत के त्रादसी  से मुक्ति किया और भारत के जन-मानस के मानसपटल पर अमर हों गए  “बापू” बनकर. लेकिन कानपूर के बनिये का नैतिक स्तर उनके कथन से ही स्पष्ट है. जानकर सूत्रों के अनुसार संध्याकाल  छः बजे अपने घर पर ये आगंतुकों से मिलते हैं. यही परंपरा है इनके मंत्रित्व काल से. लेकिन संध्या सात बजे से कोई इनके समीप से बात नहीं कर सकता हैं – कहते हैं शाकी और शबाब के सौकीन हैं तभी अंतरात्मा की आवाज जुवान पर आ गयी और बोल उठे “पत्नी जब पुरानी हों जाती है तो मजा नहीं देती है.
कानपुर के बनियें की एक आदत जबरदस्त है जो आम तौर पर डाक्टरी चिकित्सा के लिए अपेक्षित है. इस महाशय को “कान खोदने” की गजब आदत है. चाहे भारत के सुरक्षा सम्बन्धी बैठक में बैठे हों या राजनैतिक मंच पर वोट की राजनीति करने या फिर बंद कमरे में कोयला घोटाले से सम्बंधित फायलों पर हस्ताक्षर करने, एक हाथ की ऊँगली हमेशा कान में ही रहेगी, और अगर वहां से निकली तो सीधा नाक के पास. वैसे महात्मा को तो मैंने देखा नहीं, लेकिन उम्मीद करते हैं की ऐसी आदत उनमे नहीं ही रही होगी. हाँ, अगर उन्होंने ऊँगली भी की तो अंग्रेजों को, भारत छोड़ने के लिए.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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6 thoughts on “भारत के दो बनिये, एक “राष्ट्रपिता” बने, दुसरे “बूढी पत्नी से मजा नहीं पा रहे हैं”

  1. ऐसे लोगों के बारे में लिखना या बोलना उनको पॉपुलैरिटी देना है. वैसे भी तो राजनीति एक तरह की गन्दगी है और उसमे पालने पोसने वाले श्री जैसवाल जी उसके कीरे है. जिन्हें दूसरों की बात तो छोडो अपनी ही बेटी, बहिन और माँ का भी बिलकुल ख्याल NAHIN रहा. धन्यवाद् देता हूँ मैं उनके परिवार के सदस्यों को जो फिर भी उनको पिताजी, चाचाजी, ताऊ जी, नाना जी कहते होंगे.

  2. जायसवाल समाज और देश के नाम पर कलंक हैं, रही मजे के लिए दामाद द्वारा इनकी बेटी को छोड़ देने की, वोह बेचारे शायद इनके जैसे घ्रणित बुद्धि वाले नहीं,संस्कारी हैं,वोह बात अलग है कि ऐसे स्वसुर कि सांगत में बिगड़ जाएँ.

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