जरूरी की चक्की में पिसना जनता की मजबूरी -2

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-विनायक शर्मा||

जनसाधारण के लिए धनाभाव का बहाना बनाने वाली केंद्र सरकार के वार्षिक बजट का यदि अवलोकन किया जाये तो लाखों करोड़ों रुपये के विभिन्न करों की छूट कार्पोरेट सैक्टर

कार्टून: सतीश आचार्य

और बड़े औद्योगिक घरानों को निरंतर दी जा रही है, परन्तु जिन कारणों के मध्येनजर यह छूट जा रही है या इस तथाकथित छूट का लाभ देश की जनता या देश के उत्पादन पर क्या प्रभाव पड़ा, यदि इसका आंकलन सरकार का कोई भी मंत्रालय नहीं कर रहा है, तो ऐसी छूट का क्या औचित्य है ? खुदरा व्यापार में एफडीआई को लाने का निर्णय करनेवाले देश के शासकों और योजनाआयोग के प्रारूपकारों को जरा वातानुकूल कक्षों से बाहर निकल कर देश के उस बहुसंख्यक वर्ग की ओर भी देखना चाहिए जो साँझ ढलने पर २ से पांच रुपयों का खाद्य तेल, आठ रुपयों के चावल और तीन रुपयों की दाल खुदरा दुकानदारों से खरीदते देखे जाते हैं. गली कूचे और गावं मोहल्ले के यह खुदरा दुकानदार अपने परिवार के पोषक होने के साथ-साथ मध्यम-निम्न और गरीबों की जीवन रेखा हैं जो आवश्यकता पड़ने पर फुटकर, सस्ता व उधारी पर सामान भी दे देते हैं. दिहाड़ी पर निर्भर करनेवाले करोड़ों परिवार अपनी कमजोर व अनिश्चित आर्थिक स्थिति के कारण ही आज भी सरकारी राशन की दुकान यानि कि फेयर प्राईस शॉप का लाभ उठाने में असमर्थ हैं जिसका लाभ राशन की दुकानवाला या अन्य उठाते हैं.
देश की सरकारें कर क्या रही हैं यह आम जनता की समझ से परे है. जिस ओर भी नजर दौड़ाइए अनुशासनहीनता व भ्रष्टाचार के चलते सरकारी काम में भट्ठा बैठता नजर आता है. वहीँ दूसरी ओर निजी क्षेत्र दिन दूनी रात चौगनी तरक्की पर है. सरकार ने भी अब धन की कमी का कारण बताते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के और जनकल्याण के अधिकतर उपक्रम निजी क्षेत्र को सौंप कर अपने कर्तव्यों से पल्ला झाड़ने का काम शुरू कर दिया है. परन्तु क्या सरकारी अव्यवस्था और अनुशासन हीनता को दुरुस्त करने की अपेक्षा इसका एक मात्र यही हल है कि हर काम को  निजी क्षेत्र को सौंप दिया जाये ?  सबसे बड़ी बात यह है कि निजी क्षेत्र जनकल्याण के मंतव्य से कार्य नहीं करते, वह तो केवल मात्र लाभ के लिए ही कार्य करते हैं. ऐसे में जन-कल्याण और जनउत्थान के उस लक्ष्य का क्या होगा जिसका संकल्प आजादी के समय लिया गया था. केवल शहरी क्षेत्र, किसी एक वर्ग जाति या कौम के निहित स्वार्थ के लिए कार्य कर येन-कैन-प्रकारेण सत्ता प्राप्ति का धंधा करनेवालों को समझना होगा कि देश केवल महानगरों और उसके संभाग, जिले, तहसील में ही नहीं बसता है वरन देश की ७० प्रतिशत से अधिक आबादी आज भी गावों में बसती है और जब तक विकास की धारा उन तक नहीं पहुँचती, तब तक सरकारी वक्तव्यों में दिए जा रहे विकास के आंकड़े बेमानी हैं. देश की सत्ता पर सामंतवादी आचरण करनेवाले इन तथाकथित माननीय जनप्रतिनिधियों का कोई भी स्पष्टीकरण देश के जनसाधारण को समझ में नहीं आता. अपनी हेकड़ी में मस्त सत्ताधारी न तो जनसाधारण की कोई समस्या हल करने में सक्षम है और न ही किसी की कोई बात ही सुनने को तैयार हैं. जो कर दिया, जो कर रहे हैं और जो कुछ भी करेंगे वही सब ही दुरुस्त है, शेष सभी गलत. स्वतंत्रता पश्चात् इस लोकतान्त्रिक देश में धीरे-धीरे यह किस  प्रकार  की  राजशाही या तानाशाही अपने पंख  पखार रही  है  ? सरकार के मगरूर मंत्री देश की संवैधानिक संस्थाओं पर हमले कर उनकी गरिमा को कम करने का कार्य करते हुए स्पष्ट देखे जा सकते हैं. इतना ही नहीं केवल अपनी ही बात को सही ठहराते हुए अपने विरुद्ध उठनेवाली हर आवाज को चुनाव में उतरने या हर असंतोष के लिए न्यायालय में जाने को कहकर जनता जनार्धन का उपहास उड़ाते हुए अपने निरंकुश होने का भोंडा प्रदर्शन करते नजर आते हैं. स्वतंत्रता सैनानियों ने अपनी जवानी ब्रितानी जेलों में सडाकर या प्राणों का बलिदान देकर क्या इसी प्रकार के राजतन्त्र की परिकल्पना की थी ?
देश का जनसाधारण कोई नीतिकार, अर्थशास्त्री या बाजार के माहिर तो हैं नहीं. परन्तु इतना तो वह  समझता  हैं कि जिस रास्ते पर विगत कुछ वर्षों से आर्थिक रूप से बीमार देश को धावक का श्रृंगार कर जबरदस्ती घसीट कर दौड़ाने का प्रयत्न किया जा रहा है, सतही तौर से भले ही वह मैराथन का धावक नजर आये परन्तु वास्तव ऐसा  है  नहीं. सर्व साधनसम्पन्न होते हुए  भी आर्थिक रूप से कमजोर होते इस देश में अमीर और गरीब के मध्य की दूरी दिन-बा-दिन बढती ही जा रही है. जिसका ज्वलंत उदाहरण गरीबी की रेखा के नीचे रहनेवालों में हो रही सतत वृद्दि है. कौन है गरीबों की बढती संख्या के लिए जिम्मेवार ? ६५ वर्ष बीत गए कब और कैसे सुधरेगी गरीबों की दशा ? देश की योजनायें व नीतियां किस मनस्थिति के लोग और किसके  उत्थान  के  लिए  बना रहे हैं ? ६४ वर्षों से कौन लाभान्वित हो रहा है इन योजनाओं से ? सरकार की नीतियां और योजनायें गरीबों के लिए नहीं वरन वोटबैंक की स्थापना की दृष्टि से जातिविशेष और विशेष धर्मावलम्बियों को मध्येनजर रख कर ही बनाई जा रही हैं. यही नहीं देश की योजनायें बनानेवाला योजना आयोग देश के सुदूर ग्रामीण अंचल में बैठे आमजनों के विषय में क्या जाने वह तो अपने कार्यालय के शौचालयों के नवीनीकरण पर ही ३५ लाख रुपये खर्च कर देश के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है. यही नहीं देश का योजनाआयोग देश में गरीबी के कम होने जैसे विवादित घोषणा करते हुए देश को समझाने का हास्यास्पद प्रयास करता है कि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले वह लोग जो प्रतिदिन 22.42 रूपये पर तथा शहरी क्षेत्र के वह लोग जो प्रतिदिन 28.65 रूपये पर गुजर बसर कर सकते है. उसका मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिव्यक्ति, प्रतिमाह 672.80 रूपयों तथा शहरी क्षेत्रों में प्रतिव्यक्ति, प्रतिमाह 859.60 रूपयों में अपनी जीविका चलानेवाला व्यक्ति गरीब नहीं है. अर्थात इससे कम पर गुजर बसर करनेवाले ही गरीब माने जायेंगे. गरीबी की रेखा तय करने का यह नया पैमाना योजनाआयोग ने क्या  लोकसभा  में  चलायी  जा  रही  रेलवेबोर्ड  की  कैंटीन में  माननीयों  को  मिलनेवाले  भोजन  पदार्थों  की  दरों  को आधार मानकर तय  किया था ? देश के जनसाधारण का प्रतिनिधित्व करनेवाले इन माननीयों को जिस दर से भोजन व अल्पाहार पदार्थ इस कैंटीन में सुलभ करवाए जाते हैं यह जान कर पाठक अपने दांतों तले उंगली दबा कर रह जायेंगे.

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One thought on “जरूरी की चक्की में पिसना जनता की मजबूरी -2

  1. जरूरी हे भ्रष्टाचार इससे देश(नेता ) मजबूत होता हे जनता के हाथ में कुछ नहीं हे एक वोट था वोभी छीनकर ले गए ५ साल से वापस नहीं आये सबकुछ छीनकर ले लेते हे टैक्स, हमारे अधिकार,हमारा पोषण ,हमारा EDUCATION सब कुछ, बचा हे तो महारा ईमान इसे संभल कर २०१४ तक रखलो फिर बताओ की जनता क्या होती हे

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