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नवीन जिंदल साहेब, यह राष्ट्र ध्वज है, किसी राजनैतिक पार्टी का झंडा नहीं…..

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शायद नवीन जिंदल भूल गए की सम्पूर्ण भारतीयों की औकात बौनी है “तिरंगे” के सामने, आप क्या सबसे ऊपर हो?
कहते हैं तस्वीर कभी झूठ नहीं बोलती. यह तस्वीर नवीन जिंदल, 

सांसद और वर्तमान कोयला घोटाले का एक प्रमुख लाभार्थी (लगभग १७६५ करोड़ रुपये) के कार्यालय जिंदल सेंटर के प्रवेश द्वार का है. लगता है अपनी शान दिखाने के लिए नवीन जिंदल “तिरंगे” को अपने दफ्तर का पहरेदार बनाये हैं.
 जिंदल सेंटर के मुख्य द्वार पर, जहाँ सुरक्षा ज़ोन में प्राइवेट सुरक्षा के लिए गार्ड खड़े होता हैं, इस द्वार के दोनों तरफ राष्ट्रध्वज बंधा है, यह राष्ट्र ध्वज मूलतः नियम के विपरीत है और १२० डिग्री कोण पर बंधी है. प्रवेश द्वार पर इस तरह तिरंगा फहराने का आदेश संभवतः सर्वोच्च न्यायालय या भारत सरकार द्वारा पारित फ्लेग कोड भी नहीं देता है. फ्लेग कोड के नियम के अनुसार, भारत का आम नागरिक अपने-अपने घरों पर तिरंगा फहरा सकते हैं, कार्यालय में अपने टेबुल पर रख सकते हैं (हमेशा दाहिनी ओर), लेकिन शायद  सर्वोच्च न्यायालय या भारत सरकार द्वारा पारित फ्लेग कोड में कहीं भी यह जिक्र नहीं है की भारतीय राष्ट्र ध्वज को भारत का एक आम आदमी, चाहे वह कोई हों, गरीब से धनाढ्य तक, संत्री से मंत्री तक, चपरासी से अधिकारी तक, राष्ट्र ध्वज को अपने दरवाजे पर १२० डिग्री के कोण पर बांधे, अपनी पहचान बनाने के लिए. यह रश्रा ध्वज है, किसी राजनैतिक पार्टी का ध्वज नहीं.


-शिवनाथ झा||
क्या भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश और तत्पश्चात भारत सरकार द्वारा “फ्लेग कोड” में किये गए संशोधन, कुरुक्षेत्र लोक सभा के सांसद और जिंदल ग्रुप के मालिक नवीन जिंदल को यह अधिकार देता है कि वे भारत के राष्ट्र ध्वज को अपने कार्यालय के मुख्य द्वार पर इस कदर स्थापित करें? यह जिंदल सेंटर में प्रवेश का मुख्य द्वार है और भारत का राष्ट्र धवज इस तस्वीर के माध्यम से आपके सामने है.
नवीन जिंदल वर्तमान में हुए कोयला घोटाला में “लाभान्वित” होने वाले व्यापारियों में प्रमुख हैं.
यह सर्वविदित है की सन २००१ में जब नवीन जिंदल ने संयुक्त राष्ट्र में, जहाँ वे पढ़ते थे, भारतीय राष्ट्र ध्वज को अपने कार्यालय में फहराया था और जिसके कारण उन्हें दण्डित करने की चेतावनी भी दी गयी थी. बाद में, नवीन जिंदल ने भारत के नागरिकों को अपने राष्ट्र ध्वज को निजी तौर पर फहराने के अधिकार को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय का भी दरवाजा खटखटाया और अंत में सर्वोच्च न्यायालय का आदेश इनके पक्ष में भी हुआ. सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को आदेश दिया की वह इस विषय को गंभीरता से ले और “फ्लेग कोड” में संशोधन भी करे.
इससे पूर्व स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के अलावे किसी भी दिन भारत के नागरिकों को अपना राष्ट्रध्वज फहराने का अधिकार नहीं था, विशेष कर अपने घरों या कार्यालयों में.
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से २६ जनवरी २००२ से भारत सरकार फ्लेग कोड में संशोधन कर भारत के सभी नागरिकों को किसी भी दिन राष्ट्र ध्वज को फहराने का अधिकार दिया गया, बशर्ते, इस राष्ट्र ध्वज को फहराने के क्रम में “राष्ट्र ध्वज की प्रतिष्ठा, गरिमा बरक़रार रहे और किसी भी स्थिति में इसका अपमान ना होने पाए. यह राष्ट्र का प्रतिक है और सर्वोपरि है.”
केंद्रीय कैबिनेट ने तब भारतीय राष्ट्रध्वज संहिता में संशोधन किया जो 26 जनवरी, 2002 से प्रभावी हुआ. इसके तहत किसी भी नागरिक को साल के किसी भी दिन राष्ट्रध्वज की गरिमा, प्रतिष्ठा और सम्मान का ध्यान रखते हुए राष्ट्रध्वज फहराने की इजाज़त मिल गई. ये स्पष्ट किया गया कि ये संहिता कोई संवैधानिक क़ानून नहीं है और उल्लिखित नियमावली के अंतर्गत वर्णित सीमाओं का पालन भी अनिवार्य है. ये भी कहा गया कि झंडा फहराना एक अहर्ताप्राप्त (जो योग्य हैं) अधिकार है जो नागरिकों को मिली पूर्ण आजादी से अलग है और इसकी व्याख्या भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत की जानी चाहिए.
यह तस्वीर है नवीन जिंदल के दक्षिण दिल्ली स्थित १२, भीखाजी कामा प्लेस का जिंदल सेंटर. यह
जिंदल ग्रुप का कार्पोरेट कम्युनिकेशन का दफ्तर भी है. नवीन जिंदल महान उद्योपति स्वर्गीय ओ.पी.जिंदल (पूर्व सांसद) के पुत्र भी हैं.
यदि देखा जाये तो भारत वर्ष में किसी भी सरकारी कार्यालयों में – राष्ट्रपति कार्यालय से लेकर, प्रधान मंत्री कार्यालय, संसद, नोर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक में  राष्ट्र ध्वज का पदस्थापन इस कदर नहीं है. सर्वोच्च न्यायालय के एक वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है: “राष्ट्र ध्वज का स्थान भारत के किसी भी नागरिक से ऊपर है. वह सम्पूर्ण भारत का प्रतीक है. वह हमारी शान है, वह हमारी पहचान है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हम अपनी शान बनाने, दिखाने या बढ़ाने में अब राष्ट्र ध्वज का उपयोग करने लगे है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसका अपमान है.”
क्या सर्वोच्च न्यायालय का फैसला और भारत सरकार द्वारा फ्लेग कोड में किये गए संशोधन नवीन जिंदल या उनके कार्यालय को यह अधिकार प्रदान करता है कि वे “भारत के राष्ट्र ध्वज को इस कदर अपने कार्यालय के मुख्य द्वार पर प्रतिस्थापित करें”. कल इस तस्वीर को लेते वक्त जिंदल सेंटर में कार्य करने वाले कुछ कर्मचारी भी आग-बबूला हों गए, यहाँ तक कि सुरक्षा कर्मी को भी बुला लिया गया.
हमने नवीन जिंदल से बात करने की अनवरत कोशिश की  लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई.
बहरहाल, जिंदल और उनकी कंपनी भारत के कोयला क्षेत्र में हुए घपलों में लाभान्वित  होने वाली कंपनियों में से एक है. नवीन जिंदल की कम्पनी जिंदल पॉवर लिमिटेड (जे.पी.एल) जो जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड (जे.एस.पी.एल) की एक इकाई है, भी इस कोयला घोटाले के लाभार्थियों की सूची में एक है. तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधान मंत्रित्व काल में सन १९९८ में जिंदल पॉवर लिमिटेड को कोल ब्लोक्स का आवंटन हुआ था. यह परंपरा वर्तमान मनमोहन सिंह की सरकार में भी जारी रही. यह ब्लोक्स २५८० मिलियन टन कोयला रिजर्व रखता है. न्यूनतम मूल्य वाली कोयला खदान होने के बावजूद नवीन जिंदल ने ३.८५ रुपये प्रति यूनिट की दर पर इसे २०११-१२ में बेचा जो लैंको और एन.टी.पी.सी की दरों क्रमशः ३.६७ रुपये और २.२० रुपये प्रति यूनिट से बहुत अधिक था. इस से पूर्व वर्षों में भी जिंदल ने इस अधिकार को ४.३० रूपये प्रति यूनिट के दर से बेचा था जो इनकी कम्पनी को लगभग १,७६५ करोड़ रूपये का लाभ दिया था.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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