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दब नहीं सकेगा दुनियां का सबसे बड़ा घोटाला…

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-सुग्रोवर||

मीडिया दरबार पर प्रकाशित 48 लाख करोड़ रुपये के परमाणु ईंधन थोरियम पर सरे आम डकैतीखबर को गणेश जी की मूर्ति को भी दूध पिला देने वाले अफवाह बाजों ने रामसेतु से जोड़ कर असल मुद्दे की कब्र खोद दी थी. मीडिया दरबार ने इन अफवाह बाजों को बहुत समझाना चाहा कि आप इसे तथ्यों के विपरीत रामसेतु से जोड़ कर इस घोटाले को खुलने से पहले ही दफ़न कर दोगे. मगर अफवाह फ़ैलाने के आदी और अफवाहों के बूते खुद को जिन्दा रखने वाले परजीवी लोग किसी के समझाने से नहीं समझते. ये लोग वही करते हैं जो इन्हें मुफीद रहता है. यही नहीं एक कथित इंजीनियर ने थोरियम घोटाले को रामसेतु से जोड़ते हुए मीडिया दरबार पर प्रकाशन के लिए एक लेख भी भेज दिया और उसमें थोरियम की उपयोगिता से सम्बंधित प्रकाशित कुछ लेखों के लिंक भी उस लेख में इस तरह नत्थी कर दिए कि पहली नज़र में सभी लिंक उस लेख को सही साबित कर दें. जब मीडिया दरबार ने उस लेख को प्रकाशित करने से मना कर दिया तो लेखक महोदय अपने आपको बहुत बड़ा विशेषज्ञ ज़ाहिर करते हुए हमसे ही सवाल जवाब करने लगे. आख़िरकार जब हमने उनसे प्रमाण मांगे कि रामसेतु के नीचे थोरियम है और कितना है और कितना निकाल लिया गया, इसके प्रमाण दीजिये तभी यह लेख मीडिया दरबार पर प्रकाशित हो पायेगा. तब जाकर उन्होंने हमारी जान छोड़ी.  लेकिन यह लोग सोशल साईटस पर थोरियम घोटाले को रामसेतु से जोड़ चुके थे और इस सम्बन्ध में जितनी पोस्ट इन्टरनेट पर फैला सकते थे, फैला दी. इससे हुआ यह कि दुनियां में अब तक हुए सभी घोटालों की राशि जोड़ देने के बाद उन्हें कई गुना करने के बाद भी इस घोटाले की रकम 48 लाख करोड़ रूपये  का थोरियम घोटाला भी अफवाहों की श्रेणी में आ गया. नतीज़तन इस घोटाले की खबर को किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया. मगर जयपुर से प्रकाशित दैनिक राष्ट्रदूत के दिल्ली ब्यूरो ने मीडिया दरबार की इस खबर को गंभीरता से परखा और कई दिनों की शोध के बाद आज इस घोटाले की खबर को अपने पहले पृष्ठ पर स्थान देकर फिर से एक बार इस घोटाले की खबर को  हवा दे दी.

दैनिक राष्ट्रदूत में छपी थोरियम घोटाले की खबर..

जैसा कि हम मीडिया दरबार पर इस घोटाले को सबके सामने लाते वक़्त भी बता चुके हैं कि मनमोहन राज में घोटाले यूपी-दो में ही नहीं हुए बल्कि दुनिया के इतिहास के इस सबसे बड़े घोटाले की नींव 2004 में ही रख दी गयी थी. जिसके सामने कोलगेट और 2G घोटाले ही नहीं विश्व के सभी घोटाले मिल कर भी शर्मिंदा हो जाते है. भारतीय बाज़ार मूल्य में इस घोटाले की राशि करीब 48 लाख करोड़ रूपये है और अंतर्राष्ट्रीय मूल्य से यह घोटाला 240 लाख करोड़ रुपये का हो जाता है. दरअसल भारतीय समुद्री तटों पर हुए इस घोटाले में पिछले कुछ सालों में बेशकीमती इक्कीस लाख टन मोनाजाईट,  जो कि 195300 टन थोरियम के बराबर है, गायब हो चुका है.  थोरियम परमाणु उर्जा बनाने के काम आने वाला बेहतरीन ईंधन है जो कि रेडियोधर्मी गुणों के बावजूद बहुत कम विकिरण के कारण यूरेनियम के मुकाबले बेहद सुरक्षित परमाणु ईंधन है.  थोरियम परमाणु उर्जा केन्द्रों के लिए ही नहीं बल्कि परमाणु मिसाइलों में भी काम आता है.

गौरतलब है कि कुछ देशों में ही मोनाजाईट/थोरियम रेत में मिलता है और भारत भी उन विरले देशों में शामिल है. भारत में मोनाजाईट ओडिसा के रेतीले समुद्री तटों के अलावा मनावालाकुरिची (कन्याकुमारी) और अलुवा-चवारा (केरल) के रेतीले समुद्री तटों पर पाई जाने वाली रेत में होता है, जिससे इसे रेत से अलग किया जाना बहुत ही आसान होता है. जबकि अधिकांश देशों में मोनाजाईट पथरीली चट्टानों में होने के कारण उसे निकालना ना केवल बेहद महंगा बल्कि श्रमसाध्य भी होता है.

सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी इंडियन रैर अर्थस लिमिटेड जो कि मोनाजाईट से थोरियम अलग करने के लिए भारत सरकार द्वारा अधिकृत एक मात्र  संस्थान है. इंडियन रैर अर्थस लिमिटेड के उपरोक्त तीनों समुद्री तटों पर अपने डिविजन हैं तथा केरल स्थित कोलम में अपना अनुसन्धान केंद्र है. इसके अलावा कई निजी क्षेत्र की कम्पनियां भी इन इलाकों से समुद्री रेत का खनन कर निर्यात करती हैं मगर उनके पास किसी भी तरह का लाइसेंस नहीं है. यह निजी क्षेत्र की कम्पनियां मोनाजाईट और थोरियम निकली हुई रेत ही एक्सपोर्ट कर सकती हैं मगर हो रहा है उल्टा. यह कम्पनियाँ कुछ राजनेताओं और अधिकारीयों की मदद से अनधिकृत रूप से मोनाजाईट और थोरियम समेत इस बेशकीमती समुद्री रेत का निर्यात कर देश को चूना लगा रही हैं.

यह मामला कभी सामने नहीं आता मगर सांसद सुरेश कोदिकुन्निल ने लोकसभा में अतारांकित प्रश्न के ज़रिये सवाल उठाया कि “क्या इस समुद्री रेत का खनन करने वाली कम्पनियां मोनाजाईट और थोरियम निर्यात में एटोमिक एनर्जी रेग्युलेटरी बोर्ड द्वारा निर्धारित नियमों का पालन कर रही है या नहीं?”

इसके जवाब में भारत के जन समस्या राज्यमंत्री वी नारायण स्वामी का लोकसभा में उत्तर था कि “थोरियम और मोनाजाईट निर्यात करने के लिए एटोमिक एनर्जी एक्ट के तहत लाइसेंस की जरूरत होती है जो कि इन कंपनियों के पास नहीं है और यह कम्पनियां वहाँ से समुद्री रेत का खनन कर के उस रेत का निर्यात कर रही हैं जिसमें मोनाजाईट और थोरियम होता है.” पूरे उत्तर को पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें.

गौरतलब है कि यूपीए-एक के शासन में परमाणु उर्जा विभाग प्रधानमंत्री के पास था तथा उन्होंने अमेरिका से परमाणु संधि होने से पहले 20 जनवरी, 2006 को कुछ ऐसे

खनिज लाइसेंस मुक्त कर दिए थे जिनमें इल्मेनाईट, ल्युटाइल और जिरकॉन इत्यादि थे. मगर एटोमिक एनर्जी रेग्युलेटरी बोर्ड के दिशा निर्देशों के अनुसार “समुद्री रेत से मोनाजाईट और थोरियम निकाली हुई समुद्री रेत ही निर्यात की जा सकती है. यही नहीं समुद्री रेत से मोनाजाईट और थोरियम को बिना लाइसेंस निकाला भी नहीं जा सकता.”

गौरतलब है कि इंडियन रैर अर्थस लिमिटेड के अलावा किसी अन्य कंपनी के पास यह लाइसेंस नहीं है. उसके बावजूद कई निजी क्षेत्र की कम्पनियां ओडिसा के रेतीले समुद्री तटों के अलावा मनावालाकुरिची (कन्याकुमारी) और अलुवा-चवारा (केरल) के रेतीले समुद्री तटों से समुद्री रेत का खनन कर निर्यात कर रहीं हैं और इस रेत के साथ मोनाजाईट और थोरियम बिना किसी अनुमति या लाइसेंस के निर्यात हो रहा है और भारत की इस बहुमूल्य संपदा पर पिछले आठ सालों से डाका डाला जा रहा है. जो कि बढ़ते बढ़ते 48,00,00,00,00,00,000 (48 लाख करोड़) रूपये का हो गया. यह मूल्य तो भारत का है, जबकि विदेशों में यह कीमत पांच गुना अधिक है. याने भारत में सौ डॉलर प्रति टन मूल्य की यही रेत विदेशों में पांच सौ डॉलर प्रति टन बिकती है. इसका मतलब अंतर्राष्ट्रीय भाव से यह डाका दो सौ चालीस लाख करोड़ का है.

गौरतलब है कि समुद्री रेत से मोनाजाईट और थोरियम निकालने के लिए मुख्य नियंत्रक खनन, भारत सरकार के नागपुर स्थित मुख्यालय से लाइसेंस लेना पडता है. जबकि पिछले चार सालों से मुख्य नियंत्रक सी पी अम्बरोज़  की सेवानिवृति के बाद से यह पद खाली पड़ा है, क्योंकि इस पद पर अम्बरोज के बाद नियुक्त मुख्य नियंत्रक को अब तक चार्ज नहीं लेने दिया गया. यहाँ ताज्जुब इस बात का है कि नयी नियुक्ति तक के लिए सेंट्रल जोन के नियंत्रक खनन, रंजन सहाय को मुख्य नियंत्रक का कार्य देखने के आदेश हुए थे मगर रंजन सहाय अपने राजनैतिक आकाओं के बूते मुख्य नियंत्रक को चार्ज नहीं दे रहा. यही नहीं  रंजन सहाय के खिलाफ सीवीसी के समक्ष अनगिनत गंभीर शिकायतें होने के बावजूद सहाय का कुछ नहीं बिगड़ा और ना ही किसी शिकायत की जाँच ही हुई. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार रंजन सहाय ना केवल दिग्गज राजनेताओं को साधे बैठा है बल्कि निजी क्षेत्र के बड़े बड़े उद्योगपति भी उसके करीबियों में शामिल हैं. कुल मिला कर राजनेताओं, अधिकारीयों और उद्योगपतियों व समुद्री रेत का खनन करने वालों का एक कॉकस लंबे समय से सरे आम इस बहुमूल्य परमाणु ईंधन पर डाका डाल रहा है और सरकार ने अपने कानों में रुई ठूंस रखी है और  आँखों पर पट्टी बांध रखी है.

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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4 thoughts on “दब नहीं सकेगा दुनियां का सबसे बड़ा घोटाला…

  1. घोटाले ही घोटाले,घोटालों ने मूल मुद्दों को तो पीछे धकेल दिया है,सर्कार ने भी सोच लिया है की जनता का ध्यान नित इन घोत्रलों पर ही लगा रहे तो ठीक है,महंगाई को तो अब जनता भूल ही चुकी है,रोजाना के घोटालों ने जनता का पेट इस तरह इतना भर दिया है कि अब उसे रोज किसी नए घोटाले के बारेमें सुनने कि उत्सुकता रहती है,यद् ही नहीं रहता कि कौन से घोटाले का क्या मसला था.

  2. घोटाले ही घोटाले,घोटालों ने मूल मुद्दों को तो पीछे धकेल दिया है,सर्कार ने भी सोच लिया है की जनता का ध्यान नित इन घोत्रलों पर ही लगा रहे तो ठीक है,महंगाई को तो अब जनता भूल ही चुकी है,रोजाना के घोटालों ने जनता का पेट इस तरह इतना भर दिया है कि अब उसे रोज किसी नए घोटाले के बारेमें सुनने कि उत्सुकता रहती है,यद् ही नहीं रहता कि कौन से घोटाले का क्या मसला था.

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