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जनता के लिए नहीं, नेताओं के लिए तो पैसे पेड़ ही पर उगते हैं…

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एक तरफ प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह राष्ट्र के नाम सन्देश में नागरिकों को कहते हैं कि ‘पैसे पेड़ पर नहीं उगते’ वहीँ, उनकी सरकार और राजनेता जनता की कड़ी मेहनत की कमाई इस तरह फिजूलखर्ची में उड़ाते हैं जैसे ‘पैसे पेड़ पर उगते हों.’ लम्बे समय से घपले घोटालों में उलझी सरकार का वित्तीय ढांचा बुरी तरह से चरमरा गया है, ऊपर से फिजूलखर्ची ने सरकारी खजाने को खाली कर दिया है.

व्यंग्य चित्र: मनोज कुरील

सरकार अपना घाटा कम करने के नाम पर अनाप शनाप ढंग से महंगाई बढ़ा, जनता को भारी परेशानियों के बोझ से लाद रही है, लेकिन केंद्र और तमाम राज्‍य सरकारें जनता का पैसा ‘मुफ्त का चंदन, घिस मेरे नंदन’ या फिर ‘माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम’ की तर्ज पर लुटा रही हैं. केंद्र सरकार ने पिछले दिनों सभी मंत्रालयों को फिजूलखर्ची से बचने और कोई कार्यक्रम पांच सितारा होटल में नहीं करने की हिदायत दी थी. लेकिन यह दिखावा साबित हो रहा है. सरकार की शाहखर्ची कम नहीं हुई है.

राष्ट्र के नाम संबोधन में ‘पैसे पेड़ पर नहीं उगने’ की बात कहने वाले प्रधानमंत्री की कैबिनेट की शाहखर्ची का ताजा नमूना सामने आया है. साल 2011-12 के दौरान पीएम मनमोहन सिंह सहित यूपीए सरकार के मंत्रियों के विदेश दौरों पर 678 करोड़ रुपये लुटा दिए गए. यह रकम 2010-12 की तुलना में करीब 12 गुना अधिक है. उस साल ऐसे दौरों पर 56.1 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. 2011-12 के दौरान इन यात्राओं का अनुमानित बजट महज 46 करोड़ 95 लाख रुपये था. हालांकि 2009-10 में यात्रा का अनुमानित बजट जहा एक अरब साठ करोड़ 70 लाख रुपये था लेकिन उस वर्ष यात्रा खर्च आम चुनाव की वजह से 81 करोड़ 54 लाख रुपये के करीब रहा. विदेशी दौरों पर हुए खर्च में इतना बड़ा उछाल आने की वजह मंत्रियों द्वारा चार्टर्ड विमानों के जरिये कई बार सफर करना है. जनता द्वारा टैक्‍स के तौर पर जमा किए जाने वाले पैसों की ‘बर्बादी’ से जुड़ा यह खुलासा आरटीआई कानून के तहत दायर एक आवेदन के जरिये हुआ है.

व्यंग्य चित्र: मनोज कुरील

सरकार गरीबों को 16 रुपये में रोज पेट भरने की नसीहत देती है लेकिन यूपीए-2 की सालगिरह के मौके पर आयोजित भोज में मेहमानों को परोसी गई एक थाली की कीमत 7 हजार 721 रुपये थी. यूपीए-2 की तीसरी वर्षगांठ पर यह भोज बीते 22 मई को पीएम निवास पर दी गई थी. इसमें सरकार के सभी मंत्री, सांसद, विधायक, समर्थक दलों के नेता सहित 375 मेहमान शामिल हुए थे. आरटीआई के तहत मांगी गई एक जानकारी के मुताबिक भोज पर कुल 28,95,503 रुपये खर्च हुए. सरकार ने बीते मार्च में गरीबी की नई परिभाषा जारी की थी. इसके मुताबिक गांव में 23 रुपये और शहर में 29 रुपये रोज खर्च करने वाले को गरीब नहीं माना जा सकता. सरकार का यह भी मानना है कि शहर में एक गरीब 16 रुपये में दो वक्‍त का खाना खा सकता है.

यूपीए सरकार ने 100 करोड़ रुपए के प्रचार अभियान की योजना बनाई है. मनरेगा और अल्पसंख्यकों के लिए शुरू की गई योजनाओं पर टीवी पर विज्ञापन आने शुरू हो गए हैं. ये इसी प्रचार अभियान का हिस्सा हैं. शहरी और ग्रामीण इलाकों के लिए अलग-अलग अभियान बनाए गए हैं. शहरों में मल्टीब्रांड रिटेल में फायदे गिनाए जाएंगे तो ईंधन मूल्यवृद्धि की मजबूरी भी बताई जाएगी. घोटालों और नीतिगत अपंगता के आरोपों का सामना कर रही सत्ताधारी कांग्रेस को उम्मीद है कि इसके जरिए छवि सुधारी जा सकती है. लेकिन गौर करने वाली बात है कि यह पैसा जनता की गाढ़ी कमाई (टैक्‍सपेयर्स मनी) से ही आया है.

2009 में 15वीं लोकसभा के गठन के बाद से विभिन्‍न केंद्रीय मंत्रालय पर बनी 25 संसदीय समितियों पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं. आरटीआई कानून के तहत दायर एक आवेदन से यह तथ्‍य सामने आया है. सितंबर 2009 में तत्‍कालीन वित्‍त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने साफ-साफ कहा था कि लोक लेखा समिति, प्राक्‍कलन समिति और सार्वजनिक उपक्रमों पर समिति को छोड़कर संसदीय समिति की बैठकें दिल्‍ली में होंगी. अगर दिल्‍ली से बाहर जाना बेहद जरूरी हुआ तो समिति के सदस्‍य इकोनॉमी क्‍लास में सफर करेंगे और सरकारी गेस्‍टहाउस या राज्‍य सरकार के होटलों में ठहरेंगे. लेकिन इन निर्देशों का खूब मखौल उड़ाया गया. हमारे सांसदों ने ‘स्‍टडी ट्रिप’ के नाम पर अंडमान निकोबार, श्रीनगर, लेह, केरल, डलहौजी, गोवा, लक्षद्वीप, शिमला और मन्‍नार का दौरा किया और वहां के लग्‍जरी होटलों में ठहरे.

पिछले कुछ दिनों से असम के कई जिलों में बाढ़ से लोगों का बुरा-हाल है लेकिन सूबे के सीएम तरुण गोगोई जापान की यात्रा पर चले गए हैं. गोगोई टोक्‍यो में गुड्स एंड सर्विस टैक्‍स से जुड़े मसलों पर स्‍टडी के लिए राज्‍यों के वित्‍त मंत्रियों की एम्‍पॉवर्ड कमेटी के सदस्‍य के तौर पर विदेश गए हैं. जबकि असम के 27 में से 15 जिले बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं. अब तक कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई है जबकि 17 लाख लोग प्रभावित हैं. बाढ़ के दौरान इस तरह सूबे से बाहर रहने पर गोगाई की विपक्षी दलों समेत कई संगठनों की आलोचना झेलनी पड़ रही है.

इसी तरह कुछ दिनों पहले कर्नाटक का भी हाल रहा. राज्‍य में भीषण सूखे की स्थिति बनी हुई थी लेकिन इस समस्‍या से निपटने को महत्व देने और किसानों और जनता की मदद करने की बजाय 13 विधायक विदेश दौरे पर गए. ‘स्‍टडी ट्रिप’ के नाम पर विदेश गए ऐसे एक विधायक पर छह लाख रुपये का खर्च आया. हैरानी की बात है कि राज्‍य के सीएम जगदीश शेट्टार ने मौजूदा स्थिति के मद्देनजर विदेश दौरे पर नहीं जाने की सलाह दी लेकिन इन विधायकों ने सीएम साहब की एक न सुनी. जब मीडिया में यह मामला उठा तो विधायकों ने अजीब-अजीब तर्क दिए. एक विधायक ने तो यहां तक कह दिया कि जब अजमल कराब की सुरक्षा पर सरकार 25 करोड़ खर्च कर सकती है तो विधायकों को विदेश दौरे पर जाने से क्‍यों रोका जा रहा है.

पूर्व राष्‍ट्रपति प्रतिभा पाटिल की विदेश यात्राओं पर खर्च पर सवाल उठ चुके हैं. पाटिल ने अपने कार्यकाल में परिवार सहित जम क्र विदेश यात्रायें की. उनकी विदेश यात्राओं पर ही 200 करोड़ से ज्यादा खर्च हुए हैं.

लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार अपने 35 महीने के कार्यकाल में 29 बार विदेश जा चुकी हैं. इस तरह वह हर 37 दिन पर विदेश गईं. सुभाष अग्रवाल की ओर से दाखिल आरटीआई के जवाब में मिली जानकारी के मुताबिक, मीरा कुमार के साथ विदेश यात्राओं पर जाने वाले में सांसद और लोकसभा सचिवालय के सीनियर ऑफिसर भी शामिल हैं. उनकी यात्राओं पर 10 करोड़ खर्च हुए हैं.

केंद्र में विदेश राज्‍य मंत्री रहे शशि थरूर, पर्यटन राज्यमंत्री रहे सुल्तान अहमद और मौजूदा विदेश मंत्री एस एम कृष्‍णा की पांच सितारा जीवन शैली और शाहखर्ची के चलते यूपीए की काफी किरकिरी हो चुकी है. यूपीए-2 की सरकार के गठन के बाद ये मंत्री सरकारी आवासों के बजाय पांच सितारा होटलों में रहते थे. मामला मीडिया में आया तो काफी बवाल मचा. इसके बाद तत्‍कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने आनन-फानन में इन मंत्रियों से होटल के कमरे छोड़ने के लिए कहा. कृष्णा होटल मौर्या शेरेटन में, थरूर होटल ताज महल और सुल्‍तान अहमद होटल अशोका में टिके हुए थे.

देश के विकास की योजनाएं बनाने वाले योजना आयोग ने नई दिल्‍ली स्थित अपने मुख्‍यालय योजना भवन में इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट तर्ज पर टॉयलेट बनाने के लिए इनकी मरम्मत पर 35 लाख रुपये खर्च कर दिए. इन टॉयलेट का इस्तेमाल करने के लिए 60 अफसरों को स्मार्ट कार्ड जारी किए गए हैं. इन टॉयलेट की ओर जाने वाले गलियारे में सीसीटीवी कैमरा लगाने का फैसला भी किया गया है. जनता के पैसे को पानी की तरह बहाए जाने से जुड़े इस खुलासे पर काफी बवाल मचा. लेकिन इसके बावजूद आयोग के उपाध्‍यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने इस खर्च को ‘जायज’ बताते हुए इसे मीडिया का दुष्‍प्रचार करार दिया.

हरियाणा के 112 सरकारी महकमों में ठेके पर तैनात सवा लाख कर्मचारियों के पीएफ और ईएसआई की राशि का बड़ा घपला चल रहा है. यह घपला छोटा-मोटा नहीं 52 करोड़ से ज्यादा राशि का है. इसके पीछे 22 सौ ठेकेदार हैं जो सरकारी विभागों में अनुबंध पर कर्मचारी देते हैं.

हरियाणा में 2007 से ठेके पर सरकारी विभागों में कर्मचारी रखे जाते हैं. 112 विभागों में ये कर्मी तैनात हैं. नियमानुसार इनकी पीएफ और ईएसआई की राशि काटी जाती है. सरकार भी अपना हिस्सा उनमें जमा कराती है. इस राशि का भुगतान संबंधित ठेकेदार को होता है, वह राशि को संबंधित कार्यालयों में इस कारिंदों की भविष्य सुरक्षा के लिए जमा कराता है. मजेदार बात यह है कि राशि जमा ही नहीं कराई जा रही है.

सरकारी नियमों के अनुसार पीएफ के 12 प्रतिशत एवं 1.75 प्रतिशत राशि ईएसआई की मद में कर्मचारियों के वेतन से काटी जाती है. यहां खेल यह भी हो गया कि पीएफ की मद में 13.61 एवं ईएसआई के 4.75 काट लिए गए यानी करीब चार प्रतिशत राशि गलत तरीके से काट ली गई. इसका कोई हिसाब-किताब या जवाब नहीं है. बिजली निगमों के 106 कर्मचारियों के परिवार परेशान हैं. इनकी लाइन पर काम करते समय मौत हो गई थी. भविष्य निधि के नाम पर राशि जमा नहीं है. अब मामला विकट रूप धारण करता जा रहा है. पीएफ के रोहतक, करनाल, फरीदाबाद एवं गुडग़ांव स्थित जोनल कार्यालयों से संपर्क भी किया जा रहा है. साथ ही ईएसआई के लिए गुडग़ांव निदेशक बार-बार कह चुके हैं. बावजूद इसके यह बड़ी राशि जमा नहीं हुई है.

(भास्कर)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “जनता के लिए नहीं, नेताओं के लिए तो पैसे पेड़ ही पर उगते हैं…

  1. तो साहब पी ऍम के भोज की एक थाली १६ रूपये की कैसे होगी, कुछ उनके पद की गरिमा का सवाल भी तो है.आर टी आई ने तो बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है बेचारे इन नेताओं के लिए,भले ही वे इसकी परवाह न करें पर एक बार तो हंगामा हो ही जाता है,क्या पता चुनाव के समय जनता को कोई सिरफिरा यह बातें याद दिला दे.वैसे तो शिंदे साहब और उनके साथी जानतें हैं कि जनता कि याद बहुत कमजोर होती है, पर इस जनता का भी क्या पता,इस लिए कम से कम मीडिया को तो ऐसे मुद्दे नहीं उछालने चाहिए , आखिर अब सरकार में हैं तो खा रहें हैं,बहार आ जायेंगे तो कौन खिलायेगा ,कहाँ से खिलायेगा, जनता ने इन्हें खाने के लिए ही तो चुना है.

  2. तो साहब पी ऍम के भोज की एक थाली १६ रूपये की कैसे होगी, कुछ उनके पद की गरिमा का सवाल भी तो है.आर टी आई ने तो बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है बेचारे इन नेताओं के लिए,भले ही वे इसकी परवाह न करें पर एक बार तो हंगामा हो ही जाता है,क्या पता चुनाव के समय जनता को कोई सिरफिरा यह बातें याद दिला दे.वैसे तो शिंदे साहब और उनके साथी जानतें हैं कि जनता कि याद बहुत कमजोर होती है, पर इस जनता का भी क्या पता,इस लिए कम से कम मीडिया को तो ऐसे मुद्दे नहीं उछालने चाहिए , आखिर अब सरकार में हैं तो खा रहें हैं,बहार आ जायेंगे तो कौन खिलायेगा ,कहाँ से खिलायेगा, जनता ने इन्हें खाने के लिए ही तो चुना है.

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