सीएम और गवर्नर को सरेआम गालियां देता है शिबू सोरेन का पीए

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-मुकेश भारतीय||

आज झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमों शिबू सोरेन की गिरती  हालत के सामने उनके पीए विवेक के रसुख का क्या आलम है। यदि आपको इसका आंकलन करना है तो शिबू सोरेन उर्फ गुरुजी के मोहराबादी स्थित सरकारी आवास चले जाइये।

विवेक शुरुआती दौर में गुरुजी के बड़े पुत्र स्व. दुर्गा सोरेन का ड्राइवर था। उसके बाद छोटे पुत्र हेमंत सोरेन ( अब वर्तमान उप मुख्यमंत्री) का ड्राइवर बन गया। उसके बाद गुरुजी की शरण में चला आया। फिर क्या था गुरुजी जी की सत्ता की चाशनी लदबद होकर झारखंड विधान सभा में नौकरी पा ली। अब न जाने गुरुजी के परिवार में उसकी क्या औकात थी कि वह सेटिंग-गेटिंग कर राज्य के एक बड़े दल के सुप्रीमों सह भाजपा नीत मुंडा सरकार संचालन समिति के अध्यक्ष यानि गुरुजी का ही सरकारी पीए बन गया।

बस इतना सा ही सफर है विवेक का। यह कभी भी झामुमो पार्टी के किसी छोटे या बड़े पद पर नहीं रहा। लेकिन आज इसका बोलबाला देखिये कि ये शख्स सरेआम सीएम और गवर्नर को गालियां देता है। डिप्टी सीएम को दलाल शब्द से विभूषित करता है। वरीय पार्टी कार्यकर्ताओं को भींगे कपड़ों की तरह निचोड़ डालता है।

देखिये सबसे बड़ा आश्चर्य। वह गाल ठोक कर करता है। वह भी तब, जब सामने गुरुजी बैठे हों और सब कुछ करीब से सुन रहे हों। फिर भी कोई रोक ठोक नहीं। मानो गुरुजी इस विधानसभा कर्मी के सामने बिल्कुल लाचार और असहाय हो गये हों।

कहने वाले यहां तक कहते हैं कि कभी चाकरी करने वाले विवेक ने गुरुजी को मानसिक तौर पर गुलाम बना लिया है। पार्टी में भी वही होता है, जैसा विवेक चाहता है। उसकी महात्वाकांक्षा चुनाव लड़ने की है।

विशेष, अब जरा संलग्न विडियो को गौर से देखिये और खुद आंकलन कीजिये:

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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