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वामपंथियों के खिलाफ हूँ, वामपंथ के नहीं: ममता

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-सुबीर भौमिक||

सस्ती सूती की साड़ी और उससे भी सस्ती हवाई चप्पल पहने हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भारतीय राजनीति में अपने लिए एक अलग पहचान बनाने की कोशिश करती हैं. वो ग़रीबों की हिमायती और वैश्वीकरण की विरोधी नज़र आना चाहती हैं.
पश्चिम बंगाल के जाने माने राजनीतिक विश्लेषक आशीष बिसवास के अनुसार, ”ऐसा करना उनकी (ममता) राजनीतिक ज़रूरत है. वो बंगाल में राजनीतिक रूप से तभी अस्तित्व में बनी रह सकती हैं जब वो वामपंथियों को उनके ही खेल में मात दें. उनको अपने वामपंथी विरोधियों की तुलना में उनसे ज़्यादा ग़रीब समर्थक दिखना है.”

उन्होंने हाल ही में खुदरा क्षेत्र में विदेशी पूँजी निवेश के सवाल पर केंद्र की यूपीए सरकार से अपने 19 सांसदों वाली तृणमूल कांगेस से समर्थन वापस ले लिया है.
ममता बनर्जी को इस बात का एहसास होने लगा है कि पूरे देश में एक ऐसा बड़ा तबक़ा है जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी चिदंबरम की आर्थिक नीतियों का विरोध करता है.
‘राजनीतिक मजबूरी’
आशीष बिसवास का मानना है कि अपना गढ़ समझे जाने वाले पश्चिम बंगाल और केरल में मिली हार के कारण वामपंथी हतोत्साहित हैं और इस कारण ममता को लगता है कि वो देश में वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण का विरोध करने वाली शक्तियों का नेतृत्व कर सकती हैं.

हालाकि केंद्र सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा के बाद भी डीज़ल की क़ीमत में बढ़ोत्तरी को वापस लेने और सब्सिडी पर मिलने वाले रसोई गैस सिलिंडरों की संख्या बढ़ाने की मांग रखकर ममता ने समझौते के लिए गुंजाइश बाक़ी रखी है.
कोलकाता रिसर्च ग्रुप के रणबीर समादार का मानना है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के मामले में शायद कोई समझौता संभव नहीं है.
समादार कहते हैं, ”खुदरा क्षेत्र में एफ़डीआई यूपीए सरकार के लिए सबसे अहम मुद्दा है. अगर ममता इस मुद्दे पर झुक जाती हैं तो ग़रीब हिमायती होने की उनकी छवि को काफ़ी धक्का लगेगा. और अगर मनमोहन सिंह एफ़ड़ीआई के मुद्दे पर पीछे हटते हैं तो उनकी साख गिरेगी.”
ममता कब क्या करेंगी इस बारे में अंदाज़ा लगाना चाहे जितना भी मुश्किल हो, लेकिन इतना ज़रूर है कि ग़रीबों के साथ हमेशा खड़ी रहने की उनकी छवि अभी तक बरक़रार है.
‘अड़ियल नेता की छवि’

वर्ष 1993 में जब ममता कांग्रेस की युवा नेता थीं और केंद्र में खेल और युवा मामलों की उपमंत्री थीं तब उन्होंने अपनी ही पार्टी के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के ख़िलाफ़ कोलकाता की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया था.
उसके फ़ौरन बाद उन्हें मंत्रिपरिषद से हटा दिया गया था.

सिंगूर में टाटा की कार फ़ैक्ट्री का उन्होंने जमकर विरोध किया था.
सात साल बाद वर्ष 2000 में तेल की क़ीमत में बढ़ोत्तरी के विरोध में उन्होंने तत्कालीन एनडीए सरकार मे रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. और जब एनडीए सरकार ने क़ीमत बढ़ाने के फ़ैसले को वापस लिया तो उन्होंने भी अपनी इस्तीफ़ा वापस ले लिया था.
लेकिन एक साल के बाद ही रक्षा मंत्रालय में कथित घोटाले को लेकर तहलका मैगज़ीन के ख़ुलासे के बाद उन्होने एनडीए से नाता तोड़ लिया था.
हालाकि इस बार यूपीए के सहयोगी के रूप में उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कोई विरोध नहीं किया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी ख़ामोशी का असल कारण ये था कि वो दबाव बनाकर केंद्र सरकार से पश्चिम बंगाल के लिए विशेष आर्थिक पैकेज लेना चाहती थीं.
बंगाल के लिए आर्थिक पैकेज
जानकारों के मुताबिक़ विशेष आर्थिक पैकेज नहीं मिलने के कारण ही उन्होंने बांग्लादेश से तीस्ता नदी पर संधि का समर्थन करने से इनकार कर दिया था.
उनके इस क़दम से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ढाका के दौरे पर काफ़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी.
लेकिन अब जब कि केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल को विशेष पैकेज देने के बारे में तैयार दिख रहा है तो उन्होंने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी है.
वामपंथी दल ममता के ग़रीबों की हिमायती होने की छवि को नकारते हुए सवाल उठाते हैं कि पेट्रोलियम पदार्थों की क़ीमत में लगातार बढ़ोत्तरी करने वाली केंद्र की यूपीए सरकार की वो एक अहम घटक दल कैसे बनीं रहीं.

“मैं वामपंथियों के ख़िलाफ़ हूं, वामपंथ विचारधारा के ख़िलाफ़ नहीं.”
ममता बनर्जी

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात महंगाई के मुद्दे पर उन पर दोहरी नीति अपनाने का आरोप लगाते हैं.
लेकिन जैसे ही ममता ने केंद्र सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा सीपीआई के गुरूदास दासगुप्ता ने ममता के फ़ैसले का स्वागत करते हुए उसे एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम क़रार दिया था.

‘ज़्यादा बड़ी वामपंथी’
ममता बनर्जी के लिए उनकी राजनीतिक मजबूरी ही अब उनके काम करने का तरीक़ा बन गया है.
हाल ही में ममता बनर्जी ने वामपंथियों पर बड़े पूंजीपतियों का कठपुतली होने का आरोप लगाते हुए एक जगह कहा था, ”मैं वामपंथियों के ख़िलाफ़ हूँ, वामपंथ विचारधारा के ख़िलाफ़ नहीं.”
कुछ साल पहले सिंगूर में टाटा के नैनो कार फ़ैक्ट्री और नंदीग्राम में इंडोनेशिया की एक केमिकल फ़ैक्ट्री के लिए ज़मीन अधिग्रहण के कड़े विरोध के कारण ही पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में उन्हें इतनी बड़ी जीत हासिल हुई थी.
राजनीतिक समीकरण उन्हें बंगाल में वामपंथियों से भी ज़्यादा वामपंथी दिखने के लिए मजबूर करता है और अब उन्हें लगता है कि अगर वो आर्थिक सुधार के मुद्दे पर कांग्रेस का विरोध करती हैं तो उनकी ये छवि बंगाल से बाहर भी लोगों को आकर्षित कर सकती है.

(सौजन्य:bbc.co.uk)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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