क्या हम महामहिम प्रणब दा से तटस्थ राष्ट्रपति होने की अपेक्षा करें..?

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संविधान की मूल आत्मा के अनुसार केंद्र में सरकार न इस की न उस की बल्कि राष्ट्रपति की होती है. हर हालत में संसद, उस में संसदीय व्यवस्था और बहुमत वाले दल या गठबंधन के ही शासन को सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी उन्हीं की होती है. मौके की सरकार हर समय उनको जवाबदेह होती है और वे जब चाहें सरकार से सदन में अपना बहुमत साबित करने को कह सकते हैं. कोई इसका अनुरोध भी करे, या न करे.

इसकी मिसाल भी है. 1999 में एनडीए की सरकार थी. जयललिता ने समर्थन वापिस ले लिया था और सदन में बहुमत साबित करने की नौबत आ गई थी. और बहुमत साबित करने का आदेश तत्कालीन राष्ट्रपति ने अपनी ओर से दिया था. सरकार सिर्फ एक वोट के अंतर से सदन में विश्वास मत हार गई थी. सरकार को इस्तीफ़ा देना पड़ा था. हालांकि ये अलग बात है कि उसके बाद हुए चुनावों में एक इतिहास रचा गया. लेकिन लोकतंत्र अगर परंपरा और मर्यादाओं से भी चलता है तो वो दायित्व अब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पर भी है. और उन की ये जिम्मेवारी शुक्रवार की शाम से उन के ऊपर आयद हो जाएगी जब टीएमसी के मंत्री मनमोहन मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा देंगे और पार्टी राष्ट्रपति भवन जाकर समर्थन वापसी की चिट्ठी देगी. और चिट्ठी, अभी तक की स्थिति और सूचना के मुताबिक़ वो देने जा ही रही है.

हालांकि हालत ये भी है कि बयानबाजी के बयान दें बेशक, मगर कांग्रेस के धुर विरोधी भी अभी मनमोहन सरकार को संकट में नहीं मान रहे. खासकर भाजपा ने बयान दे दे और ममता की तारीफ कर कर के न पीछे हटती ममता से समर्थन वापिस करा दिया है और अब राजनीति और आम आदमी की हालत का तकाज़ा वो समाजवादी पार्टी से भी कर रही है. उस की एक ‘विशफुल थिंकिंग’ है कि शायद वो भी एफडीआई के मुद्दे पर यूपीए से मुंह फेर ले. देश के साथ यूपी में भी बड़े पैमाने पर बंद का असर दिखा कर वो सपा पे कांग्रेस का साथ न देने दबाव बना रही है. लेकिन सपा भी सयानी है. उस ने खुद भी बंद का ऐलान कर दिया है. ताकि ये न लगे कि जनता भाजपा के साथ थी.

जहां तक सपा की बात है तो एफडीआई का मुद्दा ज़रूर एक मुद्दा है यूपी में भी. छोटे दुकानदार और व्यापारी यूपी में भी बहुत हैं और अगर वे नाराज़ होते हैं तो भाजपा को फायदा हो सकता है यूपी में. लेकिन सपा को उन से ज्यादा चिंता भाजपा की लाटरी पूरे देश में लग जाने की है. उसे लगता है कि यूपीए की सरकार आज गिरी और चुनाव इस टूजी, कोयला घोटाले और गैस डीज़ल एफडीआई की बदनामी गुस्से के बीच हुए तो एनडीए की वापसी हो भी सकती है. खासकर तब कि जब ममता भी यूपीए के साथ नहीं है. वो हुआ तो उसे लगता है कि उस के मुसलमान उसे कभी माफ़ नहीं करेंगे. ये कारण न भी हो बहाना तो हो ही सकता है सपा के यूपीए का साथ न देने तो मतदान के बहिष्कार का. बस कांग्रेस का काम इतने से ही बड़े आराम से हो जाएगा. बसपा ऐसा पहले भी कर चुकी है. सो कोई दिक्कत, संकट नहीं है सरकार को.

आंकड़ों और अन्दर की राजनीति को प्रणब बाबू से बेहतर भला कौन जानता है. फिर भी क्या, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री से विश्वास मत प्राप्त करने को कहेंगे?

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3 thoughts on “क्या हम महामहिम प्रणब दा से तटस्थ राष्ट्रपति होने की अपेक्षा करें..?

  1. केसे कर सकते हे सोचो इतने वर्ष कांग्रेस की सेवा करके कोई चाह कर भी एसा नहीं कर सकता हे

  2. चुकी प्राण नवदा आज सर्वोछय पद पर है में संविधान की मरियादा को मान ता हूँ इएसीये कुछ नहीं कहासकता हूँ पर इएत ना संकेत ओ देता हूँ की उनका मन बहुत बे चैन निशिचित हो गा की ………../////// जिस पार्टी ने मुझे यह सम्मान दिय है उसे वो इएस हाल में देखा कर थोड़ी वेचानी जरुर होगी ओउर फ़ोन तो कर ही रहे होंगे ओर्र बुध बुध कर रहे होंगे हो भी सकता है की थोडा प्रदेश का थोडा देश का थोडा नातिकता का ओर्र सेकुलर बड़ी दवाए का प्रयोग करने की सलाह तो दे ही रहे होंगे

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